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किसान लामबंदी (1920 – 2020)

– राकेश सांगवान

“ एक वह हैं जो अपनी ही सूरत को लेते हैं बिगाड़,

एक वह है जिसे तस्वीर बनानी आती है ”

आज देश में जगह जगह किसान सरकार की नीतियों से नाराज होकर सड़कों पर रोषप्रकट कर रहें हैं. किसान की उपज की लूट चल रही है, किसान कर्ज में डूबते जा रहें हैं, जिस कारण किसान की ख़ुदकुशी के केस बढ़ते जा रहें हैं, सरकार किसान हितैषी होने का दम भरती है और लीपापोती के लिए ऐसे ऐसे कानून बनाती है कि उनसे आखिर में बाजार को ही मुनाफा होता दिखता है. आज देश में अनेकों किसान संगठन हैं बावजूद इसके इन समस्याओं का कोई ठोस समाधान नहीं हो पा रहा है ! इस लेख में 1920 से लेकर अबतक यानि 2020 तक के हालातों पर चर्चा करेंगे कि कैसे किसान पहले लामबंद थे, कैसे देश की राजनीति किसान के इर्दगिर्द घुमती थी, और क्यों अब किसान की लामबंदी पर ही सवालिया चिन्ह लग गया ?

आज़ादी पूर्व संयुक्त पंजाब में साहूकारों का पूरा आतंक था. देश में जितने साहूकार थे उसका एक चौथाई पंजाब में थे. किसानों की कमाई इन साहूकारों के चक्रव्रधि ब्याज चुकाने में चली जाती. कर्ज न चूका पाने की स्थिति में साहूकार किसान की ज़मीन, बैल आदि सब कुर्क करवा देते थे. पंजाब में आर्थिक तौर पर भेदभाव की बहुत गहरी खाई बन चुकी थी. शत प्रतिशत किसान कर्जे में डूब चूका था. ज़मींदार (किसान) के हालात ये थे कि रिश्तेदारी में भी जाने के लिए एक दुसरे के कपडे मांग कर जाना पड़ता था. सरकारी अफसरों के दौरे के समय उनका सामान ढोने के लिये ज़मींदारों की गाड़ियाँ बेगार में और घी-दूध मुफ्त में लिये जाते थे. बड़े अफसर तो छोडिये छोटे छोटे मुलाजिम भी उनसे ढंग से पेश नहीं आते थे. कहावतें तक बन गई थी कि ‘हाकिम के पीटे का और कीचड़ में फिसलने का कोई डर शर्म नहीं या फिर ‘अफसर की अगाड़ी और घोड़े की पिछाड़ी से बचना चाहिए. उस समय ज़मींदार (किसान) की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक दशा क्या थी इसका अनुमान हम सर छोटूराम के रोहतक में वकील के तौर पर शुरुआती जीवन की घटना से लगा सकते हैं. सर छोटूराम ने सितम्बर,1912 में रोहतक में वकालत शुरू की थी. उस दिनों वकील लोग अपने को हाकिमों जैसा ही समझते थे. वकीलों व् हाकिमों में एक नेक्सस सा बन गया था. वकीलों का दिमाग भी ऐसा बन गया था कि वे शेष जनता से और खास तौर से देहातियों से अपने को ऊँचा समझते थे. उन्हें बैठने के लिए कुर्सी मुढे न देते थे. सर छोटूराम जो एक साधारण ज़मींदार परिवार से थे इसलिए वह इस सबसे अंजान नहीं थे. जब उन्होंने वकालत शुरू की तो वह अपने देहाती मुवकिल को अपने बराबर मुढे कुर्सी पर बैठाते उनके साथ हुक्का गुडगुडाते. इससे कोर्ट में अन्य वकीलों में बेचैनी पैदा हो गई कि ये तो जाहिल देहातियों का दिमाग ख़राब कर रहा है. वकीलों ने उनसे इस बारे में बात की तो उनका जवाब था, ‘मुझे ताज्जुब है कि मजदुर मालिक से अपने आपको ऊँचा मानता है? मुवकिल की अशिक्षा और भोलेपन से आप लोग नाजायज लाभ उठाते हैं. जिससे हम मुंह मांगी मजदूरी लेते हैं उसके साथ अच्छा व्यवहार भी न करें और उसे अनादर का पात्र समझें, क्या यह अन्याय और असमर्थ नहीं है? इस वाक्या के बाद चौधरी छोटूराम की देहातियों में और ज्यादा पैठ बननी शुरू हो गई. चौधरी छोटूराम ने देहातियों में चेतना के लिए 1916 में जाट गजट नाम से साप्ताहिक अख़बार निकालना शुरू किया और किसानों में जाग्रति और उनकी लामबंदी के लिए ज़मीन्दरा लीग (सभा) की स्थापना की. इसी वर्ष में वे गाँधी जी के आज़ादी आन्दोलन से जुड़ गए और कांग्रेस के रोहतक जिले के प्रथम प्रधान बने. पर यह सफ़र लम्बा न चल सका. 1920 में कलकत्ता में असहयोग आन्दोलन प्रस्ताव पारित किया गया. इसमें छात्रों को स्कुल छोड़ देने, काश्तकारों को लगान न देने, मुलाजिमों से सरकारी नौकरियों से इस्तीफा देने के लिए कहा गया था. चौधरी छोटूराम की सोच व् राजनीति पूरी तरह व्यावहारिक एवं किसान हितों तक सीमित थी. इसलिए उन्हें इस प्रस्ताव से आपत्ति थी. आपत्ति का मुख्य कारण ‘किसान लगान देना बंद कर देथा. और उस समय पंजाब में राजस्व कानून के मुताबिक लगान का कोई भी अंश रोकने पर सारी ज़मीन जब्त होती थी. चौधरी छोटूराम ने इसमें ज़मींदार का सर्वनाश देखा और उन्हें ऐसा भी लगा कि किसान की जब्त की हुई ज़मीनों को जब नीलाम करेंगे तब यही महाजन उन्हें नीलामी में लेंगे. ऐसे हालातों में उन्होंने यही निश्चय किया कि असहयोग प्रस्ताव के लगान बंदी अंश को निकलवाने की कोशिश की जाये. इस के लिए वे भिवानी की कांफ्रेंस में पहुंचे और जब अपने विचार व्यक्त करने लगे तो लोगों ने हुल्लड़ मचा दिया. जैसे आज लोग राष्ट्रवाद में अंधे हैं वैसे ही उस वक्त भी थे, पर उस वक्त राज गैरों का था सो उनकी समझ आती है पर आज वाले राष्ट्रवादियों का अंधापन समझ से परे है ! इसके बाद रोहतक में एक सभा बुलाई गई, इसमें देहाती भी काफी बड़ी संख्या में आये हुए थे. जब सर छोटूराम ने अपने विचार रखने चाहे तो यहाँ भी शहरी लोगों ने शोर-गुल किया. देहाती लोगों ने भी सर छोटूराम का इस मुद्दे पर साथ नहीं दिया और सभा में असहयोग का प्रस्ताव पास हो गया. कम समझ के लोग समझते थे कि प्रस्ताव पास होते ही लोग उस पर अमल कर देंगे और अंग्रेज सहज ही भाग जायेंगे इसलिए उन्होंने प्रस्ताव का पूर्णरूपेण पास हो जाना ही बेहतर समझा. चौधरी छोटूराम का हित इसी में था कि वे हवा के रुख के साथ चलते, बहाव के साथ बहते, किन्तु वह उनके स्वभाव के प्रतिकूल था, इसलिए वे कांग्रेस से त्याग पत्र देकर अलग हो गए. जब उनसे कहा गया कि जिन ज़मींदारों का आप लगान बंदी में अहित देखते हैं वे भी तो इस प्रस्ताव के पक्ष में हैं तो चौधरी साहब ने कहा, वे भाववेश में हैं. जब जोश उतर कर उन्हें होश आएगा तब वह पछताएंगे.

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद भारत में क्या राजनीतिक सुधार किये जाएँ, इस सम्बन्ध में तत्कालीन भारतमंत्री सर मोंटेग्यू की अध्यक्षता में एक कमीशन भारत आया. इस कमीशन के सामने पंजाब ज़मींदार सभा की तरफ से चौधरी छोटूराम के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल पेश हुआ. मोंटेग्यू तहकीकात के सिलसिले में प्रत्येक प्रान्त से सम्मति ली गई और यह प्रश्न पंजाब कौंसिल के सामने भी आया. चौधरी छोटूराम की सलाह पर चौधरी लालचंद ने निम्नलिखित तीन प्रस्ताव कौंसिल के सामने रखे –

  1. देहाती तथा शहरी इलाके अलग-अलग हों.
  2. जनसँख्या और करों की वसूली की दृष्टि से 90% सीटें देहात को और 10% शहरों को दी जाएं.
  3. देहाती हलकों से देहाती उम्मीदवार ही खड़ें हो सकें.

ये तीनों ही प्रस्ताव स्वीकृत हो गए. देहाती अधिकारों की यह शहरी क्षेत्रों पर पहली जीत थी और इस से चौधरी छोटूराम के भावी राजनैतिक कार्यक्रम की रुपरेखा की एक झलक स्पष्ट रूप से सामने आई. इस कमीशन की रिपोर्ट के बाद जो सुधार किये गए वे मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड योजना के नाम से भारतीय राजनैतिक इतिहास में प्रसिद्द हैं.

इस सुधारों के बाद से पंजाब की राजनीति में एक नया मोड़ आया या यूँ कहें कि यह पंजाब के किसान की दशा सुधार में टर्निंग पॉइंट था. चौधरी छोटूराम अपना पहला चुनाव हार गए थे. पर यह हार उनके लिए कोई मायने नहीं रखती थी क्योंकि अर्जुन की तरह उन्हें भी अपना लक्ष्य साफ़ दिख रहा था. 1923 में सर फजले हुसैन की रूरल ब्लॉक व् चौधरी छोटूराम की ज़मीन्दरा सभा ने यूनियनिस्ट पार्टी को जन्म दिया. यह सिर्फ राजनीतिक पार्टी ही नहीं थी बल्कि एक किसान तहरीक थी. एक ऐसी तहरीक जिसने न सिर्फ पंजाब बल्कि पंजाब से बाहर राजस्थान, उत्तर प्रदेश तक के किसान में लामबंद होने की चेतना भर दी. सर छोटूराम की इस किसान लामबंदी ने ही अलवर रजवाड़े और सीकर के ठिकानेदारों के विरुद्ध किसान आन्दोलन किया. ऐसी किसान लामबंदी की कि 1923 से 1947 तक पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी अर्थात किसान राज रहा. जिसमें कई किसान हितैषी कानून बनाए गए. जिनमें प्रमुख कानून थे – 1. कर्जा माफ़ी अधिनियम-1935 2. पंजाब कर्जा राहत कानून-1935 3. साहूकार पंजीकरण एक्ट -1938 4. गिरवी ज़मीन की मुफ्त वापसी एक्ट-1938 5. कृषि उत्पाद मंडी अधिनियम-1938 6. व्यवसाय श्रमिक एक्ट – 1940. ये कानून पंजाब के इतिहास में सुनहरे कानूनों के नाम से जाने जाते हैं. इसके इलावा किसान कल्याण कोष की स्थापना, जिसके तहत कई किसान मजदूरों के लड़के पढ़ कर बड़े बड़े ओहदों पर गए. पाकिस्तान के साइंटिस्ट अब्दुस सलाम जिनका नाम नोबेल प्राइज के लिए नामित हुआ था वे भी इसी कोष की मदद से पढ़े थे. वह दौर किसान के लिए सुनहरे दौर की बुनियाद था. उस दौर में किसान कमेरे की ऐसी लामबंदी की मिसाल देश में कहीं और न थी. चौधरी छोटूराम हर तबके के, चाहे हिन्दू हो या मुस्लिम, किसान हो या मजदुर, हरमन प्यारे नेता बन गए थे, मुस्लिम उन्हें रहबरे आजम कहते तो दलित उन्हें दीनबंधु कहते. यह उनके द्वारा की गई किसान की लामबंदी की ताकत ही थी कि जिस जोर पर उन्होंने वोइसरॉय को भी झुकने पर मजबूर कर दिया था. दुसरे विश्व युद्ध के समय ब्रिटिश सरकार को गेहूं की जरुरत थी, वोइसरॉय वेवल ने सारे भारत के प्रान्तों के प्रीमियरों की मीटिंग बुलाई. मद्रास से श्री राजगोपालाचार्य आये और पंजाब से चौधरी छोटूराम. वोइसरॉय चाहता था कि युद्ध की जरुरत के लिए खाद्द्यवस्तुएं विशेषकर गेहूं का भाव सस्ता किया जाए. वह गेहूं का 7 रुपया प्रति मण का भाव नियत करना चाहते थे. श्री राजगोपालाचार्य कांग्रेस के प्रतिनिधि थे उन्होंने वोइसरॉय का यह सुझाव मान लिया. चौधरी छोटूराम ने इसका विरोध करते हुए कहा कि गेहूं मद्रास का किसान नहीं, पंजाब का किसान पैदा करता है. हम 10 रुपया प्रति मण से कम गेहूं नहीं देंगे. इस पर वोइसरॉय ने चौधरी छोटूराम पर दबाव ही नहीं बल्कि धमकी भी दी कि हमने युद्ध में व्यापारी वर्ग की मदद लेनी है, वे भाव सस्ता चाहते हैं. सरकार इतना महंगा भाव नहीं देगी और किसान को सरकारी भाव पर गेहूं देना होगा. इस पर चौधरी छोटूराम ने कहा, हमने व्यापरी का नहीं किसान का लाभ देखना है. किसान युद्ध के लिए जवान भी दे और घाटा खा कर गेहूं भी दे, दोनों बात नहीं हो सकती. लड़ाई व्यापरियों से नहीं किसानों के बेटों से जीती जायेगी. चौधरी साहब यह कह कर मीटिंग से खड़े हो गए और कहा कि 10 रुपया प्रति मण से कम किसान का गेहूं नहीं दूंगा. वरना खड़ीं फसल में आग लगवा दूंगा. यह कह कर वह पंजाब लौट आए. वोइसरॉय ने चौधरी छोटूराम की गिरफ़्तारी का सुझाव दिया. तब सर सिकंदर हयात खान वोइसरॉय के पास गए और उन्हें चौधरी छोटूराम की किसानों में लोकप्रियता से अवगत करवाया कि चौधरी छोटूराम पंजाब के किसान और सिपाही का महान नेता है और वह जो कहता करता है. क्या किसान को नाराज करके और उसका अलाभ करके युद्ध पर दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा ? इस पर वोइसरॉय को झुकना पड़ा और उन्हें किसान को 10 रुपया प्रति मण का भाव देना पड़ा. चौधरी छोटूराम किसान के लिए जीते मरते थे. उनकी राजनीति की धुरी ही किसान बनाम साहूकार और शहरी बनाम देहात थी. यहाँ तक कि मृत्यु से एक दिन पहले वह किसानों को भाखड़ा बाँध की बहुत बड़ी सौगात देकर गए. चौधरी छोटूराम ने एक सभा में कहा कि पंजाब के किसान को जो रास्ता मैंने दिखलाया है अगर वह उस पर चलेगा तो हमेशा उसकी सत्ता रहेगी. किसान से आह्वान करते हुए कहते हैं – “ए ज़मींदार (किसान) तू समाज का निचला भाग नहीं है, बल्कि सबसे श्रेष्ठ है. तू हलपति ही नहीं, देख तू खेडापति और गढ़पति भी है ; तू हुकूमत का तख़्त-ए-मश्क बनने के लिए पैदा नहीं हुआ है बल्कि हुकूमत करने के लिए पैदा हुआ है ; तू अपने असली स्वरूप को पहचान ले…”.

पंजाब में 1923 से लेकर 1947 तक यूनियनिस्ट पार्टी की सरकार रही और उस सरकार ने विकास की जो बुनियाद रखी उसका फर्क आज भी अन्य राज्यों से तुलना करके देख सकते हैं. जबकि आज़ादी के बाद पश्चिम बंगाल में किसान मजदुर की बात करने वाली कम्युनिस्ट सरकार रही बावजूद उसके पश्चिम बंगाल में किसान और मजदुर के हालात देख लीजिये. पश्चिम बंगाल से ही हथियार बंद नक्सलवाद आन्दोलन की शुरुआत हुई और आजतक जारी है. जबकि सर छोटूराम ने ब्रिटिश हुकूमत के समय ही बिना किसी हथियारबद आन्दोलन के ये चमत्कार करके दिखाया. उन्होंने न सिर्फ किसान को कर्ज से राहत दिलवाई बल्कि सिंचाई योजनाओं से पंजाब को अनाज का टोकरा बना दिया. 2019 में केरल सरकार ने अपने राज्य में कर्जा माफ़ी मॉडल लागु किया तो योजना आयोग के उपाध्यक्ष श्री प्रभात पटनायक ने मीडिया के सामने कहा कि उन्हें इस मॉडल की प्रेरणा पंजाब में सर छोटूराम कर्जा राहत योजना से मिली, जिसमें उन्होंने एक आयोग बनाया और उस आयोग के सदस्य गाँव गाँव जाकर हालातों का जायजा लेते. ये थे उनकी किसान लामबंदी के कारण.

 सर छोटूराम के जाने के बाद देश के किसान की लामबंदी उनसे अगले पायदान के नेता चौधरी चरण सिंह ने की. जो कानून पंजाब में लागु हुए थे वे कानून चौधरी चरण सिंह ने यूपी में लागू करवाए. चौधरी चरण सिंह ही थे जिन्होनें अपनी ही पार्टी के नेता और देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु का रूस की तर्ज पर कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की बात का विरोध किया था. चौधरी चरण सिंह के समय में किसान की लामबंदी की मिसाल उनके द्वारा 27 दिसम्बर, 1977बोट क्लब दिल्ली में की गई रैली थी, जो आजतक एक रिकोर्ड है. इस रैली में पंजाब से अकाली, बिहार से कर्पूरी ठाकुर जैसे समाजवादी नेता महाराष्ट्र से शरद जोशी जैसे किसान नेता जिनकी अगुवाई में महाराष्ट्र के तम्बाकू किसानों ने एक बड़ा आन्दोलन किया था, सब शरीक हुए. दिल्ली में किसानों की इस रैली से देश की राजनीति में एक नया सन्देश गया. इस किसान रैली से कांग्रेस पार्टी समझ चुकी थी कि अब देश में किसान ही राजनीति की धुरी होंगें इसलिए श्रीमती इंदिरा गाँधी ने 16 नवम्बर, 1981में दिल्ली में एक बड़ी किसान रैली का आयोजन किया जो उस समय की मीडिया ने बहुत सफल रैली बताई थी ज्सिमें देश से लाखों की संख्या में किसान आए.

चौधरी चरण सिंह के बाद देश का किसान चौधरी देवीलाल की अगुवाई में लामबंद हुआ. इनका साथ दिया किसान नेता चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत जैसे किसान नेताओं ने, पंजाब के अकाली गुजरात के पटेलों ने तो बिहार से लालूप्रसाद यादव, नितीश कुमार व् मुलायम सिंह यादव, शरद यादव जैसे नेताओं ने. केंद्र की सत्ता में आते ही चौधरी देवी लाल ने देश के किसानों का कर्जा माफ़ किया. चौधरी देवी लाल ने भी दिल्ली में एक सफल किसान रैली का आयोजन किया. पर यह किसान लामबंदी ज्यादा लम्बी न चल सकी. इसके टूटने के दो कारण बने. पहला वीपी सिंह सरकार द्वारा मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करना. इस रिपोर्ट में किसी राज्य की एक जाति को ओबीसी में शामिल कर लिया गया तो वहीँ दुसरे राज्य कि इसी जाति को अगड़ा की श्रेणी में मान लिया गया.  यहाँ से किसान लामबंदी ओबीसी के जाल में उलझ गई. दूसरा कारण बना, उस समय बीजेपी नेता श्री लाल कृष्ण अडवाणी द्वारा शुरू की गई राम मंदिर रथ यात्रा. चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की रैलियों में कभी किसान एक ही मंच से नारा लगाया “अल्लाह-हु-अकबर. हर-हर महादेव”. राम मंदिर रथ यात्रा के बाद किसान भी धर्मो की राजनीति में बंटता गया और उनका “अल्लाह-हु-अकबर, हर-हर महादेव” का नारा अब “बच्चा बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का” का हो गया था.   

 नब्बे के दशक से राष्ट्रीय स्तर पर किसान राजनीति हाशिये पर जाना शुरू हो गई. ऐसा कोई नेता नहीं रहा जिसके चेहरे से राष्ट्रिय स्तर पर किसान लामबंदी हो सके. जो किसान नेता ओबीसी की राजनीति में बंट कर खुद को किसान की बजाए अब ओबीसी वर्ग का अगुवा कहने लगे थे उन्हें तो इस ओबीसी वर्ग की अगुवाई भी करनी नहीं आई. सबसे पहले तो कोर्ट ने मंडल कमीशन की सिफारिश पर जो कोटा घटाया उस पर भी ये चुप रहे और उसके बाद आये साल कितनी ही वैकेंसियाँ बैकलॉग की खाली रह जाती हैं उन पर भी ये आजतक कुछ नहीं कर पाए.  इन्हें तो ठीक से ओबीसी वर्ग का नेतृत्व करना भी नहीं आया और यही कारण है कि किसान के बंटवारे के बाद अब ओबीसी वर्ग भी दो हिस्सों में बंटता जा रहा है, एक वर्ग खुद को मूल ओबीसी कह दुसरे वर्ग का विरोध कर रहा है.  और राष्ट्रीय राजनीतिक दल भी यही चाहते थे कि किसी न किसी तरह किसान केंद्र की राजनीतिक धुरी से हटे. इसके लिए इन राजनीतिक दलों ने एक डाव और चला, इन दलों ने अपने-अपनी पार्टियों में अलग से किसान प्रकोष्ठ बना दिए. जैसे कि कांग्रेस का किसान खेत मजदुर कांग्रेस तो बीजेपी का भाजपा किसान मोर्चा. ये सब संगठन दरअसल किसान यूनियनों की पीठ तोड़ने के लिए बनाए गए हैं और किसान की आँख में धुल झोंकने के लिए कि देखिये हमारी पार्टी किसान के चिंतित है इसलिए अलग से किसान प्रकोष्ठ भी है. और कभी कभी कोई बड़ा किसान आन्दोलन हो तो ये पार्टियों के किसान संगठन उस आन्दोलन को भटकाने या ख़त्म करने के काम भी आते हैं.

किसान लामबंदी ख़त्म होने का एक और कारण हैं और वह यह कि कभी जिन चेहरों पर किसान लामबंद हुआ करते थे आज उनमें से अधिकतर की अगली पीढियां भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. भ्रष्ट्र व्यवस्था से लड़ते लड़ते पता ही नहीं चला कि कब खुद उस पाले में आ गए. आज ये गाँव में चालीस-पचास लाख की गाड़ियों में जाते हैं, कलाई पर पांच-दस लाख की ब्रांडेड घडी बंदी होती है, और फिर उस ब्रांडेड घडी वाली कलाई को हवा में लहराते हुए कहते हैं कि हम किसान की आवाज़ हैं, हम किसान के लिए लड़ेंगे. अब जिस किसान की कोशिश यही रहती है कि अगर इस साल ढंग की फसल हो जाए तो ढंग का मकान बना लूँ, छोरी का ब्याह ढंग से कर दूँ, या बालकों का किसी अच्छी शिक्षण संस्था में दाखिला करवा दूँ, क्या ऐसा करके ये नेता उस किसान को खिझा नहीं रहे ? अब तो किसान भी थक हार कर इन नेताओं की चापलूसी सीख गया है. किसान को अब तरक्की का यही शॉर्टकट लगने लगा है. और जो किसान के बच्चे इनकी चापलूसी करके राजस्व विभाग में, कृषि विभाग में या अन्य जिस भी विभाग में जिनका वास्ता आए दिन किसान देहातियों से पड़ता रहता है उनसे ही रिश्वत लेने में हिचक नहीं करते. हमारे नेता तो पूंजीवादी व्यवस्था का शिकार हुए ही हुए, किसान भी शिकार होता जा रहा है, और पैसा ही पीर है मानने लगा है. यही कारण है कि आज देहात अनाथ है, शहर आबाद हैं. सरकार गाँव गोद लेने की बात करती है और शहर को स्मार्ट बनाने की. सर छोटूराम हमें जो बुनियादी विचार देकर गए थे यदि हम उन पर चलते तो क्या आज गाँव अनाथ होते ?

वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे,
कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख।

अब देखने में आता है कि देश में जगह जगह किसान आन्दोलन करते हैं पर वह देश व्यापी तो छोडिये राज्य व्यापी भी करने में सफल नहीं हो पाते हैं. 2017 में तमिलनाडु के किसान काफी दिनों तक दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना दिए रहे थे. मैं खुद भी अपने साथियों के साथ दो बार उनके धरने पर गया था. वहां हरियाणा यूपी से काफी संगठन उनकी हौसलाफजाई के लिए आते,  पर उनके साथ भाषा की दिक्कत थी, और हम लोकल भी जो जाते वह सिर्फ औपचारिकता पूरी करने जा रहे थे. यदि कोई बड़ा चेहरा होता तो उनकी सुनवाई में इतना वक्त न लगता. पर अब जब ऐसा कोई बड़ा चेहरा किसान के पास है नहीं जिसके चेहरे पर देश का किसान लामबंद हो सके तो ऐसे हालतों में बंटे हुए किसान के पास एक ही विकल्प है कि उनके जितने भी छोटे छोटे संगठन हैं वह “एक प्रतीक” का विकल्प चुनें. आप हम सब देखते हैं कि आज दुनियाभर के दलित संगठन हैं पर जब उनकी कोई मांग होती है तो सरकार तुरंत हरकत में आती है, हरकत में आने का कारण है सभी संगठनों का प्रतीक एक, और वह है डॉक्टर आंबेडकर. सो ऐसे ही किसान संगठनों को एक प्रतीक चुनना होगा और मेरी समझ अनुसार उस प्रतीक के लिए सर छोटूराम से बढ़कर कोई नहीं. केरल योजना आयोग वाले भी कर्जा माफ़ी मॉडल बनाते वक्त सर छोटूराम को पढ़ रहें हैं तो फिर “सर छोटूराम” सबका एक साँझा प्रतीक क्यों न हो ? दुनिया प्रतीकों से चलती है. दुनियां में जितने भी धर्म हैं इन्हें ही देख लीजिये, इनको बनाने वाले सदियों पहलें जा लिए पर इनके अनुयायी आज भी उनके प्रतीकों के सहारे उनके बनाए धर्मों को चला रहें हैं. सो किसान को भी ये प्रतीक वाला दस्तूर समझना और अपनाना होगा. सभी संगठनों का प्रतीक एक होगा तो अलग अलग होते हुए भी सब एक दिखेंगे. “एक प्रतीक” ही “अनेकता में एकता” और किसान लामबंदी का सूत्रधार है अब.

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