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जीडीपी घटकर 6.6 फीसदी पर पहुंची, राजकोषीय घाटे में हो रही लगातार बढ़ोतरी

GDP/ राजकोषीय घाटा / विनिवेश को लेकर बड़ी खबरें आयी हैं, लेकिन इन आंकड़ों से जुड़ी सच्चाई कुछ ऐसे पेश की जाती है कि पब्लिक को आसानी से बेवकूफ बनाया जा सके। उदाहरण के तौर पर ‘Live हिंदुस्तान’ की यह हेडलाइन देखिए…… ‘तीसरी तिमाही में भारत की GDP दर 6.6 फीसद, फिर भी दुनिया की सबसे तेज अर्थव्यवस्था’…. इस हेडलाइन को पढ़ने के बाद एक आम पाठक को क्या समझ आएगा?

असलियत यह है कि सरकार द्वारा फेब्रिकेटेड आंकड़े बनाने की कोशिशें कर लेने के बावजूद जीडीपी के मौजूदा आंकड़े पांच साल में सबसे खराब रहे हैं।

तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर) में देश की आर्थिक वृद्धि दर 6.6 प्रतिशत रही है। यह पिछली पांच तिमाही में सबसे कम है…….

मोदी सरकार के आखिरी साल में आर्थिक वृद्धि के अनुमान लगातार घटाये जा रहे हैं और राजकोषीय घाटा बढ़ रहा है. चालू वित्त वर्ष में जनवरी तक राजकोषीय घाटा इसके तय लक्ष्य का 121.5 प्रतिशत तक पहुंच गया हैं। लेखा महानियंत्रक (सीजीए) के आंकड़ों से पता चलता है कि केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा 7.7 लाख करोड़ रुपये रहेगा, जो 6.34 लाख करोड़ रुपये पुनरीक्षित लक्ष्य से 21.5 प्रतिशत ज्यादा है.

जनवरी तक सरकार का राजस्व संग्रह 11.81 लाख करोड़ रुपये रहा जो 2018-19 के संशोधित बजट अनुमानों का 68.3 प्रतिशत है। वहीं, इससे पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में यह आंकड़ा 72.8 प्रतिशत रहा था, यानी प्रतिशत को देखा जाए तो यह पिछले साल से भी कम है.

कुल आमदनी की बात करें तो प्रत्यक्ष कर में तो ठीकठाक वृद्धि हुई है, लेकिन अप्रत्यक्ष कर संग्रह के मोर्चे पर सरकार का प्रदर्शन लचर साबित हुआ है.

हाल के बजट में 2018-19 के लिए पुनरीक्षित केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर (सीजीएसटी) संग्रह का लक्ष्य 5.03 लाख करोड़ रुपये रखा गया था, जो पहले के 6.03 लाख करोड़ रुपये के बजट लक्ष्य से 1 लाख करोड़ रुपये कम है। उसके बावजूद अभी जनवरी तक का सीजीएसटी संग्रह 3.75 लाख करोड़ रुपये ही रहा हैं.

विनिवेश में भी इस साल सरकार पीछे रह गई है. सीजीए के आंकड़ों से पता चलता है कि जनवरी तक सरकार ने सिर्फ 35,606 करोड़ रुपये जुटाए हैं, जो 80,000 करोड़ रुपये विनिवेश लक्ष्य का 44.5 प्रतिशत है। इसके बावजूद सरकार ने वित्त वर्ष 2019-20 में विनिवेश से 90,000 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है.

अब तो BSNL को भी बंद किये जाने के विकल्प पर विचार किया जा रहा है…..

इन सब बातों का ही परिणाम है कि सोने का अंडा देने वाली मुर्गी रिजर्व बैंक का पेट फाड़कर सारे अंडे एक साथ निकालने की कोशिश की जा रही हैं………

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