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कश्मीर से ग्राउंड रिपोर्ट: जानिए क्या चल रहा है घाटी में

कश्मीर से इंडियन एक्सप्रेस की ग्राउंड रिपोर्ट-

कश्मीर में जगह-जगह नाकाबंदी है. अस्पतालों, एयरपोर्ट और दूसरे जरूरी स्थानों पर जाने के लिए लोगों को कर्फ्यू पास की जरूरत है. सरकारी पहचान पत्रों को कर्फ्यू पास के तौर पर मान्यता नहीं मिल रही है. कर्फ्यू पास बनवाने के लिए डेपुटी कमिश्नर के ऑफिस जाना जरूरी है. लेकिन डेपुटी कमिश्नर के ऑफिस तक जाने के लिए ही कई सारी बैरिकेडिंग से गुजरना है. इसके लिए कर्फ्यू पास की जरूरत है. प्रशासन ने अपने भी कर्मचारियों को कर्फ्यू पास जारी नहीं किए हैं.

नौगाम में एक 22 साल के नौजवान को एक वाहन ने टक्कर मार दी. एक मारुति वैन का ड्राइवर युवक को लेकर महाराजा हरि सिंह अस्पताल ले जाने लगा. हर बैरिकेड पर वैन को रोका गया. बहुत मुश्किल से सुरक्षाबलों को समझाने के बाद ढाई घंटे में ड्राइवर अस्पताल पहुंच पाया, लेकिन तब तक युवक की मौत हो गई.

घाटी के मुख्यधारा के नेताओं का मानना है कि यह 1846 के बाद से कश्मीर के लोगों पर मनमाने तरीके से थोपा गया सबसे बड़ा एकतरफा निर्णय है और इसके खिलाफ बहुत बड़ी प्रतिक्रिया आने वाली है.

घाटी का भविष्य अनिश्चितताओं से भरा है. बाहरी और भीतरी दोनों तरह से घाटी का संपर्क काट दिया गया है. इंटरनेट, टीवी, सेल्युलर फोन इत्यादि सेवाएं बंद हैं.

प्रेस को कोई स्वतंत्रता नहीं दी जा रही है. जितने भी टीवी वाले वहां पहुंचे हैं, उन्हें शहर के जीरो ब्रिज से आगे नहीं जाने दिया जा रहा है. इस इलाके में ही सुरक्षाबलों की संख्या कम है. इसी को टीवी वाले दिखा रहे हैं और कह रहे हैं कि कश्मीर में हालात सामान्य हैं.

जहांगीर चौक के पास एक पत्रकार ने कर्फ्यू को फिल्माने की कोशिश की तो उसके साथ सुरक्षाबलों ने बदसलूकी की.

इंडियन एक्सप्रेस की बिल्डिंग सुरक्षाबलों की अस्थाई आवास बन गई है. इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार कहीं नहीं जा पा रहे हैं. वे बस आसपास के निवासियों से ही मिल पा रहे हैं. ज्यादातर सरकारी इमारतों, स्कूलों, कॉलेजों और कोर्ट्स को दूसरे राज्यों से आए सुरक्षाबलों ने अपना ठिकाना बना लिया है.

कश्मीर के लोगों को लग रहा है कि सरकार इस फैसले से मुस्लिम बहुल कश्मीर की जनसांख्यिकी को बदलकर इसमें मुसलमानों के अनुपात को घटाना चाहती है. इसको लेकर उनके बीच भयंकर गुस्सा है.

घाटी में प्रो इंडिया पॉलिटिक्स करने वालों का महत्व पूरी तरह से समाप्ति की कगार पर है. अलगाववादी बहुत तेजी से और मजबूत होते जा रहे हैं. वे कह रहे हैं कि उन्होंने पहले ही बताया था कि भारत कश्मीर के साथ ऐसा ही करेगा.

पीडीपी के एक नेता का कहना है कि केंद्र सरकार ने घाटी की उन मुस्लिम आवाजों को महत्वहीन बना दिया है जिन्होंने सेक्युलर इंडिया के विचार में विश्वास किया और घाटी को भारत में जोड़े रखने के लिए अपनी जान की भी कुर्बानी दी.

घाटी में मुख्यधारा के राजनीतिक दलों के लिए अब कुछ नहीं बचा है. नेशनल कॉन्फ्रेंस से लेकर नए-नवेले शाह फैसल तक सब महत्वहीन हो चुके हैं. लोगों का मानना है कि अब मुख्यधारा के नेताओं को संयुक्त प्रतिरोध खड़ा करने की जरूरत है.

नेशनल कॉन्फ्रेंस के एक कार्यकर्ता ने बताया, “मेरे पिता प्रो-इंडिया पॉलिटिक्स करते थे. इसकी वजह से मिलिटेंट्स ने उन्हें गोली मार दी. उनके जाने के बाद मैंने राजनीति में कदम रखा. लेकिन केंद्र सरकार के इस कदम के बाद मुझे अपने पिता और अपनी बुद्धिमत्ता पर शक हो रहा है. अगर अब मुख्यधारा के लोग खड़े नहीं होते हैं तो मुझे अपने राजनीतिक भविष्य के बारे में सोचना पड़ेगा.”

मुरारी त्रिपाठी

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