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ऐ लड़की समाज

500 रुपये जुर्माने का डर दिखाकर महाराष्ट्र की महिला मज़दूरों का गर्भाशय निकाला जाता है

मेरे पीरियड्स का दूसरा दिन चल रहा है। पीरियड्स के दूसरे दिन बाकी दिनों के मुकाबले अधिक रक्तस्त्राव, पेट दर्द, पैरों और कमर दर्द की शिकायत आम है। हमारे देश के कार्यालयों में आज भी पीरियड्स लीव के नाम पर मालिक आश्चर्य जताते नज़र आते हैं। बातें तो बहुत होती है पर जब बात लागू करने की आती है तो सब हंसकर टाल देते हैं कि पीरियड्स के लिए कैसी छुट्टी, मैटरनीटी लीव मिल रही है वही क्या कम है। पीरियड्स के नाम पर मुंह बिचकाने वाले मर्दवादी समाज के लिए पीरियड्स सिर्फ शहरी महिलाओं के चोंचले हैं। माय बॉडी माय राइट्स को एक दकियानूसी ख्याल कहकर खारिज किया जाता है।

आइए, आपको आज एक ऐसे जिले की कहानी बताते हैं जहां पीरियड्स के चलते होने वाली गैरमौजूदगी पर खेतिहर महिला मजदूरों से 500 रुपये जुर्माना वसूला जाता है। ये कहानी महाराष्ट्र के बीड़ जिले की है। गरीब तबके की ये महिलाएं 500 रुपये का जुर्माना नहीं दे सकती। इस जुर्माने से बचने के लिए वे अपना गर्भाशय ही निकलवा देती हैं ताकी उनकी महावारी रुक जाए। सुनकर आश्चर्य होता है न। जिस देश में पीरियड्स के नाम पर ऑस्कर आता है यह उसी देश में हो रहा है। यह स्टोरी बिजनस लाइन के लिए राधेश्याम जाधव ने की है जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं। अब सरकार ने इस रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए कार्रवाई के आदेश दे दिए हैं।

गन्ने काटने के मौसम में ये महिलाएं दूसरे के खेतों में गन्ने काटने जाती हैं। 6 महीनों के इस मौसम में एक दिन की गैरमौजूदगी के बदले खेतों के मालिक/ठेकेदार इन महिलाओं पर 500 रुपये का जुर्माना लगा देता है। इस जुर्माने से ही बचने के लिए वे अपना गर्भाशय निकलवा देती हैं ताकि पीरियड्स के कारण उनका काम न रुके। यह सुनकर सिहरन होती है पर यह सच्चाई है। इतना ही नहीं महिलाएं बताती हैं कि ठेकेदार उन्हें सर्जरी के लिए एडवांस भी देते हैं। हम पीरियड्स पर पेड लीव की मांग करते हैं पर कुछ महिलाओं के पास यह कहने का हक तो दूर उनके पास पीरियड्स के होने का भी अधिकार मौजूद नहीं है। वह इसका खामियाजा अपने गर्भाशय निकलवाकर चुका रही हैं।

नारीवादी लेखिका सिमॉन लिखती हैं कि एक लड़की के शरीर में होने वाले बदलाव हमेशा उसके लिए बेहद तकलीफदेह और विपरीत लिंग से अलग रखने वाले होते हैं। जैसे-जैसे एक लड़की के शरीर में बदलाव आता है समाज का रवैया उसके प्रति बेहद डरावना और अलग होता जाता है। लड़कियों को उनकी मर्जी के बगैर सिर्फ एक मांस का टुकड़ा मान लिया जाता है। बीड़ की महिलाओं को ऐसा ही एक मांस का टुकड़ा समझा जाता होगा। तभी ठेकेदारों को एक बड़े मांस के टुकड़े से एक छोटा मांस का टुकड़ा निकालने में कोई तकलीफ नहीं होती होगी।

“The young girl feels that her body is getting away from her… on the street men follow her with their eyes and comment on her anatomy. She would like to be invisible; it frightens her to become flesh and to show flesh”

सिर्फ मां न बन पाने का दुख भी मर्दवादी समाज ने गढ़ा

महिलाओं का गर्भाशय निकालने पर एक सोच जो यह निकलकर आई कि बीड़ की महिलाएं मां नहीं बन पाएंगी। 500 रुपये के लिए उन्हें 25 साल की छोटी उम्र में ही अपने गर्भाशय निकलवाना पड़ रहा है। यहां बात सिर्फ मां बनने की नहीं है। हमने यह कैसे तय कर लिया कि महिलाएं जब अपना गर्भाशय निकलवा लेती हैं तो उन्हें दुख सिर्फ अपने मां नहीं बन पाने का होगा। महिलाएं सिर्फ मां नहीं होती, मां से पहले एक इंसान के रूप में उनके कुछ मूलभूत अधिकार होते हैं। यह मां बनने से अधिक किसी के मानवाधिकारों के हनन का मुद्दा है। पीरियड्स जो पूरी तरह से एक जैविक प्रक्रिया से उसे रोकने के लिए एक इंसान अपना एक स्वस्थ अंग निकालने को मजबूर है।

बीड़ की इन महिलाओं की समस्या इसी के इर्द-गिर्द है। यह ज़रूर है कि इनमें से कुछ महिलाओं को अपने इस फैसले के बाद मां न बन पाने का दुख होता होगा पर इससे पहले हम यह निष्कर्ष कैसे निकाल सकते हैं कि उन्हें दुख सिर्फ अपने मां न बन पाने का होगा। उन्हें दुख इस बात का भी हो सकता है कि उन्हें सामान्य महिलाओं की तरह अपने मेनोपॉज का इंतजार करने का भी हक नहीं है। मां न बन पाने के दुख वाला तर्क भी मर्दवादी समाज द्वारा ही गढ़ा जाता है। गर्भाशय निकालने के बाद वह किन मुश्किलों से गुजरती होंगी। गर्भाशय निकलवाने का फैसला वही समाज कर रहा है, जहां गर्भधारण, गर्भनिरोधक, गर्भापत से जुड़े फैसले भी महिलाएं खुद नहीं ले पाती। ऐसे में बीड़ की महिलाओं का असली दुख क्या है- मां न बन पाना या अपने शरीर के एक स्वस्थ अंग का खोना।

पीरियड्स में देख लेगा तो मुसीबत होगी

राधेश्याम जाधव की स्टोरी में एक महिला बताती हैं कि गन्ने के खेतों में उन्हें शारीरिक शोषण का भी सामना करना पड़ता है। इन शोषणों के बीच अगर पीरियड्स में उन्हें कोई देख लेगा तो उनके लिए और मुसीबत हो जाएगी। पीरियड्स में देख लेगा तो मुसीबत- एक महिला जो हर महीने पीरियड्स से गुजरती है, जिसके पास सैनिटरी प्रॉडक्ट्स आज तक नहीं पहुंच पाए, वह अपने ठेकेदारों के शोषण से बेहतर अपना गर्भाशय निकलवाना समझती है। यह तर्क पुराना हो चुका है पर बार-बार दोहराना बेहद जरूरी भी है- जिस महावारी का मानव जन्म से गहरा संबंध है उसे आज भी यह समाज अपनाने को तैयार नहीं होता।

पूंजीवादी व्यवस्था के ठेकेदार और सामंतवादी नशे में चूर ने महिलाओं का शारीरिक शोषण हर तरह से करते हैं- जब वे गन्ना काटती हैं तब, जब नहीं काटती हैं तब भी। इन हालातों में अगर कोई महिला मज़दूर अपना गर्भाशय न भी निकलवा पाए तब भी ठेकेदारों द्वारा होने वाला शारीरिक शोषण उनकी नीयति बन जाती है। प्रेमचंद की कहानियों में, अपने गांव में क्या हमने उच्च कुलीन वर्ग के पुरुषों द्वारा खेतों में काम करने वाली महिलाओं के शोषण के किस्से नहीं सुनते। अगर आपने नहीं सुने तो आप अब भी खेतों की हरियाली देखकर खुश हो जाने वालों में से हैं।

पीरियड्स पर सवाल पर स्वास्थ्य व्यवस्था, ठेकेदारों के शोषण पर चुप्पी

रिपोर्ट मे इस बात का ज़िक्र भी किया गया है कि किस तरह ठेकेदार महिलाओं को मजबूर करते हैं और गर्भाशय निकलवाने में निजी क्लिनिक और डॉक्टरों की मिलीभगत होती है। यहां जिन महिलाओं के साथ यह अमानवीय व्यवहार हो रहा वह मुख्य मुद्दा है इसमें 2 राय नहीं है पर इस चर्चा में जो छूट जाता है वह है शोषक। राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था, संविधान बनने के बाद भी ठेकेदारों की सामंती व्यवस्था पर सवाल क्यों नहीं उठते।

गर्भाशय निकलवाती नहीं, उनका गर्भाशय निकाला जाता है

जिस तरीके से लिखा जा रहा है कि महिलाएं अपना गर्भाशय निकलवा रही हैं यह बेहद गलत है। लिखा जाना चाहिए की बीड़ की महिलाओं का गर्भाशय निकाला जा रहा है। गरीबी रेखा से नीचे आने वाले परिवारों पर अगर आप एक दिन का 500 जुर्माना लगाएंगे, सर्जरी के लिए अडवांस देंगे, निजी डॉक्टर आपको हर बात पर गर्भाशय निकालने की सलाह देते रहेंगे, इस मकड़जाल में फंसी बीड़ की महिलाओं का गर्भाशयये मर्दवादी समाज निकालता है। बार-बार उसे कहा जाता है महावारी तुम्हारी कमज़ोरी है, इसे निजात पा लो वरना 500 दो। इन हालातों में अस्पताल के बेड पर लेटी बीड़ की महिला जरूर सोचती होगी कि इसमें मेरी सहमति नहीं है। अस्पताल से खाली पेट जब वह खेतों पर लौटती होगी तो अपने ठेकेदार को देखकर कहती होगी तुमने मुझसे एक सामान्य महिला होने का अधिकार भी छीन लिया। पीरियड्स पर तमाम तरह की बंदिशें, कहानियां, अंधविश्वास गढ़नेवाले लोग ही बीड़ में यह तय करतें हैं कि वहां की महिलाएं कब तक अपना गर्भाशय अपने साथ रख सकती हैं। जिन ठेकेदारों को गर्भाशय के साथ वाली महिला नागावार गुजरती है, क्योंकि वे अपने गन्ने का नुकसान नहीं सह सकते। इस पूंजीवादी व्यवस्था में महिलाओं के हक की बात कितनी ओछी लगती है। इस व्यवस्था ने ही इन महिलाओं के आस-पास ऐसा ताना-बाना बुन दिया कि वे खुद अपने ठेकेदारों से पैसे लेकर सर्जरी को मजबूर हैं।

इसलिए मैं बार-बार कहती हूं, “बीड़ की महिलाएं अपना गर्भाशय निकलवाती नहीं बल्कि उनका गर्भाशय निकाला जाता है।“

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