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रिपोर्ट

राजस्थान चुनाव में भाजपा-कांग्रेस की लंका ध्वस्त कर सकते हैं हनुमान !

राजस्थान की धरती पर पिछले कुछ समय से सत्ताविरोधी लहर चल रही है. सिर्फ राजस्थान ही नहीं बल्कि पूरे भारत में सूबे की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की लोकप्रियता में कमी आई है. राजनीति में दिलचस्पी रखने वाली राजस्थान से बाहर की जनता और दिल्ली के दफ्तरों में बंद पत्रकारों को लगता है कि सत्ताविरोधी लहर में कांग्रेस आसानी से मैदान मार लेगी. मगर राजस्थान के रेत(जमीनी) के लोग भाजपा और कांग्रेस दोनों की राजनीति को चुनौती देने में लगे हुए हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि 29 अक्टूबर को जयपुर के वीटी रोड मैदान में राजस्थान के चर्चित निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल अपनी रैली में दो लाख से ऊपर भीड़ जुटाने में सफल हुए हैं. रैली में उन्होंने अपनी नई पार्टी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी की घोषणा की, जिसका चुनाव चिन्ह है पानी की बोतल.

छात्रनेता से तीसरे मोर्चे के नेता तक

90 के दशक में राजस्थान की गैर कांग्रेसी-भाजपा दलों का वजूद खतरे में पड़ रहा था. इसी दौर में किसानों के कद्दावर नेता और दो बार के पूर्व विधायक रामदेव बेनीवाल 1990 और 1993 के दो चुनाव लगातार हार चुके थे. उनका सियासी सफर ढलान पर था। 1993 में उनके चुनाव हारने के एक साल बाद 1994 में उनका बेटा हनुमान बेनीवाल छात्र राजनीति में अपना पहला कदम रखता है और जयपुर के महाराजा कॉलेज के छात्रसंघ चुनाव में जीत हासिल करता है. लंबी दाढ़ी और लंबे चौड़े शरीर का ये नौजवान अपनी दबंग देहाती छवि के चलते बहुत कम समय में जयपुर में पढ़ने आए ग्रामीण युवाओं में पहचान कायम कर लेता है. जिसके चलते हनुमान बेनीवाल अगले साल फिर से महाराजा कॉलेज का अध्यक्ष चुने जाते हैं. 1996 में लॉ कॉलेज का अध्यक्ष रहने के बाद अगले साल 1997 में राजस्थान यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष की कुर्सी भी इन्हीं के हाथ लगती है. राजस्थान की छात्र राजनीति में बेनीवाल को ग्रामीण नेता का तगमा मिल गया था क्योंकि बेनीवाल ने अपने छात्र जीवन में एक मशहूर आंदोलन छेड़ा था, जिसे लोग ‘पांच टके का आंदोलन’ भी कहते थे. इस आंदोलन के जरिये उन्होंने ग्रामीण इलाकों से आने वाले छात्रों को एडमिशन के दौरान 5 प्रतिशत ज्यादा अंक देने की मांग की थी. उस समय भैरो सिंह शेखावत प्रदेश के मुखिया थे.

विधानसभा में अपने 58 विधायकों के दबाव में आकर उन्होंने यूनिवर्सिटी में धरना दे रहे हनुमान को गिरफ्तार कर लिया और 8 दिन जेल में रखा था. हनुमान को कैद करना शेखावत को महंगा पड़ा क्योंकि हज़ारों की तादात में देहाती छात्र सरकार के खिलाफ सड़कों पर आ गए थे. जिसके कारण सरकार को झुकना पड़ा और गांव के छात्रों को 5 फीसदी बोनस अंक देने वाली उनकी मांग माननी पड़ी थी. अगले ही साल 1998 में उनके पिताजी रामदेव बेनीवाल का विधानसभा चुनाव के कुछ दिन पहले ही निधन हो गया. पिता की राजनैतिक पारी संभालने की बारी आई तो उन्हें टिकट नहीं दिया गया. 2003 के विधानसभा चुनाव में मुंडवा सीट से उन्होंने इनेलो की तरफ से चुनाव लड़ा, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी.  2008 में बेनीवाल भाजपा के टिकट पर खींवसर से जीत हासिल कर पहली बार विधानसभा पहुंचे. लेकिन वसुंधरा राजे के साथ हनुमान बेनीवाल की दाल नहीं गली और 2011 में वसुंधरा और आडवाणी के खिलाफ दिए गए एक बयान के चलते हनुमान को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया.  2013 का चुनाव उन्होंने खींवसर से निर्दलीय लड़ा. उस समय नरेंद्र मोदी ने उनके खिलाफ रैली भी की, लेकिन भाजपा का उम्मीदवार उन्हें नहीं हरा सका. मोदी और भाजपा की लहर में भी हनुमान लगातार दूसरी बार विधानसभा पहुंचे थे.

किसानों और नौजवानों में तगड़ी पैठ

29 अक्टूबर को जयपुर में हुई हनुमान बेनीवाल की रैली में ज्यादातर नौजवान और किसान दिखाई दे रहे थे. नौजवान हनुमान बेनीवाल की फ़ोटो छपी हुई टीशर्ट पहनकर एक अजीब से उत्साह के साथ रैली मैदान में उछल-कूद कर रहे थे तो राजस्थान के किसान उकड़ू(इत्मीनान से) बैठकर रैली को देख रहे थे. नागौर से आए एक किसान से हनुमान के साथ जुड़ने का कारण पूछने पर बताया,
“हनुमान की वजह से हमारा कोई काम नहीं रुकता है. हमें सिर्फ एक फ़ोन करने की जरूरत पड़ती है और हनुमान हाज़िर हो जाता है. पिछले दिनों ही हमारे गांव की कई दिक्कतों को अफसर दूर नहीं कर रहे थे. एक बार हनुमान को फ़ोन मिलाते ही हनुमान हमारे बीच आ गया और अफसरों को खरी-खोटी सुनाकर हमारी सारी समस्याएं दूर करवाईं. हनुमान के अलावा किसानों के मुद्दे उठाने वाला राजस्थान में कोई नहीं है. अब बताओ किसान क्यों न हनुमान का साथ देवे.”
इतना बोलकर किसान गर्व सा महसूस करने लगा और अपना ध्यान स्टेज पर लगा लिया.

यह 29 अक्टूबर की जयपुर रैली की तस्वीर है.

राजस्थान देहात का बेताज बादशाह

पिछले कुछ सालों से ही हनुमान किसानों के मुद्दों के लिए सड़क से लेकर सदन तक लड़ाई लड़ रहा है. इसी वजह से बेनीवाल राजस्थान के किसानों का विश्वास जीतने में कामयाब रहा है. लगभग हर दिन देहात के लोगों के बीच घूमते रहने वाले इस शख्स ने अब तक पांच बड़ी किसान हुंकार रैलियां की हैं जिनमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों से भी ज्यादा भीड़ देखने को मिली हैं. विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इतनी बड़ी रैली करके उन्होंने होने राजस्थान की चुनाव में मज़बूत दावेदारी पेश की है. रैली के स्टेज पर रालोद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयंत चौधरी, भारत वाहिनी पार्टी के घनश्याम तिवाड़ी, समाजवादी पार्टी के नेता संजय लाठर, यूनियनिस्ट मिशन के नेता देव लोहान मौजूद रहे. अपने भाषणों में गैर भाजपा-कांग्रेस दलों के नेताओं ने तीसरे मोर्चे के संकेत दिए हैं. सभी दलों ने हनुमान बेनीवाल की अगुवाई में चुनाव लड़ने की बात कही है. सभी नेताओं ने भाजपा की किसान विरोधी नीतियों का जिक्र करते हुए किसान हितों की राजनीति करने की बात भी कही है.
1990 के बाद से ही राजस्थान की राजनीति में तीसरे मोर्चे का कोई खास वजूद नहीं रहा है. लेकिन इस बार हनुमान बेनीवाल के साथ लोगों की भीड़ को देखकर इतिहास बदलता दिखाई दे रहा है.

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