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हरफूल जाट जुलानी: मिथक, इतिहास और वर्तमान

-राकेश सांगवान

डाकू हरफूल सिंह जाट सिख थे ?
हमने हरफूल जाट जुलानी वाला का नाम और क़िस्से बहुत सुने हैं। पर हरफूल जाट के नाम के साथ सिख देख कर आप हैरान हुए होंगें, मैं भी हुआ था कि ऐसे कैसे! हरफूल जाट मूल रूप से लोहारू तहसील के बारवास गाँव से थे और श्योराण गोत्र के जाट थे। ये भी डाकू जग्गा ज़ट के समकालीन थे। हरफूल जाट पर अनेकों मिसालें बनी हैं। हर किसी ने उन्हें अपने अनुसार अपनी क़लम में इस्तेमाल किया है। गौरक्षकों में उन्हें एक घोर गौरक्षक के तौर पर प्रस्तुत किया तो हिंदुवादियों ने एक कट्टर हिंदू। आज से ठीक सो साल पहले कि अख़बार की इस ख़बर से हिंदुवादियों और गौरक्षकों ने हरफूल जाट के बारे में जो कहानियाँ बना रखी हैं उनका दम निकलता दिखता है। उसकी कुछ वारदातों को उस समय भी साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश की गई थी, जिस पर टाइम्ज़ ओफ़ इंडिया अख़बार के संवादाता ने उन सभी घटनाओं पर जाँचपड़ताल कर यह पूरी रिपोर्ट लिखी थी। इसमें जो सबसे ख़ास बात है वह है इस रिपोर्ट की शुरुआती लाइन ‘ सिख डाकू के कारनामे’! अब उन्हें सिख क्यों लिखा गया यह भी विचारणीय बात है और यह भी उसने ऐसे ही नहीं लिख दिया, जींद, पटियाला रियासत और हिसार जिले में काफ़ी घूमने जानने के बाद ही लिखा होगा! शायद उस वक़्त तक हिंदू व सिख जाटों में इतना भेद न रहा होगा ? ख़ैर, ख़बर की हेड्लायन और ख़बर में घटनाओं का विवरण ग़ौर करने लायक है। ख़बर को थोड़ा संक्षेप में लिखता हूँ –

पंजाब में आतंक का शासन
निर्दय धूर्त और पैदाइशी अपराधी जिसके सिर पर ईनाम है
एक सिख डाकू के कारनामों, जिसने बाईस क़त्ल किये हैं, जिसका जींद पटियाला रियासत व साथ लगते पंजाब के जिलों में आतंक है, के बारे में नीचे बयान किया है।
23 जलाई को ज़िला हिसार के टोहाना में जो हुआ उस पर सच्ची कहानी, जिसमें कई लोग गोलियों से मारे दिए गए और गाँव में आतंक का माहौल क़ायम कर दिया। यहाँ साम्प्रदायिक तनाव का जो माहौल बना था उसका इस से कुछ लेना देना नहीं था। ये हत्याएँ एक हरफूल सिंह नाम के डाकू ने की थी जो पिछले कुछ समय से जींद-पटियाला रियासत व हिसार जिले में सक्रिय है।

ख़ूँख़ार हत्यारा
साम्प्रदायिक तनाव की आड़ लेते हुए हरफूल सिंह ने टोहाना ग़ाँव पर अचानक हमला कर दिया। हरफूल सिंह अब तुरबाज के बाद दूसरे नम्बर का ख़ूँख़ार अपराधी था। तुरबाज ने 48 क़त्ल किए थे और पुलिस की गोली से मारा गया था। हरफूल सिंह के अभी 22 क़त्ल से कम नहीं थे। जिनमें तीन अधिकारी, आधा दर्जन से ज़्यादा हिंदू मारे थे। उसका ताज़ातरीन कारनामा 23 जुलाई (1930) को टोहाना का था। जिसमें उसने 14 क़त्ल किए।

टोहाना पर चढ़ाई
23 जलाई (1930) को हरफूल सिंह अपने एक साथी के साथ टोहाना में दाख़िल हुआ और दहशत के लिए अपनी बंदूक़ से अंधाधुँध गोलियाँ चलानी शुरू कर दी। इस गोलीबारी में सात मुस्लिम कसाई व पाँच हिंदू माली मज़दूर मारे गए व काफ़ी घायल हुए। इसके बाद हरफूल सिंह वहाँ एक हिंदू साहूकार के घर में दाख़िल हुआ। साहूकार ने उससे कहा कि उसके पास पैसा नहीं है तो हरफूल सिंह ने उस बनिये की गोली मार कर हत्या कर दी और वहाँ जो भी नक़दी व गहने मिले लूट लिए।

हरफूल सिंह ने डाकू मणिलाल जाट के गिरोह से अपने इस बाग़ी जीवन की शुरुआत की थी।
अपनी दहशत ज़माने के लिए दो साल पहले (1928) हरफूल सिंह ने आधी रात को जींद रेलवे स्टेशन के पास सरकारी ड्यूटी पर टाँगे में जा रहे डॉक्टर देशराज के गोली मारी, जो डॉक्टर के पैर में लगने से उसकी जान बच गई।

हरफूल सिंह का अगला शिकार उसकी बहन का ससुर था, जो डाकुओं के गतिविधियों के कारण पुलिस की कार्यवाही से परेशान हो चुका था। उसने हरफूल सिंह को उसके घर आने से मना किया तो हरफूल सिंह ने उसकी गोली मार कर हत्या कर दी।

इसके बाद हरफूल सिंह ने नरवाना में एक मुस्लिम कसाई को लूटा। हरफूल सिंह की वारदातों से जींद रियासत का प्रशासन तंग आ चुका था। पुलिस सब-इन्स्पेक्टर दयाकिशन को हरफूल सिंह को पकड़ने की ज़िम्मेवारी दी गई। दयाकिशन ने हरफूल सिंह को पकड़ने के लिए हर जगह दबिश शुरू कर दी। वह हरफूल सिंह को पकड़ने में लगभग कामयाब हो गया था परंतु एक दिन हरफूल सिंह, जोकि बड़ा दिलेर था, ने एक गाँव में दयाकिशन पर हमला कर उसे मार दिया।
इसके बाद महीने भीतर ही हरफूल सिंह ने रोहतक के सवनमल (sawanmal) में दो मुस्लिम कसाइयों की हत्या की। उसका कहना था कि ये दोनों कसाई उसे मारना चाहते थे।
हरफूल सिंह की उम्र 29 साल, क़द 5 फूट 7 इंच, रंग गेहूँआ, ऊपर सामने का दाँत हल्का फींका है, दाड़ी नहीं रखता है और भेष बदलता रहता है। सरकार ने डाकू को पकड़वाने के लिए ज़मीन का रक़बा व नक़द ईनाम रखा है। हिसार पुलिस सुपरिटेंडेंट ने इस ख़ूँख़ार डाकू की दहशत ख़त्म करने के लिए पड़ोसी रियासत की सीमा पर गश्त व नाकाबंदी बढ़ा दी है।

(Times of India ; August 9 , 1930 ; page 10)

:- अब इस रिपोर्ट में दो बातें हैं –

  1. जैसा कि आज के कट्टरपंथी हरफूल जाट को साम्प्रदायिक दिखाने की कोशिश करते हैं वो वैसा बिलकुल नहीं थे। क्योंकि उन्होंने जितनी हत्याएँ की उनमें लगभग आधा हिस्सा हिंदू हैं। वो डाका डालते थे और डाका धन दौलत वाले के यही डाला जाएगा। तो उस वक़्त में धन दौलत हिंदू साहूकारों के पास थी। मुस्लिमों में ब्याजबट्टे का काम पाप माना जाता है तो उनमें कसाइयों के पास धन ज़्यादा होता था। कसाइयों के यहाँ डाके व हत्या को उस ज़माने के साम्प्रदायिक सोच के लोग गौहत्थो से जोड़ देते थे। जब एक वर्ग की जनसहानुभूति मिल रही हो तो हरफूल जाट भी क्यों मना करेगा?
  2. रिपोर्ट में पत्रकार हरफूल जाट के हुलिये के बारे में लिखता है कि वह भेष बदलता रहता था और दाड़ी नहीं रखता था। तो फिर पत्रकार ने उन्हें सिख किस आधार पर लिखा होगा? उसने जो भी लिखा वह लोगों व प्रशासन की सूचना के आधार पर लिखा है तो क्या हरफूल जाट सिख थे?

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