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नफरत में धंसते जा रहे भारत के लिए न्‍यूज़ीलैंड से मोहब्‍बत का पैग़ाम

आतंकी हमले के एक सप्ताह बाद न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च में शुक्रवार की नमाज अदा करते हुए इमाम गमाल फौदा ने कहा, “हमारे दिल टूटे हुए हैं, लेकिन हम टूटे नहीं है.” “हम जिंदा हैं, हम एक साथ हैं और हमारा संकल्‍प है कि कोई हमें बांट नहीं सकता.”

भयावह त्रासदी की इस घड़ी में, न्यूजीलैंड के लोगों ने धर्मांधता और नफरत से भरी हुई दुनिया को यह दिखा दिया है कि सबसे खराब समय में भी एकजुटता और मोहब्बत से क्या कर सकते हैं. विभाजन के खून-खराबे के समय की तुलना में आज अधिक विभाजित भारतीयों के लिए यह एक ऐसी शिक्षा है, जिस पर हमें जरूर गौर करनी चाहिए. लेकिन क्या हम ऐसा करेंगे?

एकजुटता का प्रदर्शन

श्रद्धांजलि सभा से पहले अज़ान को पूरे न्यूजीलैंड में प्रसारित किया गया. जिन मस्जिदों में आतंकवादी ने नमाजियों का नरसंहार किया, वहां और देश भर की अन्य मस्जिदों में सैकड़ों पुरुष, महिलाएं और बच्चे मृतकों के परिवारों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए इकट्ठा हुए. उन्होंने एक-दूसरे के साथ अपने हाथ जोड़कर, इबादत कर रहे अपने मुस्लिम भाइयों और बहनों के चारों ओर एक मानव सुरक्षा दीवार बनाई. वहां शामिल कई महिलाओं ने हिजाब पहना हुआ था.

न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जैसिंडा आर्डर्न प्रार्थना सभा में शामिल हुईं. उनका सिर काले दुपट्टे से ढका था. इबादत के बाद उन्होंने पैगंबर मोहम्मद का हवाला देते हुए कहा, “पैगंबर मोहम्मद के अनुसार… उनकी नेकी, करुणा और सहानुभूति में विश्वास रखने वाले एक शरीर की तरह हैं. जब शरीर के किसी हिस्से में चोट लगती है, तो पूरे शरीर में दर्द होता है. “न्यूजीलैंड की आंखें भी आपके दुख में नम हैं. हम एक हैं.”


न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जैसिंडा आर्डर्न

इससे पहले भी, जब मिसेज आर्डर्न ने शोक संतप्त परिवारों का दौरा किया था, तो उनका सिर काले दुपट्टे से ढका था. जैसे ही उन्होंने उन्हें गले लगाया, उनके चेहरे पर उनका दर्द झलक उठा. इससे नरसंहार में अपने प्रियजनों को खोने वाले पीड़ितों को महसूस हुआ कि वह भी उनके दुख में शरीक हैं.

पिछले पांच वर्षों में भारत में इसके विपरीत देखने को मिला. मुसलमानों पर नफरती क्रूर भीड़ द्वारा कई हमले किए गए, जिनका वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर खूब फैलाया गया. लोगों और भीड़ द्वारा किए गए इन नफरती हमलों के कारण पूरे देश में मुसलमानों के बीच भय और दुख फैल गया. इसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी शोक संतप्त परिवारों का दौरा नहीं किया और न ही कभी किसी सार्वजनिक संबोधन में या सोशल मीडिया के माध्यम से उनके प्रति सहानुभूति प्रकट की. कश्मीर के पुलवामा में आत्मघाती हमलावर द्वारा की गई 40 केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवानों की हत्या के बाद जब भारत के कई हिस्सों में कश्मीरी छात्रों पर हमले किए जा रहे थे, तो श्री मोदी ने कहा कि लोगों के दिलों में जो आग है, वह आग उनके दिल में भी सुलग रही है. यह साफतौर पर बदला लेने के लिए उकसावे भरा संदेश था.

भारत में 14% मुसलमान आबादी है, जबकि न्यूजीलैंड में वे केवल 1% भर हैं. मिसेज आर्डर्न ने माना कि उनमें से कई प्रवासी या शरणार्थी हो सकते हैं, लेकिन “वे हमारे जैसे हैं, वे हम हैं… वह अपराधी हमारा नहीं है”. मोदी ने अपनी चुपी से जो संदेश दिया, वह बिल्कुल विपरीत है. वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा में निहित है, जो यह मानती ​​है कि सदियों से इस देश का हिस्सा रहे  मुसलमान ‘’हमारे’’ नहीं हैं, बल्कि हिंसा करने वाले अपराधी हमारे हैं.

पिछले कई महीनों में, हमने भारत के 15 राज्यों में कारवां-ए-मोहब्बत की 27 दुखद यात्राएँ कीं. जिनमें, हम उन परिवारों से मिले जिन्होंने अपने प्रियजनों को नफरत और हिंसा में खो दिया है. हर बार हमने यही सीखा कि इन टूटे हुए परिवारों तक महज पहुंच पाना ही उनके लिए कितना मायने रखता है. वे अकेला महसूस करते हैं और उनके प्रियजनों पर हमला करने वाले अपने पड़ोसियों या अजनबियों की घृणा के कारण खुद को हारा हुआ महसूस कर रहे होते हैं. वे हमारा हाथ पकड़ते हैं और रोते हैं, तो हमारी आँखें भी नम हो जाती हैं. अक्सर, दूर-दराज इलाकों में रहने वाले परिवार बताते हैं कि पहली बार उनसे कोई मिलने आया है.

जो मिसेज आर्डर्न ने क्राइस्टचर्च में प्रार्थना करते समय मारे गए लोगों के प्रियजनों के लिए किया. मैं अक्सर उम्मीद करता हूं कि ऐसा ही हमारे प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेताओं को भी करना चाहिए जो धर्मनिरपेक्ष राजनीति के लिए खड़े होने का दावा करते हैं. लेकिन उनमें से किसी ने भी ऐसी सहज करुणा या राजनैतिक साहस नहीं दिखाया है कि वे इन पीड़ित परिवारों तक पहुंच सकें, जो अकेले नफरत से लड़ने के लिए मजबूर हैं.

मिसेज आर्डर्न द्वारा सिर पर दुपट्टा लेने के प्रतीकात्मक सवाल को ही लीजिए. मिसेज आर्डर्न ने नफरती हिंसा से प्रताड़ित लोगों के प्रति सम्मान दिखाने के लिए दुपट्टे से अपना सिर ढँक लिया, यह जरूरी नहीं कि इस प्रथा का समर्थन हो. प्रधानमंत्री के इस प्रतीक से प्रेरित होकर, पूरे न्यूजीलैंड में महिलाओं ने, चाहे वे न्यूज़रीडर, महिला पुलिसकर्मी या आम जन हों, अपने सिर को हिजाब स्कार्फ के साथ ढ़ंक लिया. इमाम फौदा ने मिसेज आर्डर्न से कहा, “हमारे परिवारों को अपने पास रखने और हिजाब ओढ़ कर उन्‍हें सम्‍मान देने के लिए धन्यवाद.” इसके विपरीत, मोदी ने भारत के अलग-अलग हिस्सों में अपनी यात्राओं के दौरान दिखावटी तौर पर हर तरह की टोपी पहनी है, सिर्फ एक को छोड़कर. वह है मुस्लिम टोपी, जिसे निशाना बनाते हुए उन्होंने पहनने से साफ मना कर दिया.


मोदी किसी कार्यक्रम में मुस्लिम टोपी पहनने से इनकार कर देते हैं

मिसेज आर्डर्न ने हत्यारे के नफरत फैलाने वाले वीडियो या इच्छित दुष्‍प्रचार को रोकने के लिए उसके द्वारा लाइव-स्ट्रीम किए गए वीडियो को प्रचारित नहीं करने के लिए भी कड़े कदम उठाए और उसके नाम को सार्वजनिक रूप से कभी न लेने का वचन दिया. इसके विपरीत, भारत में भीड़ द्वारा की गई नफरती हिंसाओं और हमलों के अपराधियों के बनाए और अपलोड किए गए वीडियो खूब प्रचारित व प्रसारित किए जाते हैं. वास्तव में उनकी और सत्ता पक्ष के कई प्रमुख सदस्यों की हिसंक और अभद्र संदेश खुलेआम प्रसारित हो रहे हैं. नफरत फैलाने वाले आरोपियों को केंद्रीय मंत्रियों द्वारा राष्ट्रीय ध्वज तले माला पहनाकर सम्मानित किया जाता है.

न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया और पश्चिमी देशों में ईसाई और यहूदी धर्मों के धार्मिक नेता मुस्लिम समुदाय के साथ विविधता में एकजुटता दिखाते हुए खुलकर सामने आए और मस्जिदों में संयुक्त प्रार्थना सभाओं में शामिल हुए. गोल्ड कोस्ट में न्यूलाइफ चर्च के मंत्री स्टु कैमरन ने कहा, “अच्‍छे लोग अपने पड़ोसी को रोता देख खुद रो देते हैं और दूसरों को खतरा महसूस होने पर एकजुटता से खड़े होते हैं.” न्यूजीलैंड में सिख गुरुद्वारों ने बचे हुए और पीड़ित परिवारों के लिए खोल दिए हैं. इसके उलट भारत में क्रूर नफरती हमलों के बाद धार्मिक नेताओं ने इस तरह की देखभाल नहीं दिखाई है.


दंगा आरोपियों को माला पहनाते भाजपा मंत्री जयंत सिन्हा

संवेदना का अभाव

हालाँकि, भारत में राजनीतिक और धार्मिक नेताओं द्वारा नफरती हिंसा के विरोध कर पाने की असफलता से भी ज्यादा चिंताजनक यह है कि जिन जगहों पर हमले हुए, वहां के स्थानीय समुदायों में संवेदना और एकजुटता का गहरा अभाव का होना. ऐसे लोगों के साथ कोई सहानुभूति नहीं है, जो इतने डरे हुए हैं कि वे इस देश को अपना नहीं मान पा रहे, जहां के वे हैं. कारवां की हमारी यात्राओं में कहीं भी हमने दूसरे धर्मों और जातियों के पड़ोसियों द्वारा घृणित हमलों से बचे लोगों की देखभाल और समर्थन की खबरें नहीं सुनीं. गुरुग्राम में, प्रशासन समर्थित भीड़ ने मुस्लिम नमाजियों को धमकाने में कामयाबी हासिल की है जुमे की नमाज़ के लिए तय जगहों को कम करवा कर दसवें हिस्‍से पर ला दिया है. यह एक सभ्यतागत संकट से कम नहीं है कि हमने जिंदगी में नफरत को इतनी जगह दे दी है कि उसने करुणा के मानवीय गुण ही खत्म कर दिया है.

न्यूजीलैंड में इमाम फौदा ने कहा, “हमारे दिल टूटे हुए हैं, लेकिन हम टूटे नहीं हैं.” हमारी सभ्यता का संकट यह है कि जैसे हमारे भाई-बहन देश के चारों ओर नफरत का शिकार हो रहे हैं, उससे हमारे दिल टूटे हुए नहीं हैं. हम परवाह ही नहीं करते. वास्तव में, हममें से कुछ लोग नफरती हमलों का समर्थन करते हैं और जश्न मनाते हैं. यही हमारा इंसानी रूप में टूट जाना है.

(हर्ष मंदर एक मानवाधिकार कार्यकर्ता और लेखक हैं.)

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