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लोग, जिन्हें कोई अपनाना नहीं चाहता

साल 2018 का सूर्य अस्त हुआ तो असम के उन दस लाख निवासियों के लिए दरवाजे बंद हो गए, जो यह साबित करने में असमर्थ थे कि वे भारतीय नागरिक हैं. वे तीस लाख लोग जिन्हें राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के मसौदे(लिस्ट) में शामिल नहीं किया था, अब उनकी जांच विदेशी न्यायाधिकरण द्वारा की जाएगी.

इस बीच, असम में अनिश्चित गले की फांस के खिलाफ लड़ाई जारी है. लाखों असम निवासियों से खुद को भारतीय साबित करने के लिए एक जटिल और अत्याचारी प्रक्रिया के तहत दस्तावेज मांगे गए, जबकि ऐसा देश के किसी भी हिस्से में नहीं किया गया. अगर एकाध अपवादों को छोड़ दें तो पूरे विश्व में भी ऐसा कहीं नहीं हुआ.

अक्सर यह याद नहीं रखा जाता है कि 1947 में सिर्फ पंजाब और बंगाल का ही नहीं, बल्कि असम का भी विभाजन हुआ था. एक जनमत संग्रह के बाद जब असम के सिलहट जिले को पाकिस्तान स्थानांतरित(दे दिया) कर दिया गया था, तो सिलहट और बंगाल के अन्य हिस्सों से असम में भूमि, विशाल अछूते वनों और नदी द्वीपों में खेती योग्य जमीन की तरफ आकर्षण के चलते अगली दो शताब्दियों तक प्रवास जारी रहा. उस समय इसे राज्य द्वारा प्रोत्साहित भी किया गया. विभाजन की तबाही और 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध की वजह से असम में नए सिरे से पलायन शुरू हुआ.

1970 के दशक के आखिर में अपने आपको “मूल निवासी” समझने वाले लोगों के तथातथित “विदेशियों” के खिलाफ एक छिटपुट हिंसक आंदोलन ने राज्य को हिला दिया था. एनआरसी का वर्तमान मसौदा केंद्र सरकार द्वारा आंदोलनकारियों के साथ किए गए समझौते की पूर्ति है, जिसमें 1971 के बाद पलायन करने वाले व्यक्तियों की पहचान कर उन्हें निर्वासित किया जाएगा.

2007 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि अगर राज्य एजेंसियां किसी व्यक्ति पर विदेशी होने का आरोप लगाती हैं, तो उनका यह कर्तव्य नहीं है कि वे आरोप को साबित करें. इसके बजाय, उन लोगों को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए कहा गया, जिनकी नागरिकता पर एजेंसियों ने सवाल उठाए थे. यह प्राकृतिक कानून के बिल्कुल उल्ट था जिसके अनुसार एक व्यक्ति दोषी साबित होने तक निर्दोष है. जिसके चलते कमजोर और अशिक्षित लोगों को अपनी नागरिकता सही साबित करने के लिए आधिकारिक दस्तावेजों – जैसे जन्म प्रमाण पत्र, भूमि-स्वामित्व और मतदाता सूची जमा करने के लिए कहा गया. देश में कहीं भी मौजूद अधिकांश ग्रामीण लोग अपनी नागरिकता साबित करने में असमर्थ होंगे क्योंकि उनके समय जन्म-प्रमाणपत्र दुर्लभ थे. कई स्कूल नहीं गए और काम के लिए पलायन कर गए या बचपन में ही शादी हो गई. जमीन के रिकॉर्ड खराब तरीके से बनाए गए हैं. और कई मामलों में बहुतेरे लोग भूमिहीन भी हैं, या सरकारी जमीन पर कब्जा करने वाले किरायेदार या कब्जाधारी हैं. मतदाता सूची भी गलतियों से अछूती नहीं हैं. आधिकारिक आदेशों ने प्रक्रिया में अंतर्निहित रूढ़िवादिता को भी उजागर किया गया था, जिसे दोबारा सुप्रीम कोर्ट ने मंजूर किया. जिनके अनुसार एनआरसी की लिस्ट में स्वत शामिल करने के लिए “असम राज्य के मूल निवासी” व्यक्तियों को किसी भी ” प्रमाण या पूछताछ” से छूट थी. “मूल निवासी” कहीं भी परिभाषित नहीं है, लेकिन व्यवहार में मूल निवासियों को बंगाली, नेपाली, हिंदी या संथाली बोलने वाले लोगों को बाहर करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, भले ही वे असम में पीढ़ियों से रहते हों.

असम में गैर-नागरिकों की पहचान करने के लिए पेचीदा एनआरसी प्राधिकरण(संस्था) एकमात्र एजेंसी नहीं है. वास्तव में ऐसी तीन समानांतर प्रक्रियाएं हैं, जो ज्यादातर निम्न-स्तर के नौकरशाहों और पुलिस के विवेक पर निर्भर करती हैं, जिसे कवि मानस भट्टाचार्जी ने राज्य के “स्निफर-डॉग” विचार के रूप में वर्णित किया है, जो तथाकथित “विदेशियों” का शिकार करता है.

इन “स्निफर-डॉग” प्रक्रियाओं में से एक 1997 में शुरू हुई, जब मतदाता सूची के व्यापक संशोधन के बहाने चुनाव आयोग ने बिना किसी तय प्रक्रिया के 3.70 लाख मतदाताओं को संदिग्ध या “डी-मतदाताओं” के रूप में चिह्नित किया. इस प्रक्रिया ने उनके मतदान अधिकार छीन लिए और उनके मामलों को विदेशी न्यायाधिकरण में भेजा दिया गया. चुनाव अधिकारियों ने उन व्यक्तियों की पहचान करना जारी रखा जिन्हें वे “संदिग्ध” मानते थे. असम पुलिस सीमा संगठन ने कई पुलिस स्टेशनों में पुलिस अधिकारियों को नियुक्त किया जो ऐसे लोगों की पहचान करते थे जिन्हें वे संभवतः गैर-नागरिक मानते थे, और उनके मामलों को विदेशी न्यायाधिकरण में भेजते थे.

जो लोग असमिया नहीं बोलते हैं और स्वदेशी जनजातियों से नहीं हैं, वे इस तरह हर तरफ से घिरे (पीड़ित) हुए हैं. उन्हें नहीं पता कि एनआरसी के अधिकारियों, चुनाव अधिकारियों या स्थानीय पुलिसकर्मी से उनकी नागरिकता को चुनौती कब मिल सकती है. 2006 में, पुलिस बॉर्डर ऑर्गेनाइजेशन ने पश्चिमी असम के बोंगाईगाँव जिले के खेलुवापारा गाँव के एक छोटे किसान अजबहर अली को विदेशी ट्रिब्यूनल में भेजा था. जब उन्होंने न्यायाधिकरण के सम्मन का जवाब दिया तो उन्हें पता चला कि पूर्व-पक्षीय फैसले में न्यायाधिकरण ने उन्हें पहले ही विदेशी घोषित कर दिया है. उन्हें ट्रिब्यूनल से सीधे जेल में कैद कर दिया गया था. उनकी पत्नी बलिजन बीबी ने अपने पति को नजरबंदी से मुक्त कराने के लिए वकील का भुगतान करने के लिए अपने खेत, मवेशियों और एकमात्र सेल-फोन को बेच दिया. उनके बड़े बेटे मोइनुल हक फैसला सुनने के लिए जब गुवाहाटी उच्च न्यायालय गए तो उनकी माँ अच्छी खबर के लिए घर पर उत्सुकता से इंतजार कर रही थी. अगली सुबह वापस लौटकर उसने अपनी मां से बताया कि अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी है. जिसके बाद बलिजन बीबी ने ज्यादा कुछ नहीं कहा, बस अपने बेटे को आराम करने के लिए कहा और थोड़ी देर बाद वह छत से लटककर फांसी झूल गईं.

महीनों बाद, हमारी कारवां-ए-मोहब्बत की टीम उनके परिवार से मिलने गई. बच्चों के पिता, बिना किसी रिहाई की संभावना के साथ एक जेल में कैद थे. उनकी माँ मर चुकी थीं और उनकी जमीन और उनकी सभी वस्तुएं बिक चुकी थीं. कम से कम 28 लोगों ने आत्महत्या की हैं जो यह साबित करने की उम्मीद खो चुके थे कि वे इस देश के नागरिक हैं, और उन्हें जीने की वजह नहीं दिखाई दी.

यह असम में लाखों धार्मिक, भाषाई और जातीय अल्पसंख्यकों की सामूहिक त्रासदी है. ऐसे में दूर-दूर तक कोई प्रकाश दिखाई नहीं रहा है, क्योंकि केंद्र और राज्य सरकारें इस बारे में चुप हैं कि भविष्य में उन लोगों का क्या होगा जो अंत में विदेशी घोषित कर दिए गए हैं. संवैधानिक गारंटी और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का घोर उल्लंघन करते हुए हजारों लोग नारकीय हिरासत कैदों में अनिश्चित काल तक रखे जा रहे हैं. लेकिन अगर कल संख्या संभवत: लाखों में हो जाए, तो उन्हें हिरासत में कहां रखा जाएगा?

भारत सरकार बांग्लादेश सरकार के साथ इन व्यक्तियों की वापसी के लिए प्रत्यर्पण संधि पर भी बातचीत नहीं कर रही है. अगर वे भारत में गैर-नागरिकों के रूप में रहना जारी रखते हैं, तो क्या हम रोहिंग्या जैसी स्थिति पैदा नहीं कर रहे हैं. क्या हम जिन लोगों को अपना नहीं रहे, उन्हें देश में अधिकारों या सुरक्षा के बिना रहने के लिए मजबूर नहीं कर रहे.

हालांकि, दांव पर सिर्फ उनका मुकद्दर ही नहीं है. बल्कि भारत के लोकतंत्र, न्याय की भावना, इसकी समावेशिता और मानवता के मिजाज की भी परीक्षा हो रही है.

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