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NRC: अपारदर्शी तंत्र और निरंकुश नौकरशाही के चक्रव्यूह में फंसे गरीबों के बहिष्कार का रजिस्टर

असम में लंबे समय से रहे लोगों को उलझन भरे अपारदर्शी नियमों और बेपरवाह नौकरशाही के जजांल से गुजरकर अपनी नागरिकता साबित करने की मुसीबत आन पड़ी है. यह भारतीय राज्य के सबसे कमजोर लोगों के साथ पिछले दो दशकों से बड़े पैमाने पर हो रहे बेरहम अन्याय की परतें उघाड़ता है.

कष्टदायक व्यवस्था

आधिकारिक अनुमान के अनुसार लाखों गरीबों को विदेशी घोषित कर नागरिकता  से निष्कासित कर दिया गया है, जिनमें ज्यादातर ग्रामीण, शक्तिहीन और गरीब निवासी हैं जो असहाय और कष्ट की स्थिति में गुजर-बसर कर रहे हैं. जिसकी वजह से उनका भविष्य अनिश्चितता और गहरे अंधेरे में धंस गया है. उन्हें खुद को नागरिक साबित करने के लिए प्रतिरोधी किस्म के अधिकारियों को उन पुराने दस्तावेजों के आधार पर राजी करना आवश्यक है, जो शहरी, शिक्षित, मध्यम वर्ग के नागरिक भी मुश्किल से एकत्र कर पाएं. यह एक ऐसी जटिल प्रक्रिया है जिसमें अगर अधिकारियों का एक वर्ग उनके दस्तावेजों को स्वीकार भी करले, तो दूसरे अधिकारी उन पर फिर से सवाल उठा सकते हैं. और कभी-कभी एक ही अधिकारी उन्हें फिर से नोटिस भेजने के लिए स्वतंत्र है, जिसकी वजह से इस भयावह चक्र की नए सिरे से शुरूआत हो जाती है.

2 और 3 फरवरी को मैं, जस्टिस वेंकट गोपाल गौड़ा, कॉलिन गोंसाल्विस, मोनिरुल हुसैन और संजॉय हजारिका के साथ नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC) पर एक ट्रिब्यूनल के सदस्य के रूप में असम में था, जहां हम राजधानी गुवाहाटी में 13 जिलों से आए 53 लोगों के दुखदाई अनुभव सुन रहे थे. उस दौरान उभरकर सामने आईं आधिकारियों के पूर्वाग्रहों और मनमानी की दुखदायी कहानियां और जरूरी प्राथमिक प्रक्रियाओं का अभाव सन्न करने वाला था और सबसे दुखद सामाजिक करुणा का पूर्ण अभाव था. उनके साथ हुए बुरे बर्ताव के बारे में बताते हुए बूढ़े लोग भी बार-बार असहज हो रहे थे और एक हिसाब से वे पूरी तरह से टूट ही जा रहे थे.

उनके दस्तावेजों को देखते वक्त जो एक विचित्र दुविधा उभरकर सामने आई वह यह थी कि विभिन्न दस्तावेजों में अंग्रेजी और बंगाली भाषा में नामों की वर्तनी में मामूली अंतर के कारण ही कई व्यक्तियों के नाम एनआरसी के मसौदे से हटा दिए गए थे. इनमें कई ऐसे उदाहरण भी थे जहां एक ही अक्षर की भिन्नता, उदाहरण के लिए omar और onar, यह बताने के लिए पर्याप्त थी कि वह व्यक्ति एक विदेशी है. इसी तरह, निरक्षर ग्रामीण सामान्यत उनके जन्म की तारीखों के बारे में अस्पष्ट थे. एक इंसान को नागरिकता से इसलिए वंचित किया जा सकता है अगर उसने न्यायाधिकरण को अपनी उम्र 40 वर्ष बताई हो परन्तु उसके दस्तावेजों में वह 42 वर्ष लिखी गई हो.

औरतों के लिए ज्यादा सख़्त

महिलाओं के सर पर विशेष रूप से नागरिकता रजिस्टर से बाहर होने का खतरा मंडरा है. क्योंकि आमतौर पर उन्हें स्कूल न भेजे जाने और वयस्क बनने से पहले ही शादी हो जाने के कारण उनके पास कोई जन्म प्रमाण पत्र नहीं होता है. इसलिए, उनका नाम पहली बार मतदाता सूचियों में नाम तब आता है, जब वे अपनी ससुराल वाले गांवों में होती हैं और वो नाम उनके माता-पिता द्वारा दिए गए नामों से अलग होते हैं. उन्हें यह बताया जा रहा है कि उनके पास कोई ऐसा दस्तावेज नहीं है, जिससे वे यह साबित कर पाएं कि वे उसी माता-पिता की औलाद हैं जिनका वे दावा कर रही हैं. अकेले इस आधार पर ही नागरिकता से बाहर किए जाने के बहुतेरे मामले थे.

निर्माण मजदूर, सड़क बनाने वाले और कोयला-खनिकों के रूप में प्रभावित प्रवासी मजदूर अक्सर काम की तलाश में असम के अन्य जिलों में जाते रहते हैं. जिन जिलों में वे पलायन करते हैं, वहां की स्थानीय पुलिस अक्सर उनका नाम बांग्लादेश से अवैध प्रवासियों के रूप में दर्ज कर लेती है. जब पुलिस उन्हें अवैध प्रवासियों के रूप में चिन्हित करती है तो उन्हें उन जिलों में स्थित विदेशी न्यायाधिकरणों से नोटिस प्राप्त होते हैं जहां उन्होंने वर्षों पहले काम किया था. जिसकी वजह से उन्हें हर सुनवाई के लिए अपने गृह जिले से बहुत दूर यात्रा करनी पड़ती है, जिससे उनका खर्च बहुत बढ़ जाता है.

एनआरसी एकमात्र संस्थान नहीं है जिसके माध्यम से राज्य उन्हें अपनी नागरिकता साबित करने के लिए चुनौती देता है. 1990 के मध्य में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन सेशन ने एक दूसरी प्रक्रिया शुरू की थी, जिसमें उन्होंने एक बार की व्यवस्था के रूप में, अधिकारियों को मतदाताओं की सूची में उनके नाम के आगे “डी” चिन्हित करके “संदिग्ध मतदाताओं” की पहचान करने के निर्देश दिए. यह अस्थायी रूप से जांच पूरी होने तक उन्हें मतदान या चुनाव लड़ने से रोकने के लिए थी.

लेकिन यह अस्थायी व्यवस्था स्थायी हो गई. विडंबना यह थी कि इस व्यवस्था पर उन छोटे अधिकारियों का स्थायी नियंत्रण था, जो बिना किसी कारण के किसी भी समय किसी भी व्यक्ति की नागरिकता पर संदेह कर सकते थे. जिनके नाम के साथ भयावह “डी” लगा हुआ था, उनके पास नियमों के तहत अपील करने का कोई प्रावधान नहीं था इसलिए बिना किसी जांच के वर्षों गुजर गए. जिसके बाद इस “डी” व्यवस्था ने भी उन्हें एनआरसी के मसौदे में शामिल किए जाने से वंचित कर दिया.

इसमें एक तीसरी प्रक्रिया भी है जो असम पुलिस को यह अधिकार देती है कि वह किसी को भी ‘विदेशी’ मानकर संदेह के घेरे में ले सकती है. और ऐसे ज्यादातर मामलों में पुलिस का दावा है कि वह व्यक्ति अपनी नागरिकता स्थापित करने के लिए उन्हें दस्तावेज दिखाने में असमर्थ था. लोग लगातार इस बात से इनकार करते हैं कि पुलिस ने उनसे कभी दस्तावेज भी मांगे थे. जब उन सभी को पुलिस द्वारा संदिग्ध घोषित करने पर दस्तावेज न दिखाने के परिणाम पता हैं, तो वे उन्हें दस्तावेज क्यों नहीं दिखाएंगे?

धुंधला तंत्र

पुलिस द्वारा संदर्भित सभी मामलों को विदेशी न्यायाधिकरण (एफटी) द्वारा सुना जाता है. इससे पहले, इन न्यायाधिकरणों में सेवानिवृत्त न्यायाधीश नियुक्त किए जाते थे. भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने कई वकील (ज्यादातर सत्तारूढ़ पार्टी या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य) नियुक्त किए हैं, जो कभी न्यायाधीश नहीं रहे हैं. अब इन विदेशी न्यायाधिकरणों में कई महीनों से एक भी व्यक्ति को भारतीय नागरिक घोषित नहीं किया गया है. कई लोगों का आरोप है कि विदेशी न्यायाधिकरण में पुलिस और पीठासीन अधिकारी दोनों ही लोगों को विदेशी घोषित करके अनौपचारिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए काम करते हैं.

यह तंत्र इतना बेरहम है कि अगर किसी व्यक्ति का एनआरसी में नाम शामिल है, तो भी पुलिस उसके मामले को विदेशी न्यायाधिकरण के पास भेज सकती है. इतना ही नहीं एक चुनाव अधिकारी भी उसे “डी” -वोटर बनाने का निर्णय ले सकता है. संविधान के अनुच्छेद 20 में एक मौलिक अधिकार के रूप में यह शामिल है कि “किसी भी व्यक्ति पर एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता और दंडित भी नहीं किया जा सकता”. लेकिन यह सिद्धांत विदेशी न्यायाधिकरण ने हवा में उड़ा दिया है. हमने पाया कि एक विदेशी न्यायाधिकरण द्वारा एक व्यक्ति के भारतीय नागरिक होने की पुष्टि के बाद भी, एक दूसरा विदेशी न्यायाधिकरण या कई बार वही विदेशी न्यायाधिकरण दोबारा फिर उसी व्यक्ति को उसकी वैध नागरिकता साबित करने के लिए नोटिस जारी कर सकता है. एक व्यक्ति को कभी भी इतना सुरक्षित महसूस नहीं करने दिया जाता है कि आखिकार राज्य ने उसे एक भारतीय नागरिक स्वीकार कर लिया है.

इस वजह से हमेशा उनपर एक तलवार लटकती रहती है. पता नहीं कब कोई संस्था उसके सामने खुद को भारतीय नागरिक साबित करने की चुनौती खड़ी कर दे? क्या वे या उनके प्रियजन इन अपारदर्शी, अनुचित और भेदभावपूर्ण प्रक्रियाओं के कारण नागरिकता के अधिकारों से वंचित कर दिए जाएंगे?

हालांकि राज्य विदेशी न्यायाधिकरण और उच्च न्यायालयों में उनके मामलों को लड़ने के लिए वकील उपलब्ध करवाने के लिए बाध्य है. लेकिन हमने जिन पीड़ितों की गवाही सुनी, उनमें से किसी भी व्यक्ति को राज्य द्वारा कानूनी सहायता नहीं दी गई थी. लोग अपने बेइंतहा खर्च से डरे हुए थे, जो उन्होंने वकीलों को भुगतान करने के लिए, साथ ही साथ अपने पक्ष में गवाही देने के लिए साथ जाने वाले गवाहों की यात्रा में खर्च किए थे. इसके लिए उन्हें अपनी सारी संपत्ति बेचनी पड़ी या निजी साहूकारों से कर्ज लेना पड़ा. उनमें से अधिकांश कम शिक्षित और बहुत कम पैसे वाले हैं, जो रिक्शा चलाने, घरेलू काम या खेतों में मजदूरी जैसे कम वेतन वाले काम करते है.

इनके कंधों पर नागरिकता साबित करने के लिए बहुत भारी बोझ लाद दिए गए हैं. कई मनमाने और अपारदर्शी तंत्रों द्वारा लगातार तलब हुए शिक्षा और संसाधनों से वंचित ये लोग एक निरंकुश नौकरशाही के चक्रव्यूह में फंसते जा रहे हैं जहां से उनका उभर पाना मुश्किल सा लगता है.

इतिहास के चक्र में फंसे इन लोगों का मुकद्दर उन संस्थानों पर निर्भर करता है जो उनके लिए अविचारित शत्रु और पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं. दुनियाभर में शायद ही कहीं कुछ ऐसा हो रहा हो, जो असम में हो रहा है, जहां राज्य खुद इतनी बड़ी संख्या में क्रूरता के साथ लोगों को नागरिकता से वंचित कर रहा है.

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