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हरियाणा का राजनीतिक सफरनामा: हरियाणा के चौधरियों की धक्का पेल!

हरियाणा का एक स्कूल. स्कूल की एक क्लास. क्लास में बच्चे. किस्सा यों है कि डारविन की थ्योरी पढ़ाकर छात्रों को सामाजिक विज्ञान का विधाता बनाने का प्रण लिए बैठे एक मास्टर ने क्लास में घुसते ही सबको बड़े उत्साह से निहारा. फिर उसने दिमाग की दुकान में रखे सामान को मुंह के रास्ते से बाहर निकाला और ‘बंदरों को इंसानों का पूर्वज’ घोषित कर डाला. सामने फर्श पर बैठे छात्र इस बेमौसम ज्ञान−वर्षा में भीगकर ऐसे चौंके जैसे मंगलवार को अखाड़े से आते वक्त रास्ते में किसी कमजोर पहलवान को साक्षात हनुमानजी के दर्शन हो गए हों. बच्चों के दिमाग में ‘टन्न’ से घंटी बजी. श्रद्धा भाव में बहके कुछ लड़के चुपचाप इस ‘अनहोनी’ को झेल जाना चाहते थे, लेकिन एक बालक ने समाजशास्त्र के प्रोफेसर जैसे अपना सिर खुजाते हुए निर्विकार भाव से फ़तवा दे डाला, “देखो मास्टर जी, आपके पूरवज होंवंगे बांदर. माहरे तो चौधरी थे!”

जवाब सुनकर मास्टर चारों खाने चित्त हो गये और होश में आते ही उन्होंने खुद को दिल्ली की ट्रेन में बैठा पाया. जवाब देने वाला बच्चा ‘चौधर’ नामक प्रेरणा की घुट्टी को डकार कर कालान्तर में हरियाणा का लोकतंत्र बना. हरियाणा के तन, मन, धन और राजनीति के मुख्य प्रेरक तत्व चौधर के रौले से यहां के लोगों के पेट में जो मरोड़ उठती है, वह अकसर ही हुक्मरानों की परेशानी का सबब बनती आयी है. परेशान हुक्मरान जवाब में हर बार मितिहास के गीत गाने लगते हैं कि हरियाणा की धरती कुरुक्षेत्र पर ही महाभारत का युद्ध हुआ था।

इस मितिहास का जवाब थानेश्वर की खुदाई में कुछ यूं मिलता है कि, “शक्ल से बाग़ी और अक्ल से भोले यहां के लोगों का राजनीतिक विकास 1857 की क्रांति के साथ हुआ, जिसमें यहां के लोगों ने खूब खून बहाया था। इक्कीसवीं सदी के आते−आते अंग्रेजों ने यहां के लोगों की तारीफों के पुल बांधकर और उन्हें विकास के सपने दिखाकर पटा लिया। इसी वजह से यहां कांग्रेस के राष्ट्रीय आंदोलन की आग के छिटपुट पतंगे ही पहुंच पाए।”

आज़ादी से पहले यहां की राजनीति में यूनियनिस्ट पार्टी, हिन्दू महासभा और कांग्रेस तीन मुख्य राजनीतिक दल रहे. आर्य समाज भी समाज सुधारक का चोला पहनकर समय−समय पर राजनीति करता रहा। आज़ादी से पहले हरियाणा की राजनीति के असली चौधरी के बारे में वरिष्ठ पत्रकार सतीश त्यागी बताते हैं, “चौधरी, सर, रायबहादुर, दीनबंधु, रहबरे-आज़म और किसान मसीहा− इतने सम्मानसूचक शब्द चौधरी ‘छोटूराम’ के अलावा शायद ही किसी और भारतीय राजनेता के लिए प्रयोग हुए हों। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि 1920 से लेकर 1945 तक संयुक्त पंजाब में चौधरी छोटूराम और उनकी राजनीति का ही डंका बजा। इस दौर के राष्ट्रीय नायक महात्मा गांधी भी छोटूराम और उनकी यूनियनिस्ट पार्टी के कारण पंजाब में, शेष भारत की तरह प्रभाव पैदा नहीं कर सके। इतना ही नहीं, बहुत बड़ी मुस्लिम आबादी होने के बाद भी जिन्ना पंजाब की धरती पर अपनी लंगोट नहीं घुमा पाए.”

आज़ादी के बाद पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी के बादल छंटे. कांग्रेस के लिए अगले दो दशाक तक मौसम बिल्कुल साफ हो गया. कांग्रेस के मुकाबले कोई दल चुनौती देने की स्थिति में बेशक नहीं रहा हो, लेकिन खुद कांग्रेस के नेताओं ने ही इस काम को अंजाम तक पहुंचाने के लिए कलाकारी दिखानी शुरू कर दी. संयुक्त पंजाब में हरियाणा के नेता-जनता दोनों के हाथ कुछ खास न लगा. इसी वजह से संयुक्त पंजाब से 1 नवंबर, 1966 को हरियाणावासियों ने अपना चूल्हा अलग कर लिया और अपनी तरह की दाल-रोटी खाने के लिए कमर कस ली. हरियाणा में बनी दाल का स्वाद सबसे पहले कांग्रेस नेता भगवत दयाल शर्मा ने चखा और सूबे के पहले मुख्यमंत्री बने. जल्दबाज़ी के चक्कर में हालांकि वे अपनी जीभ जलवा बैठे. यही हाल राव बीरेंदर सिंह का भी हुआ, जिन्हें हरियाणा का दूसरा चौधरी बनने का मौका मिला.

उस समय दयाल-राव-लाल की तिकड़मों के चलते राजनीतिक अस्थिरता को पटकनी देने वाले असली ‘लाल’ बंसीलाल ने 1968 से लेकर 1975 तक एकतरफा राज किया. ठीक उसी समय शेष भारतीय हरियाणा के नेताओं की बेशर्मी यानी ‘आया राम, गया राम’ की राजनीति को ले उड़े. डॉ. त्यागी हरियाणा के विधायकों की बेशर्मी भरी ‘बेचारगी’ को कुछ इस तरह बयां करते हैं, “राजनेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांशाओं ने इस नवजात प्रदेश की सत्ता को ऐसे खेल में झोंक दिया कि हरियाणा देश भर में ‘कुख्यात’ हो गया. छह महीने के अंदर ही हरियाणा ‘वेद भूमि’ से ‘आया राम-गया राम’ की राजनीति में तब्दील हो गया. संसद में तत्कालीन गृहमंत्री वाइपी चव्हाण ने इस कथन से कि हरियाणा में 20-20 हजार में विधायक खरीदे जा रहे हैं, उस दौर की राजनीति की सहज ही कल्पना की जा सकती है.”

1968 से 1999 तक के 31 वर्षों को हरियाणा का ‘लाल काल’ घोषित कर देने में इतिहास को कोई तकलीफ़ नहीं जान पड़ती. हरियाणा की ‘चौधर’ ताऊ देवीलाल, चौधरी बंसीलाल और चौधरी भजनलाल के आंगन में अंगड़ाई लेकर यह सूबा इस अवधि में जवान हुआ. इस दौरान बंसीलाल तीन, देवीलाल और भजनलाल दो-दो बार मुख्यमंत्री रहे. बंसीलाल इंदिरा गांधी की ‘गुड मैन’ लिस्ट में थे जबकि देवीलाल इमरजेंसी विरोधी थे.

तीनों लालों में सबसे पहले बंसीलाल को मात्र 41 साल की उम्र में हरियाणा की चौधर हासिल हुई. बहुत जल्द उन्होंने अपनी छवि विकास पुरुष की बना ली. शुष्क इलाके से आने वाले बंसीलाल की रुचि अपने राजनीतिक काम के अलावा किसी चीज़ में न थी. इसका पता एक घटना से चलता है जब बिहार के नेता ललित नारायण मिश्र राज कपूर को उनसे मिलवाने लेकर आये थे. बंसीलाल राज कपूर को पहचान नहीं पाए थे. अपनी ज़िन्दगी में उन्होंने बस एक फ़िल्म देखी थी− ‘डॉक्टर कोटनीस की अमर कहानी’.

इसके बावजूद राजनीति से उनका संन्यास विशुद्ध फिल्मी रहा. कभी इंदिरा की गुडबुक में रहने वाले बंसीलाल को नब्बे के दशक में कांग्रेस ने साइडलाइन कर दिया जिसके चलते उन्हें हरियाणा विकास पार्टी बनानी पड़ी. 1996 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में बीजेपी से गठबंधन कर के सरकार बनाने में वे सफल रहे, मगर हरियाणा के हाल फिलहाल के ‘लाल’ मनोहरलाल खट्टर को नाराज कर के 1999 में अपनी सरकार गिरवा बैठे.

दरअसल, हुआ यूं था कि उस समय मनोहरलाल खट्टर हरियाणा में भाजपा के संगठन मंत्री हुआ करते थे. खट्टर एक बार बंसीलाल से मिलने गए. बंसीलाल अपनी व्यस्तताओं के कारण खट्टर से नहीं मिल पाए. इसी बात का बुरा मान खट्टर दिल्ली निकल गए और बंसीलाल की सरकार गिरवाकर ही लौटे. आखिर में हरियाणा विकास पार्टी का विलय कांग्रेस में हो गया.

लाल तिकड़ी के दूसरे लाल- देवीलाल बेशक सबसे ऊंचे कद के लाल थे, लेकिन लंबा सफर तय करने के बाद ही उन्हें हरियाणा की ‘चौधर’ हासिल हुई थी. नाबालिग उम्र में राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होने वाले देवीलाल की परवरिश आंदोलनों के बीच हुई थी. इसी कड़ी में इमरजेंसी के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की वजह से 1977 में वे हरियाणा के मुख्यमंत्री बने. जनता दल की मोरारजी-चरण सिंह की बाइनरी में फंसकर देवीलाल 1979 में अपनी कुर्सी गंवा बैठे. उनकी कुर्सी के पांव खींचने वाला असली खिलाड़ी तीसरा लाल था− भजनलाल. भजनलाल जनसंघ की मदद से देवीलाल गुट के विधायकों को ‘भारत दर्शन’ के लिए ले उड़े और अपनी सरकार बनवाकर ही चैन से बैठे.

भजनलाल, ‘चौधर’ की राजनीतिक पैकेजिंग के लिहाज से बनिया, अरोड़ा खत्री और जाट का मिक्सचर थे जबकि बिश्नोई सम्प्रदाय से ताल्लुक रखते थे. उन्होंने राजनीति के ऊंचे आदर्शों को गठरी में बांधकर पहले ही फेरी लगाकर बेच दिया था. आदर्शों की फुल टू फुल बिक्री के लिए उनका सीधा सा एक ही नारा था− ‘खाओ और खाने दो’. भजनलाल की पैकेजिंग में संकटमोचन हनुमान के कुछ सॉफ्टवेयर इनस्टॉल थे− जैसे हनुमान पहाड़ ले उड़ते थे, वे ‘लाल’ विधायकों को ले उड़ते थे.

करीब आधा साल जनता दल का मुख्यमंत्री रहने के बाद 1980 के शुरुआती महीने में वह कांग्रेस में शामिल होकर प्रदेश के मुखिया बन गए. 1982 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने हॉर्सट्रेडिंग की अपनी कला का उत्कृष्ट प्रदशर्न करते हुए देवीलाल की पार्टी से कम सीटें होने के बावजूद सरकार बना ली. इस घटना पर देवीलाल तत्कालीन गवर्नर जीडी तपासे के साथ धक्कामुक्की और तू-तू, मैं-मैं तक कर बैठे थे. भजनलाल की सेहत पर हालांकि उससे कोई फर्क नहीं पड़ा.

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश के नए ‘युवा’ प्रधानमंत्री को जब इनकी काबिलियत का पता चला तो उन्होंने इनसे उचित दूरी बनाना ही ठीक समझा. हरियाणा की जनता भी तब तक इनकी काबिलियत समझ चुकी थी. उसने 1987 के चुनाव में ताऊ देवीलाल को 90 में से 85 सीटें देकर भजनलाल को भजन करने भेज दिया.

देवीलाल के पुत्र ओमप्रकाश चौटाला की राजनीति में अच्छी खासी एंट्री हो चुकी थी. ताऊ ने उपप्रधानमंत्री बनने के बाद 1991 में जब अपने बेटे को सूबे की कमान सौंपने की तैयारी की, तब हुए महम कांड ने कांग्रेस के लिए सत्ता वापसी का रास्ता दोबारा खाली कर दिया. 1991 में राजीव गांधी की पसंद चौधरी बीरेंदर सिंह थे, लेकिन चुनाव परिणाम आने से एक दिन पहले ही उनकी हत्या हो गयी और बीरेंदर सिंह मुख्यमंत्री बनने से चूक गए. राजीव गांधी द्वारा खुड्डेलाइन लगाए गए भजनलाल अपने कलात्मक प्रदर्शन के दम पर एकबार फिर से प्रदेश के मुखिया बन बैठे। राव-केसरी कांग्रेस में उनकी प्रतिभा का सम्मान किया गया और वे उस दौर में उनके संकटमोचन लीडर बनकर उभरे, लेकिन खाओ और खाने दो की उनकी नीति के कारण हरियाणा के मतदाता ने अगले चुनाव में भजनलाल की दुकान पर ताला जड़ दिया.

1996 के विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी हरियाणा के प्रभारी बनकर आए थे. उन्होंने ही बंसीलाल की हरियाणा विकास पार्टी से गठबंधन की पहल की थी. जब वे गुजरात लौट गए तो उनके सबसे अच्छे दोस्त मनोहरलाल खट्टर ने 1999 में हरियाणा विकास पार्टी से समर्थन वापस लेकर उनकी सरकार गिरा दी थी. सरकार गिरने के बाद बीजेपी ने ओमप्रकाश चौटाला की पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल से गठबंधन कर 1999 में हुए चुनाव में ताल ठोक दी, जिसका फायदा चौटाला को हुआ और वे एक बार फिर से मुख्यमंत्री बन बैठे. अबकी बार उन्होंने पूरे पांच साल की पारी खेली मगर लोग उनसे इतने त्रस्त हो गए कि उन्हें अगले ही चुनाव में बुरी तरह हरा दिया.

2005 के विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज कर पूरे 10 साल बाद कांग्रेस ने शानदार वापसी की थी। बूढ़े हो चुके भजनलाल एक बार फिर से मुख्यमंत्री बनने के सपने देख रहे थे. सोनिया गांधी भजनलाल की प्रतिभा से वाकिफ थीं, इसलिए फैसला भूपेंदर हुड्डा के पक्ष में आया और हुड्डा ने अगले 10 साल तक ‘चौधर’ को रोहतक में रखा. हुड्डा की एकमात्र बड़ी उपलब्धि देवीलाल को तीन बार लोकसभा चुनाव में मात देना थी.

हुड्डा समर्थकों ने 1999 के बाद से ही ‘चौधर रोहतक में लानी है’ का नारा देना शुरू कर दिया था. दरअसल, हरियाणा में आठ कल्चरल बेल्ट हैं, जिनमें देशवाली और बागड़ी मुख्य हैं. रोहतक देशवाली बेल्ट का गढ़ है और आज़ादी के बाद रोहतक में कभी ‘चौधर’ नहीं आयी थी, इसलिए देशवाली लोगों ने भूपेंदर हुड्डा को ‘चौधर’ लाने की लड़ाई का नेता बनाया था. हुड्डा ने अपने मुंह से ये बातें बेशक न कही हों, लेकिन जब उनके समर्थक उनकी मौजूदगी में ऐसी बातें करते थे तो उन्हें कोई ऐतराज़ भी नहीं होता था.

सतीश त्यागी के मुताबिक हुड्डा के दस साल के कार्यकाल के बाद यानी 2014 के विधानसभा चुनाव में एक ऐसी ‘अनहोनी’ होने जा रही थी जिसकी हरियाणा की जनता को कतई उम्मीद नहीं थी. मुख्यतः शहरी और बनियों-पंजाबियों (अरोडा-खत्री) की पार्टी माने जाने वाली बीजेपी ने बहुमत हासिल किया, जिसकी उम्मीद शायद खुद उसे भी नहीं रही होगी. यह ‘अनहोनी’ हो चुकी थी और नरेंद्र मोदी के खास दोस्त रहे मनोहरलाल खट्टर को चौथे लाल के रूप में नया ‘चौधरी’ चुना जा चुका था. खट्टर ने 2014 से पहले सरपंच का चुनाव तक नहीं लड़ा था. आलम ये था कि जब वे मुख्यमंत्री बने तो पत्रकारों तक को उनके बारे में कोई जानकारी नहीं थी. हरियाणा के लोगों ने तो उनका नाम भी पहली बार सुना था. आज खट्टर अपने पांच साल पूरे कर चुके हैं और 21 अक्टूबर को हरियाणा के मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में उनकी किस्मत तय हो जानी है.

देश जब स्वराज मांग रहा था तब हरियाणा सवराज मांग रहा था. हरयाणवियों को दरअसल कुछ भी आधा नहीं चाहिए. वे पूरे में विश्वास करते हैं. जैसे वे आधे मूर्ख कतई नहीं बनेंगे. पूरे के पूरे मूरख बनने का उनका जन्मसिद्ध अधिकार है.

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