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आदमी भेड़ नहीं होता, जिसदिन लोगों को यह अहसास हो जाएगा, भेड़ों की तरह हांकते गड़रिए भाग खड़े होंगे

हेमंत कुमार झा

आबादी के अधिकतर लोग हर युग में भेड़ ही रहे हैं। यह तो युग का नेतृत्व होता है जो उन्हें आईना दिखाता है, राह दिखाता है और फिर…भेड़ों को आदमी बनने की प्रेरणा देता है।

युग और उसकी चुनौतियों की पहचान आदमी ही कर सकते हैं, भेड़ नहीं। गांधी ने जब भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का नेतृत्व संभाला, उन्होंने पहला काम यही किया। भेड़ों को आदमी बनने की प्रेरणा दी।

गांधी जी के आगमन के पहले भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में मुख्यतः शहरी पढ़े-लिखे तबके के लोग सक्रिय थे। ग्रामीण अंचलों में रहने वाली विशाल आबादी “कोऊ नृप होहिं हमें का हानी” की मानसिकता में जी रही थी। यत्र-तंत्र स्थानीय मुद्दों पर विद्रोह आदि के सिलसिले चलते रहते थे जिनका प्रभाव क्षेत्र भी सीमित ही होता था और इसलिये अंग्रेजों के लिये उनसे निपटना आसान होता था।

गांधी जी ने समझाया कि नृप कौन है और वह क्या कर रहा है इससे आमलोगों का भी वास्ता है और वे अपने समय और उसकी समस्याओं से इस तरह निरपेक्ष नहीं रह सकते। अपनी अस्मिता के लिये, अपने अधिकारों के लिये, अपने बाल-बच्चों के भविष्य के लिये उन्हें आगे आना ही होगा, सड़कों पर उतरना ही होगा और जरूरत पड़ने पर बलिदान देने के लिये भी तैयार रहना होगा।

स्वतंत्रता संघर्ष को गांधी की मुख्य देन भी यही है कि उन्होंने अनपढ़ ग्रामीण किसानों, मजदूरों, महिलाओं को भी स्वतंत्रता संघर्ष की मुख्य धारा से जोड़ा। इससे अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष को जो व्यापकता मिली उसने इसकी प्रभावी शक्ति में जैसी वृद्धि की, यह सब अब इतिहास है। ऐसा इतिहास, जो सदैव प्रेरणा देता रहता है।

अंबेडकर, नेहरू, लोहिया, जयप्रकाश आदि ने भी आमलोगों में चेतना का संचार किया और यह ऐसे मनीषियों का ही प्रभाव है कि अंधकार की कालिमा से घिरा भारत सामाजिक परिवर्तनों और विकास के नए दौर में नए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ सका।

आदमियों के समूह के साथ ऐसा है कि समय के साथ वे कब भेड़ के झुंड की शक्ल में तब्दील हो जाते हैं, पता ही नहीं चल पाता। यह तो युग की विसंगतियां और विडम्बनाएं हमें बताती हैं कि जो कल आदमी थे वे अब भेड़ बन चुके हैं।

नए दौर के नेतृत्व के लिये भी यही मुफीद था कि आदमी आदमी न रह कर भेड़ ही बना रहे। समय और परिस्थितियों के हिंसाब से निर्मित सत्ता-संरचना अपनी सहूलियत के अनुसार नेतृत्व को उभारती है, उसे पोषित करती है और उसके माध्यम से अपने हित साधती है। सत्ता-संरचना के हित आमलोगों के हितों से जब टकराते हैं तो यही पोषित नेतृत्व आमलोगों के हितों की कीमत पर सत्ता-संरचना के हितों को संरक्षण देता है। इसके लिये एक से एक छद्म और छल का सहारा लिया जाता है। नेतृत्व के छद्म और छल को आदमी तो पहचान सकते हैं, लेकिन भेड़ों का झुंड नहीं पहचान सकता।

इसलिये, सत्ता-संरचना चाहती है कि आदमी आदमी न रह कर भेड़ों के झुंड बने रहें। आज हममें से अधिकतर आदमी न रह कर भेड़ बन गए है और सितम यह कि जो आदमियों की तरह सोचने-बोलने की कोशिश कर रहे हैं उनकी बातों को भेड़ों का यही झुंड अप्रासंगिकताओं का अरण्य रोदन करार दे रहा है।

इसलिये, आज रोजगार की बात करना, शिक्षा के निजीकरण की बात करना, चिकित्सा-तंत्र की बदहाली की बात करना, सत्ता-संरचना पर काबिज तत्वों की आर्थिक-नैतिक बेईमानियों की बात करना अप्रासंगिकताओं का अरण्य रोदन करार दिया जा रहा है। जो भी इन मुद्दों को उठाएगा उसे तरह-तरह की संज्ञाओं से विभूषित करने की महान परंपरा चल पड़ी है। ये संज्ञाएँ क्या हैं जिन्हें दोहराने की यहां जरूरत नहीं।

कल पटना में 28 वर्ष के एक युवक ने आत्महत्या कर ली। वह वर्षों से पटना में रह कर प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था। तमाम कोशिशों के बावजूद उसे कोई प्राइवेट जॉब भी नहीं मिल पा रहा था। बेरोजगारी की आत्मग्लानि में डूबता वह युवक डिप्रेशन का शिकार हो गया और…। आज के अखबारों में फंदे में लटकी उसकी निष्प्राण देह की तस्वीरें हैं।

जरा गौर करें…। बिहार में कर्मचारी चयन आयोग की नियुक्तियों की प्रक्रिया 7-8 वर्षों से चल रही हैं। परीक्षाएं होती हैं, फिर कैंसिल होती हैं, फिर नया डेट आता है, फिर वह डेट बढ़ता है, फिर..। अंतहीन है मामला। इन परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवा आखिर कितना सब्र करें। गांव-गांव में, शहरों की गलियों में, सड़कों पर हमें डिप्रेस्ड युवाओं की शक्लें नजर आ रही हैं जिनके लिये उम्मीद की किरण कहीं दूर तक भी नजर नहीं आ रही। उनमें से बहुत सारे नौजवान प्रतिभाशाली हैं, परिश्रमी हैं और अवसर मिलने पर वे खुद को साबित कर सकते हैं। लेकिन, अवसर हैं कि लगातार सिकुड़ते जा रहे हैं। अब…जब अवसर ही कम होते जाएं तो नौजवान क्या करें।

केवल बातें बघारने से कुछ नहीं होता कि भारत में 15 से 35 वर्ष के युवाओं की तादाद दुनिया मे सर्वाधिक है और इस नाते भारत युवा देश है। नौजवानों की इस विशाल संख्या के लिये न गुणवत्ता पूर्ण शिक्षण-प्रशिक्षण की सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है न उनके लिये रोजगार की किसी व्यापक योजना पर काम हो रहा है।

आखिर, यही 15-18 से 35 की युवा आबादी, जो देश का संसाधन थी, आज की तारीख में देश ही नहीं, समाज और परिवार की भी सबसे कठिन चुनौती बन कर सामने खड़ी है।

रिपोर्ट्स बताते हैं कि बेरोजगारी पिछले 45 वर्षों के उच्चतम मुकाम पर पहुंच गई है और फिलहाल इस स्थिति से निजात पाने की कोई सूरत नजर नहीं आ रही। केंद्र सरकार रेलवे, बैंक सहित तमाम सरकारी वैकेंसीज पर ऐसी कुंडली मार कर बैठ गई कि फिर टस से मस नहीं हुई। आखिर नीतियों का मामला है जी। नीतियां बोले तो…ऐसी योजनाएं जिनसे सत्ता-संरचना पर काबिज तत्वों के हित सधते हों, भले ही इन योजनाओं के अनुसार निर्मित नीतियां जनता के व्यापक हितों के एकदम खिलाफ हों।

अखबारों में नियुक्तियों के विज्ञापन के बदले खबरें छपती हैं कि सरकार ने चार लाख सरकारी पदों को खत्म कर दिया, पब्लिक सेक्टर की फलां कम्पनी को ही बेच दिया…कि सरकार और भी ऐसे लाखों सरकारी पदों को चिह्नित कर रही है जिन्हें समाप्त किया जाना है।

स्किल डेवलपमेंट की तमाम योजनाएं कागज पर ही उछल-कूद मचाती रहीं और जमीन पर उतरने के साथ ही हास्यास्पद हश्र का शिकार होती रहीं। आज कितनों को याद है कि कभी इस सरकार ने जोर-शोर से कौशल विकास केंद्रों की स्थापना की बात की थी। इन केंद्रों का क्या हश्र हुआ, इस पर अब बातें भी नहीं होती।

हालांकि…बातें होती हैं। खूब होती हैं। बातें कश्मीर पर होती हैं, पाकिस्तान पर होती हैं, मंदिर पर होती हैं, गायों की महानता और उनकी रक्षा के लिये खून बहा देने पर होती हैं…और…अब तो परमाणु युद्ध पर भी बातें होने लगी हैं।

टीवी चैनल हमसे बातें करते हैं। वे हमें यह नहीं बताते कि भारत किस आर्थिक अराजकता और बदहाली के मुहाने पर आ खड़ा हुआ है…कि आने वाले समय में बढ़ती बेरोजगारी कितने सितम ढाने वाली है, कि हमारा समाज किस तरह अंतर्विरोधों का शिकार होता जा रहा है।

वे हमें बताते हैं कि परमाणु युद्ध होने पर किस तरह हमें अपने घर में ही दुबके रहना है, किस तरह एक महिला ने तीन सांपों को जन्म दिया, किस तरह एलियन गायों का दूध दुह कर अपने ग्रह पर ले गए आदि-आदि।

दुनिया के तमाम आर्थिक विशेषज्ञ कह रहे हैं कि भारत का ‘इकोनॉमिक स्लोडाउन’, जो अब एक व्यापक त्रासदी का रूप लेता जा रहा है, सिर्फ वैश्विक कारणों से ही नहीं है, बल्कि इस हालत के लिये सरकार के आर्थिक क्रिया-कलाप भी जिम्मेदार हैं।

लेकिन, भेड़ों का झुंड है कि मानने को तैयार नहीं कि हमारी मुख्य समस्या विदेशी साजिशें या पाकिस्तान नहीं, हम खुद और हमारा नेतृत्व है।

नोटबन्दी के हाहाकारी परिणामों पर आप चाहे जितने तर्क दें, भेड़ों का झुंड आज भी मानने को तैयार नहीं कि यह एक अपरिपक्व फैसला था जिसका मकसद सनसनी फैला कर यूपी के विधान सभा चुनावों के विमर्शों की धारा मोड़ना था।

आज जिस मंदी की आहट से बाजार कांप रहा है उसके लिये नोटबन्दी और उससे उपजी असंगठित क्षेत्र की बर्बादी कितनी जिम्मेदार है, इसे मानने के लिये आज भी भेड़ों का झुंड तैयार नहीं।

आदमियों के भेड़ में तब्दील होने के लिये कम पढा-लिखा या अनपढ़ होना कोई शर्त्त नहीं। आप पीएचडी कर के भी आदमी से भेड़ में बदल सकते हैं। आज हमारे देश में ऐसे हजारों-लाखों उदाहरण हैं।

यह भेड़ियों का युग है, भेड़ों का युग है। भेड़ों द्वारा भेड़ियों के जयजयकार का युग है। आदमी अप्रासंगिक हो गए हैं।

लुटेरे लूट रहे हैं…देश को, हमको, हमारे संसाधनों को, हमारे श्रम को, हमारे अधिकारों को। हम चुप हैं। अगर हम बोलते हैं तो पाकिस्तान पर, कूदते हैं तो कश्मीर पर, आंखें दिखाते हैं तो अपने ही ऐसे लोगों को जो सदियों से हमारे साथ हैं और सहस्राब्दियों तक हमारे साथ ही रहना है जिन्हें।

हां… हम जुलूस भी निकालते हैं। लेकिन, बढ़ती बेरोजगारी के खिलाफ नहीं, अमानवीय होते श्रम कानूनों के खिलाफ नहीं, शिक्षा-चिकित्सा के निजीकरण के खिलाफ नहीं।

हम जुलूस निकालते हैं रामनवमी में, शिवरात्रि में, कांवड़ यात्रा में। हमारे हाथों में शिक्षा, चिकित्सा और रोजगार की मांगों की तख्ती नहीं, वे त्रिशूल और तलवारें हैं जिन्हें किन्हीं अदृश्य हाथों ने हमें थमाया है। ऐसे जुलूस हम पहले भी निकालते थे, लेकिन हमने अब उनका स्वरूप बदल दिया है। अब हम इनमें भक्तिभाव से भरे नारे कम, दूसरों को आतंकित करने वाले नारे अधिक लगाते हैं।

हम अपनी व्यक्तिगत चेतना के ह्रास के दौर से तो गुजर ही रहे हैं, सामूहिक चेतना के पतन के दौर से भी गुजर रहे हैं।

हमारी सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि इस दौर में कोई ऐसा नेतृत्व नहीं जो आदमियों को अहसास करवा सके कि वे भेड़ नहीं आदमी हैं। यह हमारी ही नहीं, इस दौर की भी त्रासदी है जिसकी कोख से अगला दौर जन्म लेने वाला है। यानी, यह दौर अगली पीढ़ियों के लिये भी अभिशाप के अध्याय रच रहा है।

आदमी भेड़ नहीं होता। जिस दिन अधिकतर लोगों को यह अहसास हो जाएगा, आदमियों को भेड़ों की तरह हांकते गड़रिए भाग खड़े होंगे।

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