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पत्र-का₹ को पत्रकारिता के मूल्य और एथिक्स से मुक्त हो नियुक्ति “पत्र” और “का₹” पर चिंतन करना चाहिए!

संजय श्रमण

हिंदी पत्रकारिता दिवस पर आज श्री रामनाथ गोयंका को याद कीजिये, विराट पुरुषार्थ से उन्होंने “खिलाड़ी अक्षय” पुरस्कार प्राप्त किया था! महान पत्रका₹ खिलाड़ी जी को कौन नहीं जानता?

आज ही के दिन पंडित शुक्ल ने “उदन्त मार्तंड” अर्थात उगता सूरज पत्र आरंभ किया था। राजनीति में उगते सूरज को कौन नहीं जानता? समस्त पंडित उगते सूर्य को नमस्कार करते हैं। यह सूर्य नमस्कार शरीर से अधिक धंधे को पुष्ट करता है। इसीलिए योगऋषि राजधानियों में सिंहासन सिखाते और शिलाजीत बेचते पाए जाते हैं। शिला की भांति अटल स्थिति और मल्ल-खंभ की तरह स्नेहक स्तंभन हेतु राजनीति की चिकनी शिलाओं पर जतन से बैठे योगसिध्द ऋषियों का शिलाजीत बड़ा काम आता है।

जब हिंदी पत्रकारिता दिवस का आरंभ ही पंडित जी के “उगते सूरज” से हुआ है तो पूरी की पूरी पत्रकारिता ही उगते सूर्यों की प्लेट में रखी भेलपूरी बन जाने पर आप व्याकुल न हों। यही विधि का विधान है, इस विषय मे धीर पुरुष मोहित नहीं होते।

इस दिन चुनिंदा पत्र पत्रिकाओं को इकट्ठा कर उन्हें सदपात्रों को दान करना चाहिए, इससे आपको संगम स्नान का पुण्य मिलेगा। समय और राजनीति अनुकूल हो तो आप इसका उल्टा भी कर सकते हैं सदपात्रों को ही इकट्ठा करके इन पत्रों को समर्पित कर दें! इससे सहस्त्र गौदान तुल्य पुण्यलाभ मिलेगा और उदन्त मार्तंड की तीव्र रश्मियां आपको कष्ट नहीं देंगीं बल्कि आप पर नरों में इंद्र की अनुकम्पा से शीतल चन्द्र प्रकाश की वर्षा होगी। यहां आप सदपात्रों की परिभाषा पात्रा जी से पूछ सकते हैं।

इस दिन यश-आकांक्षी पत्र-का₹ को पत्रकारिता के मूल्य और एथिक्स आदि के अश्लील विचारों से मुक्त रहकर केवल नियुक्ति “पत्र” और “का₹” पर चिंतन करना चाहये। पत्र-कार से बड़ा कार-पत्र होता है. ‘का₹’ शब्द बड़ा विराट है। यहाँ ‘का’ का अर्थ है ‘क्या’ … मतलब ये कि राजनीति के उगते सूर्य के लिए आप क्या कर सकते हैं? बाकी “₹” का अर्थ तो आप जानते ही हैं!

पत्रकारिता करते हुए कार उसे ही मिलती है जो राजनीति के विषदंत मार्तंड हेतु निष्काम भाव से कार सेवा करता है। कारसेवा न करने वाले को कार तो छोड़िए चेयर कार तक नहीं मिलती।

अस्तु, हे पत्रका₹, राजनीति, बिजनेस, मार्केट और माफिया के उदन्त मार्तंडों पर निरन्तर नजर रखो दैनिक उगते भास्कर को नमन करो अपनी नई दुनिया बसाने की बजाय विषदंत मार्तंड को रोजाना ज़ी हुज़ूर बोलते हुई उनकी कृपा से राष्ट्रीय सहारा प्राप्त करो, बेसहारा न रहो, श्रीहीन दलितों और मजदूर मनुष्यों के दैनिक रण के लिए जागते न रहो बल्कि रणछोड़ दास महाराज की उपमा से शिक्षा लेकर दैनिक भाग-रण बनो।

अमेरिकी टाइम की तरह हर टाइम बदलने की बजाय टाइम्स ऑफ इंडिया या हिंदुस्तान टाइम्स बनो। विवाह की पत्रिका छपवाने से आरंभ करो और उभरती राजनीति की बारात का स्वागत गुलाबजल से करते हुए राजन्यों में स्थान बनाने वाली पत्रिका बनो।

पत्र पत्रिकाओं में शिरमौर बनो वत्स, मेरी दृष्टि में शेष सभी पत्र गौण और अन्य है किंतु वेदवाणी की भांति जो धन्य है वो तो बस पांचजन्य है!

आज इस पुनीत अवसर पर सभी पत्रों और कारों को शुभकामनाएं, आप लोगों में शुरू से ही एक फकीरी है, क्योंकि आप आम बड़े ही खास तरीके से खाते हैं। राजनीति के उदन्त विषदंत इस आम आदमी की छाती में छेद करते हैं और आप उसे बड़े प्यार से चूसते हैं।

आपके पत्र और कार सहित उदन्त विषदंतो के विषदंत इसी तरह लंबे होते रहें, यही शुभकामनाएं।

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