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दुल्ला भट्टी और लोहड़ी हिन्दू-मुस्लिम-सिख, किसान और मज़दूर एकता की अटूट मिसाल हैं

अकबर के शासन काल में कुछ किसानों ने अकबर के सामने घुटने टेकने के बजाय विद्रोह का रास्ता अपनाया और जंगलों में रह कर शाही फ़ौज के साथ छापे मार लड़ाई की। इन्हीं बगावती किसानों में सबसे ज्यादा प्रसिद्द हुए किसान योद्धा का नाम था दुल्ला भट्टी। दुल्ला भट्टी एक प्रगतिशील किसान थे, जो मज़दूर-किसानों के साथ हो रही लूट को पहचानते थे। इस लूट के खिलाफ उन्होंने दो मोर्चों पर लड़ाई लड़ी। एक तरफ मुगलिया हुकूमत के खिलाफ बग़ावती मोर्चा संभाले हुए थे तो दूसरी तरफ अमीर लोगों से धन लूट कर गरीब लोगों की मदद किया करते थे। उनका सामाजिक गरीबी और पिछड़ेपन के खिलाफ एक और मोर्चा था। दुल्ला गरीब हिन्दू, मुसलमान और सिख लड़कियों के विवाह में मदद करते थे। क्योंकि गरीब किसान-मज़दूरों की लड़कियों पर शाही ज़मींदारों और शासकों की बुरी नज़र रहती थी। उस समय वे क्रूर सामंत/शासक उन्हें अगवा कर गुलाम बना लेते और मुजराबाज़ार या दासों के बाज़ार में बेच देते थे। ऐसी लड़कियों की रक्षा के लिए ही दुल्ला भट्टी उन लड़कियों के लिए काबिल वर ढूंढते थे और उनकी शादी से लेकर कन्यादान तक खुद करते थे।
  
लोकगीतों में उनका एक बड़ा प्रसिद्ध किस्सा है। सामंतशाही की आर्थिक और सामाजिक लूट के उस दौर में दूल्हा भट्टी को सुन्दरी और मुंदरी नाम की दो गरीब बहनों के बारे में खबर मिली जिन्हें वहाँ का सामंत ज़ोर-जबरदस्ती अपने हरम में ले जाना चाहता था। उन गरीब लड़िकयों के मां-बाप खेती किसानी में खपकर मर चुके थे। लेकिन उनके एक चाचा थे, मगर बूढ़े चाचा उनको उस सामंत से बचाने में असमर्थ थे। ऐसे में उनकी खबर जब दुल्ले तक पहुंची तो उन्होंने हमेशा की तरह उन दोनों गरीब लड़कियों के लिए लड़के ढूंढे। 13 जनवरी की रात ही किसानों को खेतों में इक्कठा किया और किसानों के अंदर हौसला जगाने और सामंतों के खिलाफ बगावत के लिए तैयार करने के लिए खेतों में कुछ लकड़ियाँ जला कर उस अग्नि के चारों और फेरे करवा उनका सामूहिक ब्याह करवा दिया। उस समय उनके पास पैसे नहीं थे इसलिए वहां खड़े किसानों से एक-एक सेर चीनी और किसानों के मूंगफली, तिल और गुड़ भेंट कर उन्हें विदा किया। इसी ब्याह को आज लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है। इन्हीं सब कार्यों की वजह से ही दुल्ला पंजाब के गरीबों के लोक नायक बनकर उभरे थे।

मगर समकालीन अकबर दरबार उन्हें डाकू घोषित कर चुकी थी क्योंकि उन्होंने हुकूमत द्वारा वसूले जाने वाले लगान के खिलाफ बगावत की थी। मुगलिया फौजें उन्हें हमेशा पकड़ने के लिए मुस्तैद रहती थीं। 26 मार्च 1599 को लाहौर में मुगल साम्राज्य ने इस पंजाबी लोकयोद्धा को शहीद कर दिया। बादशाह अकबर ने अपने समकालीन विद्रोहियों को सबक सिखाने के लिए बाबा दुल्ले को भीड़ में फांसी देने का हुक्म सुनाया था। पंजाबी कवि शाह हुसैन फांसी के समय वहां मौजूद थे। उन्होंने बाबा दुल्ले के आखरी शब्दों को पिरोया है, जो उन्होंने फांसी चढ़ने से पहले कहे थे “पंजाब का हौंसलेवान जन(वासी) पंजाब की मिट्टी का कभी सौदा नही करेगा “। बाबा दुल्ले की गाथा दरबारी तारीख़ से हटकर सांझे पंजाब के विद्रोही इतिहास का शानदार पन्ना है। उनका लोकहिती श्रम हुकूमत द्वारा खींचीं हदों-सरहदों को नकारता हुआ सांझी पंजाबियत को मुक्कमल करता है। आज भी लोक गीतों और लोक कथाओं के माध्यम से दुल्ले पंजाब के किसान-मज़दूरों के दिल में बसे हुए हैं। हर बार लोहड़ी पर उनका लोकगीत सुन्दरी मुंदरी गाया जाता है जिसके बोल इस प्रकार हैं:  
सुन्दरी मुंदरी होय

(हे सुन्दरी और मुंदरी)                                                          

तेरा कौन विचारा होए !

(तुम्हारी परवाह कौन करेगा)

दुल्ला भट्टी वाला होए !
(दुल्ला भट्टी है ना)

दुल्ले दी दीह व्याही होए !
(दुल्ला भट्टी बेटी बनाकर ब्याह करेगा)

सेर शक्कर पाई होए !
(वो दहेज में एक किलो शक्कर ही दे पाया)

कुड़ी दा लाल पचाका होए !
(लड़की ने दुल्हन वाला लाल जोड़ा पहना)

कुड़ी दा सालू पाट्टा होए !
(लेकिन उसकी शाल फटी है)

सालू कौन समेटे होए!
(उसकी शाल कौन सिलेगा, कौन उसका खोया मान लौटाएगा)

मामे चूरी कूटी ! 
(मामा ने मीठी चूरी बनाई थी)

ज़मींदारा लुट्टी !

(उसे भी ज़मींदार ने लूट लिया)

ज़मींदार सुधाए !
(अमीर ज़मीदार ने लड़की का अपहरण कर लिया)

बड़े भोले आए !
(कई गरीब लड़के आए)

इक भोला रह गया !

(एक सबसे गरीब लड़का रह गया)

सिपाही पकड़ के लै गया !
(उसे भी सिपाहियों ने पकड़ लिया, शक था कि वो दुल्ला भट्टी का भेजा हुआ है)

सिपाही ने मारी ईट !
(सिपाहियों ने उसे ईंट से मारा- प्रताड़ित किया)

पावें रो ते पावें पिट !
(अब चाहे रोवो या सिर पीटो)

डब्बा भरया लीरां दा

(कपड़ों से डिब्बा भर गया)
                        

ए घर अमीरा दा !

(यह घर सच में दिलदारों का है)

हुक्का भई हुक्का

(इन्होंने कुछ नहीं दिया)

ए घर भुक्खा !

(यह घर कंजूसों का है)

साणू दे दे लोहड़ी !

(हमें लोहड़ी का तोहफ़ा दे दो)

ते तेरी जीवे जोड़ी ! 
(तुम्हारी जोड़ी सलामत रहे)

आपकी लोहड़ी हिन्दू-मुस्लिम-सिख, किसान और मज़दूर एकता की अटूट मिसाल है।

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