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पुलवामा हमले में चीन के छुपे हितों का खतरनाक इतिहास और सरकार का गड़बड़ गणित!

पाकिस्तान हमेशा से ही भारत पर आतंकवादी हमले करवाने की नीति पर जोर देता रहा है। कश्मीर में हुए बम धमाके में भी पाकिस्तान की घिनौनी हरकत का एक और उदाहरण सामने आया है। लेकिन इस घटना को ठीक से समझने के लिए हमें इतिहास को खंगालना होगा, जब एक आतंकवादी मौलाना मसूद अज़हर को छुड़वाने के लिए एक भारतीय विमान का अपहरण सुर्ख़ियों में आया था।

मौलाना मसूद अज़हर
मसूद अज़हर का जन्म 10 जुलाई 1968 को पाकिस्तानी पंजाब के बहावलपुर शहर में हुआ था। सरकारी स्कूल के मास्टर के घर जन्मा मसूद अज़हर, पढ़ने के लिए कराची गया, जहाँ यह हरकत-उल-अन्सार से जुड़ा। यह आतंकवादी संगठन, हरकत-उल-मुजाहिद्दीन से बना था। बाद में मसूद अज़हर, हरकत-उल-अन्सार का जनरल सेक्रेटेरी बना। इसने 1994 की शुरुआत में जम्मू कश्मीर में घुसपैठ की और फ़रवरी 1994 को भारतीय सेना ने इसे गिरफ़्तार कर लिया। मसूद अज़हर को छुड़वाने के लिए आतंकवादियों ने ख़ूब प्रयास किया। अल-फ़रान नामक आतंकवादी संगठन ने 1995 में 6 विदेशी सैलानियों का अपहरण कर लिया। जिनमें से एक सैलानी उनके चंगुल से भागने में सफल हो गया, एक कुछ दिनों बाद मृत पाया गया एवं बाक़ी चारों का आज तक कोई अता-पता नहीं है। एक बार फिर इसे छुड़ाने के लिए 1999 में एक भारतीय विमान का अपहरण कर लिया गया।

विमान अपहरण
काठमांडू से उड़कर 24 दिसंबर 1999 को इंडियन एयरलाइन का विमान IC-84 दिल्ली उतरने ही वाला था कि विमान में पहले से ही बैठे हरकत-उल-मुजाहिद्दीन के आतंकवादियों ने इसका अपहरण कर लिया। वे इसे अफ़ग़ानिस्तान के कंधार शहर ले गये। विमान एवं यात्रियों के बदले में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपाई की सरकार को 3 ख़ूँख़ार आतंकवादियों को छोड़ना पड़ा था। अजीत डोभाल, जोकि आज राष्ट्रीय सलाहकार हैं, उन्होंने इस मामले में मोल तोल करने वाले मध्यस्थ आदमी की भूमिका निभाई थी। भारत के तत्कालीन विदेशमंत्री जसवंत सिंह ख़ुद तीनों आतंकियों, मुश्ताक़ अहमद ज़रगर, अहमद उमर सईद शेख़ और मौलाना मसूद अज़हर को छोड़ने कंधार गये थे।

चीन का भूमिका
भारत और चीन के रिश्ते ज़्यादा अच्छे नहीं रहे हैं। दोनों देश 1962 में युद्ध कर चुके हैं। चीन के साथ आज भी भारत का सीमा विवाद है। दुश्मन का दुश्मन, दोस्त होता है। इसलिए भारत के दुनिया में बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिए समय-समय पर चीन पाकिस्तान को असला-बारूद, लड़ाकू विमान से लेकर परमाणु बम की तकनीक तक उपलब्ध करवाता रहा है। इसके साथ-साथ चीन पाकिस्तान को एक बड़ी मात्रा में वित्तीय सहायता भी प्रदान करता रहा है। यह देश पाकिस्तान में चाइना-पाकिस्तान इकोनोमिक कॉरिडर (China-Pakistan Economic Corridor) बना रहा है, जो कि पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) एवं पाकिस्तानी पंजाब से होकर जाता है बना रहा है। इस कॉरिडर में चीन 62 बिलियन डॉलर का इन्वेस्टमेंट कर रहा है। इसके अंतर्गत चीन, पाकिस्तानी पंजाब के लाहौर में 1.62 बिलियन डॉलर की लागत से ओरेंज लाइन मेट्रो का निर्माण कर रहा है। 1698 मिलियन डॉलर से बना ’करोत हाइड्रो पॉवर स्टेशन’ भी पंजाब और पाक अधिकृत कश्मीर में ही झेलम नदी पर बन रहा है। 2889 मिलियन डॉलर से बना ‘पेशावर-कराची मोटरवे‘ भी पंजाब से होकर जाता है। 1.8 बिलियन डॉलर से बना ‘साहिवाल कोल फ़ाएर्ड पॉवर प्लांट’ भी पंजाब में ही है। यह कॉरिडर पाकिस्तानी पंजाब में जैश ए मोहम्मद के मुख्यालय, बहावलपुर से भी न केवल होकर जाता है, अपितु बहावलपुर में इस कॉरिडर के अंतर्गत 460 मिलियन डॉलर की लागत से ’क़ायद-ए-आज़म सोलर पॉवर प्लांट’ भी लगा रहा है।
पाकिस्तानी फ़ौज ही पाकिस्तान में सर्वोपरि है, यह बात किसी से छुपी नहीं है। जबकि मौलाना मसूद अज़हर और हाफ़िज़ सईद जैसे कट्टरपंथी भी पाकिस्तानी फ़ौज की सहायता की वजह से बहुत बड़ा प्रभाव रखते हैं। अपने कॉरिडर को इन चरमपंथी लोगों द्वारा प्रशिक्षित फ़िदायीनों के आत्मघाती हमलों से बचाये रखने के लिए चीन ऐसे आतंकवादियों का परोक्ष रूप से पक्ष लेता है। भारत के विरुद्ध चीन द्वारा संयुक्त राष्ट्र में मौलाना मसूद अज़हर के पक्ष में वीटो करना भी उसी का उदाहरण है।


जैश ए मोहम्मद
मौलाना मसूद अज़हर द्वारा 2000 में बनाया गया जैश-ए-मोहम्मद, एक आतंकवादी संगठन है। इसका एकमात्र उद्देश्य भारत की एकता एवं अखंडता पर प्रहार करके यहाँ आतंकवाद फैलाना है। भारत ही नहीं बल्कि ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, रूस, ब्रिटेन, अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात एवं संयुक्त राष्ट्र भी इसे आतंकवादी संगठन घोषित कर चुके हैं। पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेन्सी आई एस आई के सहयोग से बने इस आतंकवादी संगठन का मुख्यालय पाकिस्तानी पंजाब के बहावलपुर में है। 

भारत में जैश-ए-मोहम्मद कई आतंकवादी हमले करवा चुका है। 13 दिसम्बर 2001 को भारतीय संसद पर हमला, इसी आतंकवादी संगठन ने करवाया था, जिसमें 9 फ़रवरी 2013 को अफ़ज़ल गुरु को फाँसी दी गयी थी। मुंबई में 26 नवम्बर 2008 को हुआ हमला भी इसी संगठन ने करवाया था। इस हमले में 167 बेक़सूर लोगों की जान चली गयी और एकमात्र बचे आतंकवादी अब्दुल आमिर कसाब को 21 नवम्बर 2012 को फाँसी दे दी गयी थी। तीन साल पहले 2 जनवरी 2016 को पठानकोट में हुए आतंकी हमले का मास्टरमाइंड भी जैश-ए-मोहम्मद का मसूद अज़हर ही था। इसके साथ ही पिछले हफ़्ते पुलवामा में हुए फ़िदायीन आतंकी हमले की जिम्मेवारी भी जैश-ए-मोहम्मद ने ही ली है।

पुलवामा कार बम हमला
हाल ही में 14 फ़रवरी 2019 को जम्मू कश्मीर के पुलवामा एक आतंकवादी हमला हुआ। छुट्टियाँ मनाकर वापस लौटे सीआरपीएफ़ के लगभग 2500 जवानों को सड़क के रास्ते जम्मू से श्रीनगर लाया जा रहा था। तभी जैश-ए-मोहम्मद द्वारा प्रशिक्षित एक आतंकवादी ने भारी मात्रा में आरडीएक्स भारी गाड़ी जवानों के क़ाफ़िले में जा रही एक गाड़ी में भिड़ाकर बम विस्फोट कर दिया और 44 जवान शहीद हो गये। जम्मू कश्मीर में यह अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला है। यह कोई मामूली आतंकी घटना नहीं है। यह हमला अपने पीछे बहुत से प्रश्न छोड़ गया है, जिनके उत्तर किसी के पास नहीं हैं। गोदी मीडिया भी सवालों के सही जवाब ढूँढने की बजाये, सरकार की विफलता छुपाने में लगा है।

देशभक्ति का दम भरने भाजपा ने जम्मू कश्मीर के विधान सभा चुनावों के बाद, जैश-ए-मोहम्मद के साथ सहानुभूति रखने वाली पी॰डी॰पी॰ के साथ सरकार ही क्यों बनाई थी? जम्मू कश्मीर में हुये ख़राब हालातों के लिए क्या ऐसी पार्टी के साथ सरकार में भाजपा ज़िम्मेदार नहीं है? आज राज्य में जो राष्ट्रपति शासन लगा है, क्या वह चुनावों के तुरंत बाद बिना सरकार बनाए नहीं लगाया जा सकता था? अनुच्छेद 370 और 35A को हटाने के लिए वोट माँगे और पीडीपी के साथ सरकार बनाई। सरकार में रहते इन अनुच्छेदों को क्यों नहीं हटाया गया? माननीय सुप्रीम कॉर्ट में अनुच्छेद 370 के विरोध में आज जो अपील की गई है, उसके लिए क्या पुलवामा जैसे आत्मघाती बम धमाके का इंतज़ार करना ज़रूरी था? आज जब राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा हुआ है, और राज्य की शासन व्यवस्था राज्यपाल के माध्यम से केंद्र के पास है तो क्या सुरक्षा इंतज़ामो में हुई इतनी बड़ी चूक की ज़िम्मेदार केंद्र सरकार नहीं है?
बिना बुलाए पाकिस्तान के घर पहुँच कर नवाज़ शरीफ़ से मिलकर, अपनी कूटनीति का दंभ भरने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्या शहीदों के घर भी जाएँगे? विवेक तिवारी की हत्या पर सरकार ने करोड़ों रुपये मुआवज़ा एवं सरकारी नौकरी दी थी। सभी शहीदों के परिवारों को क्या उतना भी हक़ नहीं है? पिछले साल देश के नेताओं से लेकर अभिनेत्रियों के मरने पर राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया। आज जब पूरा राष्ट्र शोक में है तो क्या शहीदों की शहादत ’राष्ट्रीय शोक’ नहीं है? अंग्रेज़ी अख़बारों के मुताबिक़ 80 किलोग्राम IED से भरी कार जवानों के क़ाफ़िले से टकराई। इतनी भारी मात्रा में IED आया कहाँ से, और इतना भारी भरकम बारूद लाना क्या एक ही आदमी का काम हो सकता है?

जनवरी के अंतिम सप्ताह में अमेरिका की भारत में आम चुनाव से पहले हिंसा की चेतावनी को नहीं माना गया। आख़िर माने भी क्यों विदेशी ख़ुफ़िया विभागों की चेतावनी को। लेकिन जब 8 फ़रवरी को ही भारतीय ख़ुफ़िया विभाग ने IED के इस्तेमाल की चेतावनी दे दी थी तो सरकार ने इसे हल्के में क्यों लिया? जब सीआरपीएफ़ ने जवानों को हवाई मार्ग से ले जाने के लिए सरकार से एक सप्ताह पहले ही हवाई जहाज़ माँग लिया था तो सरकार ने क्यों नहीं दिया? क्या हवाई जहाज़ केवल प्रधानमंत्री और नेताओं के विदेशी दौरों और देशी रैलियों के लिए ही हैं।

निश्चित ही हमारे देश के जवानों की शहादत पर राजनीति नहीं होनी चाहिए, परन्तु भारत के प्रधानमंत्री कोई ठोस क़दम उठाए बग़ैर इस हमले के बाद भी एक के बाद चुनावी रैलियाँ क्यों कर रहे हैं?
भारत की संप्रभुता पर हमले में निश्चय ही पाकिस्तान का हाथ होता है; परंतु शेष भारत में कश्मीरियों पर हमले एवं जवाहरलाल नेहरु विश्वविध्यालय के छात्रों पर हमले की धमकी के जो वीडियो वाइरल हो रहे हैं, उनका ज़िम्मेदार कौन है?
मुंबई में 2008 में हुए हमले के बाद भारत के गृहमंत्री शिवराज पाटिल और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने अपनी ज़िम्मेदारी मानते हुए इस्तीफ़ा दिया था। बल्कि भारत के तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम के नारायण ने भी इस्तीफ़े की पेशकश की थी। क्या आज भारत के गृह मंत्री, कश्मीर के राज्यपाल और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की कोई नैतिक ज़िम्मेवारी भी नहीं है? जबकि राज्यपाल तो सुरक्षा में लापरवाही की बात भी स्वीकार कर चुके हैं। गृह मंत्रालय भी ख़ुफ़िया विभाग की चेतावनी से अवगत था। कम से कम अजीत डोभाल की तो जिम्मेवारी तो बनती ही है जोकि 1999 में मसूद अज़हर को छोड़ने के मामले में भी मध्यस्थ आदमी की भूमिका में थे।
इस हमले के इतने दिन बीत जाने के बाद भी सरकार ने अभी तक पाकिस्तान के विरुद्ध कोई बड़ा ठोस क़दम क्यों नहीं उठाया? जबकि इसके बाद भी भारतीय जवान शहीद हो रहे हैं। क्या ‘मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन (MFN)’ वापस लेने के लिए इस हमले का इंतज़ार करना ज़रूरी था? क्या पाकिस्तान से आयात की गयी वस्तुओं पर आयात कर 200% करना एक पर्याप्त क़दम है? वह भी तब जब भारत, पाकिस्तान से केवल 3482 करोड़ का आयात करता है। जबकि गुजरात में लगभग इतने ही 3000 करोड़ की सिर्फ़ एक मूर्ति सरकार ने चीन से बनवाई है। जबकि चीन तो मसूद अज़हर का हिमायती भी है।
सरकार ने कश्मीर के पाँच अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा हटाकर बहुत ही अच्छा काम किया है, परंतु प्रश्न ये है कि जो अलगाववादी नेता भारत की शांति के लिए बहुत बड़ा ख़तरा हैं उनको सरकारी ख़र्चे पर आख़िर सुरक्षा ही क्यों दी गयी थी;?

खैर प्रश्नों की फेहरिस्त अभी बहुत लम्बी है। लेकिन भारत को निश्चित ही पाकिस्तान को ठोस भाषा में जवाब देना चाहिए। जरूरी भी है, क्योंकि पाकिस्तान की इस कायरता पूर्ण हरकत को कभी माफ़ नहीं किया जा सकता। पर सरकार की लापरवाही और ठोस कदम उठाने में देरी का जवाब भी क्या हम पाकिस्तान से मांगे?

परमीत काजल वर्तमान में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे हैं।

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