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हैदराबाद रेप केस: कानून के राज में एनकाउंटर को किसी भी तरह से इंसाफ नहीं कहा जा सकता!

ज्योति जाटव

हैदराबाद बलात्कार कांड के चारों दरिंदों को पुलिस ने ‘एनकाउंटर’ में मार गिराया। तेलंगाना पुलिस के इस कारनामे की आमतौर पर तारीफ हो रही है, जो स्वाभाविक तो है लेकिन यह तारीफ हमारी समूची न्याय व्यवस्था पर एक कठोर टिप्पणी भी है।

वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन का मानना है कि कानून के राज में एनकाउंटर को किसी भी तरह से इंसाफ नहीं कहा जा सकता, खासकर औपनिवेशिक मानसिकता वाली हमारी पुलिस के भ्रष्ट और आपराधिक चरित्र को देखते हुए।

वास्तव में तो ऐसे एनकाउंटर पर समाज को चिंतित होना चाहिए, लेकिन फिर भी लोग इसे वास्तविक इंसाफ मान रहे हैं तो यह उनकी हताश-निराश मानसिकता का परिचायक है।
इस ‘क्रिमिनल जस्टिस’ पर बज रही तालियां बता रही हैं कि देश की न्याय व्यवस्था पर से आम आदमी का भरोसा उठ गया है और वह मान चुका है कि हमारी अदालतें भी व्यवस्था तंत्र के दूसरे हिस्सों की तरह भ्रष्ट और नाकारा हो चुकी है।

इस मामले में गिरीश मालवीय का मानना है कि जब खुले सदन में सांसद अभियुक्तों के लिए लिंचिंग की मांग करते हैं तो यह तो होना ही था, वैसे छोटे लोगो का एनकाउंटर होता है बड़े लोगो का हनी ट्रैप!

हैदराबाद के आरोपियों का ट्रायल आप फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाते तो महीने भर में भी फैसला बाहर आ जाता (इंदौर में पिछले साल मात्र 23 दिन में छोटी बच्ची से बलात्कार के मामले में फाँसी की सजा सुनाई गई है)। इसलिए यह कहना बन्द कर दीजिए कि इंसाफ जल्दी नहीं दिया जा सकता। इच्छा शक्ति हो तो सब सम्भव है।

लेकिन अब न्यायतंत्र की अपेक्षा हमे भीड़तंत्र पर ज्यादा भरोसा होने लगा है और यह खतरनाक संकेत है।

यह कोई समाधान नहीं है। हम सभ्यता की दौड़ में आगे नहीं बढ़ रहे हैं बल्कि पीछे की ओर जा रहे हैं। हम आधुनिक बन रहे हैं लेकिन हमारी सोच बर्बर हो रही है।

वैसे आपको यदि लग रहा है कि अब से सब बदल जाएगा तो ऐसा कुछ नहीं है। रसूखदार कुलदीप सेंगर माननीय बने रहेंगे, और चिन्मयानंद संत, कोई आराम से भाग कर ‘कैलासा’ ही बसा लेगा, बलात्कार पीड़िता को कभी ट्रक कुचलेगा कभी चलते रास्ते उसे आग के हवाले कर दिया जाएगा।

एनकाउंटर को न्याय का आखरी हथियार माना जाने को लेकर बीबीसी के पत्रकार आदर्श राठौर कहते हैं, “जो लोग हैदराबाद वाली घटना के अभियुक्तों को मारे जाने को बढ़िया कदम बता रहे हैं वे शिमला के गुड़िया केस को याद करें। पुलिस ने आनन-फानन में किसी को भी जेल में डाल दिया था। जब मामला सीबीआई को सौंपा जाने लगा तो एक अभियुक्त की जेल में हत्या कर दी गई। बाद में असल अपराधी कोई और निकला।

गुड़गांव पुलिस ने भी एक स्कूल में बच्चे की हत्या के लिए ड्राइवर को अंदर डाल दिया था जबकि हत्या एक छात्र ने की थी। क्या गारंटी हैदराबाद पुलिस ने असली गुनहगार पकड़े थे? कोर्ट में इसका फैसला होता मगर पहले ही उन्हें मार दिया गया। हैदराबाद की घटना बेहद शर्मनाक है।”

स्वतन्त्र पत्रकार उमेश राय लिखते हैं कि, मुल्क का एक बड़ा तबका हैदराबाद रेप-मर्डर के आरोपियों को गोली मार देने को कह रहा था.

ये वो तबका है, जो लड़कियों को संस्कारी होने की भी वकालत करता है और उनके कपड़ों पर सवाल उठाता है. हर घटना में साम्प्रदायिक तत्त्व तलाशता है और उसे भुनाता है.

अकर्मण्य हैदराबाद पुलिस ने इस तबके को खुश करने और हीरो बनने के लिए चारों आरोपियों को गोली मार दी.

शायद पुलिस जानती थी कि वो कमजोर जांच करेगी और आरोपी छूट जाएंगे जिससे उसकी और भद्द पिटेगी इसलिए उसने इनकाउंटर (?) चुना. अब पुलिस की इस बहादुरी (?) को सेलिब्रेट किया जाएगा.

जिस पुलिस पर सवाल उठना चाहिए था कि थाने शिकायत करने गए रेप पीड़िता के परिवार को उसने क्यों कहा था कि वो किसी संग भाग गई होगी, उसे सैल्यूट किया जाएगा.

बधाई हो, न्याय अब ऐसे ही होगा. सोशल मीडिया का ट्रेंड तय करेगा कि आरोपियों को गोली मारी जाए या सुनवाई हो. कोर्ट कचहरी को तबेला बना देना चाहिए.

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