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रिपोर्ट

भारत के मैच हारने से पाकिस्तान नहीं हो सकता वर्ल्ड कप से बाहर, भारत ने किया अपना भविष्य सुरक्षित

दीपक गोस्वामी

कल भारत ने इंग्लेंड के खिलाफ बहुत ही सूझ-बूझ भरी बल्लेबाजी की. लेकिन देश का दुर्भाग्य है कि यहां लोग क्रिकेट तो देखते हैं लेकिन इस खेल की समझ उनमें अब तक विकसित नहीं हुई है.

बहुत ज्ञान पेल दिया कल से सबने भारत की हार पर. कोई कहता है कि भारत जानबूझकर हारा ताकि पाकिस्तान बाहर हो जाए तो कोई अंत के ओवरों में धोनी की बल्लेबाजी की आलोचना कर रहा है.

लेकिन दोनों ही दावे सच से कोसों दूर हैं. क्रिकेट देखना ही सब कुछ नहीं होता, उसकी समझ भी होनी चाहिए. वहीं, सच्चा प्रशंसक वही है जो अपनी टीम की हार पर भी उसके साथ खड़ा रहे.

अब बात पहले दावे की करूं कि भारत इसलिए जानबूझकर हारा क्योंकि पाकिस्तान को बाहर करना था, तो यह तथ्यों से कोसों दूर है क्योंकि भारत की हार के बाद भी पाकिस्तान विश्वकप से बाहर नहीं हो सकता था.

यह बात भारत का टीम प्रबंधन भी भली-भांति जानता होगा इसलिए जब पाकिस्तान बाहर ही नहीं हो सकता था तो टीम क्यों फिजूल में अपनी हार की कुर्बानी देती?

जाहिर सी बात है कि भारत पाकिस्तान को टूर्नामेंट से बाहर करने के लिए जानबूझकर नहीं हारा.

अब दूसरी बात कि भारत की हार हुई क्योंकि उसने और अंत में धोनी ने जीत के लिए प्रयास नहीं किए और हिम्मत हार गये, घटिया बल्लेबाजी की.

हां, यह बात सही है कि भारत ने जीत के प्रयास नहीं किए. लेकिन इसका दोष केवल धोनी पर नहीं डालिए. वास्तव में पहले ओवर से ही भारत ने जीत के प्रयास नहीं किए और यह एक रणनीति का हिस्सा था.

उस रणनीति के तहत देखा जाए तो भारत ने बहुत ही उम्दा बल्लेबाजी की और पूरी हिम्मत के साथ अंग्रेज गेंदबाजों का सामना किया.

रणनीति थी, रिस्क न लेने की और अपना नेट रन रेट अच्छा बनाए रखने की.

भारत ने विश्वकप में अपना भविष्य देखते हुए बल्लेबाजी की.

जीतने के लिए उसे 338 रन का टारगेट था. विश्वकप इतिहास में इतना बड़ा टारगेट कभी चेस नहीं हुआ था. भारत चाहता तो पारी के पहले ओवर से ही ताबड़तोड़ हमला कर सकता था लेकिन उस स्थिति में विकेट गंवाने की भी गुंजाइश रहती. हो सकता था कि जीत के प्रयास में भारत 100-125 रनों से हार जाता. इतनी बड़ी हार का असर उसके नेट रन रेट पर पड़ता.

अब कल्पना कीजिए कि अगले दो मैच में बांग्लादेश और श्रीलंका उलटफेर करके भारत को हरा दें तो क्या होगा?

अब आप कहेंगे कि ऐसा संभव नहीं. तो बंधु क्रिकेट इतिहास ऐसे उलटफेरों से भरा पड़ा है.

अब कल के मैच की बात. अगर भारत इंग्लेंड से कल 100-125 रनों से हार जाता तो बांग्लादेश और श्रीलंका से उसकी हार होने पर वह टूर्नामेंट से खराब रन रेट के आधार पर बाहर हो सकता था.

चूंकि भारत के उस स्थिति में 11 अंक होते. विश्वकप का अंकगणित भिड़ाएं तो 11 अंक वाली ही तब दो टीमें और हो सकती थीं. अगर इंग्लेंड अपने आखिरी मैच में न्यूजीलेंड को हरा दे तो एक टीम न्यूजीलेंड होती.

दूसरी टीम पाकिस्तान हो सकती है अगर वह बांग्लादेश को हरा दे. या बांग्लादेश भी हो सकती है, अगर वह भारत और पाकिस्तान को हरा दे.

इस तरह भारत, पाकिस्तान/बांग्लादेश और न्यूजीलेंड के समान 11 अंक हो जाते. तब नेट रन रेट के आधार पर दो टीमें विश्वकप सेमीफाइनल में क्वालिफाई करतीं.

अब अगर भारत का नेट रन रेट खराब होता तो वह बाहर हो जाता. भारतीय टीम ने यही भविष्य देखा और जीत से अधिक अपने नेट रन रेट और विश्वकप में बने रहने के भविष्य को देखा.

स्पष्ट नीति बनाई कि विश्वकप इतिहास का सबसे बड़ा स्कोर चेस करने की कोशिश में बड़े अंतर से हारने से बेहतर है कि छोटे अंतर से हारा जाए और भविष्य सुरक्षित किया जाए.

अपनी इस कोशिश में टीम कामयाब रही. बहुत ही उम्दा बल्लेबाजी की और तय लक्ष्य पा लिया.

और ऐसी रणनीति क्रिकेट में पहली बार नहीं देखी गई. 1975 के विश्वकप के एक मैच में इंग्लेंड जानबूझकर सुनील गावस्कर को आउट नहीं कर रहा था क्योंकि गावस्कर धीमा खेल रहे थे जिससे कि भारत मैच में पिछड़ रहा था. नतीजा कि इंग्लेंड ने आउट करने के मौकों को गंवाया और इंग्लेंड जीता.

दक्षिण अफ्रीका ने भी आस्ट्रेलिया में खेली गई त्रिकोणीय श्रृंखला में एक बार ऐसा किया था, जहां एक बड़ा लक्ष्य चेस करके जीतकर वह फाइनल में पहुंच जाता. लेकिन उस लक्ष्य से 30 रन से कम से हारने पर भी उसका फाइनल में पहुंचना तय था.

अफ्रीकी टीम ने तब जीत का मोह छोड़कर बड़े अंतर से हारने का जोखिम नहीं लिया और 30 से कम रन से हारी. इस तरह हार कर भी फाइनल खेल दिया.

अफ्रीका के सामने 2007 के ट्वेंटी 20 विश्वकप में भी यही स्थिति सामने आई. मैच भारत के खिलाफ था. जीतने के लिए 150 से ज्यादा रन बनाने थे. और सेमीफाइनल में पहुंचने के लिए करीब 125 रन. अफ्रीका 125 रन बनाने के लिए खेला, वो बात अलग है कि वह इतने भी नहीं बना सका.

तो अगर आप इस खेल की समझ रखते हैं तो जानते होते कि विश्वकप में अपने भविष्य के लिहाज से बनाई रणनीति पर भारतीय बल्लेबाज एकदम खरे उतरे.

लेकिन समस्या यही है कि आज खुद को खेल पत्रकार बताने वाले भी खेलों की समझ के नाम पर केवल इतना जानते हैं कि कौन जीता और कौन हारा? खेल की बारीकियां और नियम उन्हें नहीं पता.

इसलिए अखबारों में भी आपको यही हार-जीत पढ़ने मिलेगी, क्योंकि अयोग्य लोग खेल डेस्क पर बैठे हैं जिन्हें खेल के बारीक पहलुओं की समझ नहीं है.

और कमेंटरी करने वाले आकाश चोपड़ा जैसे लोग हैं जिन्हें केवल बकवास करनी आती है.

इसलिए अति राष्ट्रवादी मत बनिए कि हर मैच जीतना ही है. दीर्घकालीन नतीजों के बारे में सोचिए. खेल केवल हार-जीत तक ही नहीं सिमटा होता. कई अन्य पहलू भी होते हैं जिनके चलते हार कर भी आप जीत जाते हैं.

(दीपक गोस्वामी पत्रकार हैं और लगातार खेल से संबंधित रिपोर्टिंग करते रहे हैं)

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