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रिपोर्ट

देश में आर्थिक संकट, मोदी की दवा और पूंजीवादी ‘कल्याण’, कितना कल्याणकारी?

मुकेश असीम

अर्थव्यवस्था पर थोड़ी भी गंभीर नजर रखने वालों को मालूम है कि प्रचार माध्यमों के जरिये मजबूत एवं सबसे तेज वृद्धि वाली अर्थव्यवस्था के तमाम ढ़ोल पीटने के बावजूद आज भारतीय अर्थव्यवस्था गहरे संकट में है।

नोटबंदी के बाद करोड़ों रोजगार नष्ट होकर 45 साल में सबसे अधिक बेरोजगारी की दर, शहरों-गांवों में गिरती वास्तविक मजदूरी, गरीब किसानों की बरबादी तथा खेत मजदूरों-किसानों की बढ़ती आत्महत्यायें, बैंकों में भारी मात्रा में डूबे कर्जों का संकट, मांग के अभाव में उद्योगों का क्षमता से कम उत्पादन तथा नतीजतन नए निवेश के प्रस्तावों का 14 सालों के सबसे निचले स्तर अर्थात 9.5 लाख करोड़ रुपये ही रह जाना, उसमें भी निजी क्षेत्र का हिस्सा पहले के औसतन 60% से अधिक से गिरकर 45% ही रह जाना, सरकार के वित्तीय घाटे में भारी वृद्धि तथा इस वित्तीय वर्ष में सरकारी कर्जे की योजना में पिछले वर्ष से 25% इजाफ़ा, सरकार के अपने नाम पर ही नहीं खाद्य निगम व अन्य सार्वजनिक उपक्रमों के नाम पर भी लाखों करोड़ का कर्ज इकट्ठा हो जाना, वगैरह बहुत सारे लक्षण हैं जो अर्थव्यवस्था में मौजूद गहरे संकट को दर्शा रहे हैं।

हालांकि सरकार, नीति आयोग, केंद्रीय सांख्यिकीय संगठन तथा रिजर्व बैंक सभी सकल घरेलू उत्पाद में 7% से अधिक वृद्धि दर बता रहे हैं, लेकिन खुद इनके द्वारा ही जारी अर्थव्यवस्था के अन्य आंकड़े इसकी पुष्टि नहीं करते। औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि विरले ही महीनों में 4% से ऊपर गई है, कुछ महीनों में तो नकारात्मक रही है, फरवरी में यह मात्र 0.1% ही रही। कृषि के क्षेत्र में वृद्धि औसतन 2% बताई गई है। फरवरी व मार्च के महीनों में दामों में रियायतों के भारी विज्ञापन के बावजूद कार, स्कूटर, मोटरसाइकल, ट्रैक्टर, आदि सभी वाहनों की बिक्री में गिरावट हुई, यहाँ तक कि मारुति सहित कई कंपनियों को अपने कारखानों में उत्पादन घटाना पड़ा। रोजगार सृजन की नकारात्मक दर तो हमें मालूम है ही। फिर सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि के सरकारी दावों पर भरोसा कैसे किया जाए? खुद रिजर्व बैंक द्वारा हाल में लिए गए कई नीतिगत फैसले बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था को दिशा देने के बजाय किसी गहराई से संकट में डूबी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए उठाये गये कदम हैं। पूंजी की लागत कम करने और उसका प्रवाह बढ़ाने के लिए रिजर्व बैंक दो बार ब्याज दर कम कर चुका है। दो बार उसने बाजार से 3 साल के लिए डॉलर स्वैप (अदला-बदली) के द्वारा 3.3% के ब्याज पर लगभग 70 हजार करोड़ रुपया नकदी बाजार में डाली है। मई के महीने में रिजर्व बैंक बैंकों से सरकारी प्रतिभूतियाँ लेकर उसके बदले में उन्हें और 25 हजार करोड़ रुपए देने वाला है। ये सभी कदम एक दम तोड़ती अर्थव्यवस्था को कृत्रिम उद्दीपन के सहारे भला-चंगा दिखाने के प्रयत्न हैं।

अगर अर्थव्यवस्था 7% तेजी से बढ़ रही है तो उसे कृत्रिम उद्दीपन की जरूरत क्यों है? इसका एक ही मतलब है कि अर्थव्यवस्था तेजी से नहीं बढ़ रही है। अंतरिम बजट में खुद सरकार ने माना कि वित्तीय वर्ष 2018-19 में उसका वित्तीय घाटा पूर्वानुमान से अधिक 4.4% रहने वाला है। लेकिन अनुमान से बहुत कम बढ़ी प्रत्यक्ष कर वसूली और जीएसटी में अनुमान से 1 लाख करोड़ रुपये की कमी के आंकड़े कहते हैं कि अंतिम हिसाब में यह इससे भी ज्यादा रहने वाला है। यह तो तब है जब सरकार ने बहुत सारा खर्च अपने खाते से छिपाया हुआ है। जैसे राष्ट्रीय खाद्य निगम सरकार के एजेंट के तौर पर किसानों से खाद्यान्न खरीदता है। खरीदारी के वक्त बैंकों से कर्ज लेकर भुगतान करता रहता है, फिर एकमुश्त हिसाब तैयार होने पर सरकार बैंकों को ब्याज सहित मूल चुकता कर देती है। पर पूंजीपतियों को रियायतें देते और उनके मुनाफे बढाने वास्ते भारी अनुत्पादक खर्च (जैसे रफाल!) करने से सरकार की वित्तीय स्थिति इतनी पतली हो चुकी है कि वह यह कर्ज नहीं चुका पा रही और अप्रैल की शुरुआत तक ही एफसीआई के नाम पर एक लाख पच्चानवे हजार करोड़ रुपये का कर्ज खडा है, जबकि रबी फसल की खरीदी शुरू हो गई है और यह रकम और बढने ही वाली है। चुनाव तक तो यह बात लुका छिपा कर रखी जा रही है क्योंकि यह सीधे सरकार की देनदारियों में दर्ज नहीं होती, उधर बैंकों को भी छूट है कि बिना मूल व ब्याज वसूली के भी इसे एनपीए न दिखाया जाये। पर किसी कर्ज को अनिश्चित काल के लिए स्थगित रखने वाली कोई बाजीगरी पूंजीवादी मुनीमों के बस में भी नहीं, और यह देनदारी सरकार के खाते में देर-सबेर दर्ज करनी ही होगी। इसी तरह सार्वजनिक क्षेत्र के कई अन्य संस्थानों, जैसे तेल कंपनियों, की देनदारी सरकार चुकता नहीं कर रही है ताकि वह अपने बजट घाटे को कम करके दिखा सके।

आईएलएफ़एस के डूबने से लेकर अब तक वीडियोकॉन, अनिल अंबानी समूह, जी/एस्सेल, जेट, विद्युत उत्पादन कंपनियों के कई बुरी तरह घाटे में होने की खबरें आती रही हैं और ये सब बैंकों तथा अन्य वित्तीय संस्थानों जैसे म्यूचुअल फंड, बीमा कंपनियों, प्रोविडेंट फंड तथा पेंशन कोषों, आदि से पूंजी बाजार में लिया गया ऋण चुकाने में चूक रही हैं तथा पूंजी बाजार में कई बार लेन-देन के लिए नकदी का संकट खड़ा हो चुका है जिसे चुनाव के पहले सामने आने से रोकने के लिए सरकार रिजर्व बैंक, एसबीआई, एलआईसी, आदि सार्वजनिक वित्तीय संस्थाओं को बाजार में नकदी लाने और इन डूबती कंपनियो न को बचाने के लिए कह चुकी है – जेट का मामला इसका हालिया उदाहरण है। मगर इस सब के बावजूद यह संकट छिप नहीं पा रहा। अभी 10 अप्रैल को पता चला कोटक म्यूचुअल फंड ने अपनी दो सावधि योजनाओं अवधि पूरी होने पर बताया कि आईएलएफ़एस और सुभाष चंद्रा के एसेल में उसका पैसा डूब गया, इसलिए उसने जमाकर्ताओं को जिस लाभ का भरोसा दिया हुआ था, अब वह नहीं दे सकता। उसने कह दिया मूल रकम तो मिल रही है, इतना लो और चलते बनो, नहीं तो आगे इसकी भी गारंटी नहीं! इसी तरह एचडीएफ़सी म्यूचुअल फंड की एक योजना तो भुगतान में पूरी तरह असमर्थ रही और उसने पूरी रकम रोल ओवर कर दी अर्थात जिस अवधि के लिए रकम जमा की गई थी उसके पूरा होने पर उसने बिना जमाकर्ताओं से पूछे उसे फिर उतनी ही अवधि के लिए वापस रख लिया जो भुगतान की चूक को छिपाने के प्रयास के अतिरिक्त कुछ नहीं।

इसी तरह अभी बहुत सारी म्यूचुअल फंड योजनाओं, बीमा पॉलिसियों, पेंशन-पीएफ फंड में बढ़िया कमाई की उम्मीद में पैसा लगाए मँझले तबके वालों को ऐसे और भी झटके लगने वाले हैं क्योंकि इनका बहुत पैसा ऐसी ही और कंपनियों में लगा है जो पूंजीवादी बाजार के संकट की शिकार होकर डूब रही हैं तथा ऋण भुगतान की हालत में नहीं हैं। इसी का नतीजा यस बैंक को मार्च 2019 तिमाही में हुआ डेढ़ हजार करोड़ रु से अधिक का घाटा है। इन झटकों की खास बात यह है कि मीडिया में खबरें दबाकर इन्हें भुलाया नहीं जा सकता; टीवी-अखबार में कहीं खबर आए न आए ये झटके लगते पूरे ज़ोर से हैं! जो पूंजीवाद के आर्थिक संकट के मार्क्सवादी विश्लेषण पर ‘मार्क्सवाद फेल हो गया’ कहकर खिल्ली उड़ाते हैं, उन्हें भी उतने ही ज़ोर से लगते हैं! यह सरकार आर्थिक संकट को रिजर्व बैंक, एसबीआई, एलआईसी, अन्य सार्वजनिक संस्थानों के सहारे कितना ही दबाने-छुपाने का यत्न करे, यह छिपने वाला है नहीं, चुनाव के बाद तो खास तौर पर अपने पूरे विकराल रूप में सामने आएगा।

सवाल है कि यह संकट पैदा ही क्यों हो रहा है? आम तौर पर बुर्जुआ आर्थिक विश्लेषक इसका कारण मुद्रा एवं ऋण के क्षेत्र में ढूंढते हैं और उनका आजकल लगभग सर्वमान्य उपाय बन गया है केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरों को कम कर भारी मात्रा में बाजार में मुद्रा प्रवाह बढ़ा देना। जापान ने 1990 के दशक में यही किया और उस समय से वहाँ ब्याज दरें लगभग शून्य पर हैं। 2001 और फिर 2008 के संकटों में अमेरिका-यूरोप में भी यही तरीका अपनाया गया जब वहाँ के केंद्रीय बैंकों ने भी ब्याज दरों को लगभग शून्य के पास पहुंचा दिया और भारी मुद्रा प्रसार करते हुये कई ट्रिलियन डॉलर/यूरो/पाउंड इस ब्याज दर पर बैंकों को उपलब्ध कराये (1 ट्रिलियन – 10 खरब)। इसे ही क्वांटिटेटिव ईजिंग या मात्रात्मक खुलापन कहा गया। यही नीति अभी मोदी सरकार द्वारा हाल में नियुक्त शक्तिकांत दास के नेतृत्व वाला रिजर्व बैंक भी अपना रहा है। इसके पीछे तर्क है कि बैंकों को कम दर पर नकदी मिलेगी तो वह आगे पूँजीपतियों को कम ब्याज दर पर बड़े ऋण देने के लिए प्रोत्साहित होंगे और कम ब्याज दर पर ऋण मिलने अर्थात सस्ती दर पर पूंजी मिलने से पूंजीपति निवेश करने के लिए प्रोत्साहित होंगे जिससे अर्थव्यवस्था में तेजी आएगी। लेकिन परिणाम क्या हुआ? सस्ती पूंजी की इस विशाल उपलब्धता ने उत्पादन में निवेश के बजाय वित्तीय सट्टेबाजी को बढ़ावा दिया जिससे उत्पादन और मुनाफा दर बढ़े बगैर ही शेयर एवं अन्य वित्तीय बाज़ारों में उफान आ गया जिसे बुर्जुआ अर्थशास्त्री अर्थव्यवस्था में सुधार बताने लगे। पर केंद्रीय बैंक जैसे ही इस विकराल मुद्रा प्रसार को थोड़ा भी संकुचित करना चाहते हैं तो दुनिया भर के बाजारों में चीत्कार आरंभ हो जाता है।

पूंजीवाद में संकट के मूल कारण

स्पष्ट है कि जैसा मार्क्स ने बताया था मुद्रा प्रसार और संकुचन औद्योगिक संकट का कारण नहीं बल्कि परिणाम है। अतः हमें इस संकट के कारणों की खोज भी औद्योगिक उत्पादन के क्षेत्र में ही करनी चाहिए। हम यहाँ मार्क्स द्वारा पूंजीवादी व्यवस्था में निहित संकट के कारणों की चर्चा करते हुए फिर देखेंगे कि भारत की मौजूदा अर्थव्यवस्था के संकट में इनकी क्या भूमिका है।

पूंजीवादी व्यवस्था के पहले जब तक माल उत्पादन व्यक्ति मालिकों द्वारा किया जाता था तो उसका मकसद अपने माल को बेचकर दूसरा माल खरीदना था ताकि उत्पादन करने वाला उपभोग कर सके या अपने उत्पादन को जारी रख सके। इस स्थिति में जरूरी माल उत्पादन के अभाव में स्थानीय प्रकृति के संकट तो होते थे किंतु व्यापक संकट की गुंजाइश नहीं थी क्योंकि आम तौर पर सारा उत्पादित माल बिक जाता था। किंतु जब उत्पादन पूंजीवादी मालिक के हाथ में चला गया तो उत्पादन का मकसद माल बेचकर उपभोग या नए उत्पादन के लिए साधन खरीदना नहीं रह गया और वह अपनी बिक्री से प्राप्त मुद्रा पूंजी को ख़रीदारी में लगाने के लिए मजबूर नहीं रह गया। उधर मजदूर जो उत्पादित माल के मूल्य का एक छोटा हिस्सा ही प्राप्त करता था वह जरूरतों के अपूर्ण रहते हुये भी उत्पादित माल को खरीदने में सक्षम नहीं था। अतः पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था में माल बेचने के बाद दूसरा माल खरीदने का क्रम टूट गया इससे उत्पादित मालों के अनबिके रह जाने की स्थिति पैदा हो गई। यही पूंजीवादी व्यवस्था में संकट का मूल है।

दूसरे, हर पूंजीपति प्रतिद्वंद्विता में दूसरे पूँजीपतियों को पछाड़ने के लिए सस्ते से सस्ते मूल्य पर अधिक से अधिक उत्पादन करना चाहता है। इसके लिए वह कम से कम चर पूंजी अर्थात श्रम शक्ति के प्रयोग से अधिक से अधिक से उत्पादन करना चाहता है। इस हेतु वह चर पूंजी (श्रम शक्ति) की तुलना में अधिक अचर पूंजी (मशीन, तकनीक) का प्रयोग करता है| सभी पूंजीपति इसी तरह अपने उत्पादन को नियोजित करते हैं किंतु इससे पूरी पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था पूर्णतः अनियोजित हो जाती है क्योंकि उत्पादन में तेजी के इस चक्र में एक सीमा के बाद बाजार बिना बिके माल से पट जाते हैं, साथ ही कम श्रम शक्ति के प्रयोग से बेरोजगारी बढ़ने लगती है। जिन पूँजीपतियों का माल अनबिका रह जाता है वे अपने वादों के हिसाब से अपने ऋणों तथा ख़रीदारी का भुगतान करने में असमर्थ हो जाते हैं। आज जब उत्पादन शक्तियाँ उन्नत हैं और उत्पादन और वितरण प्रक्रिया में राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर की अंतर्निर्भरता है तो इससे बाजार में नकदी का संकट खड़ा हो जाता है। इससे बहुत से उद्योग दिवालिया होकर बंद हो जाते हैं।

तीसरे, चर पूंजी या श्रम शक्ति की तुलना में अधिक अचर पूंजी या तकनीक/मशीनों के प्रयोग से पूंजी के जैविक संघटन में जो वृद्धि होती है वह तभी लाभप्रद हो सकती है जब यह बढ़ा हुआ उत्पादन बाजार में पूरी तरह बिकता रहे। अगर बिक्री कम हो जाये और उद्योग को स्थापित क्षमता से कम पर उत्पादन करना पड़े तो लाभ की दर गिरने लगती है। ध्यान रहे यहाँ हम कुल मुनाफे की नहीं बल्कि मुनाफे की दर की बात कर रहे हैं, उदाहरण के तौर पर अगर 100 रु की पूंजी पर 25 रु लाभ हो और पूंजी 200 रु कर देने पर लाभ 40 रु हो तो कुल मुनाफा तो बढ़ा पर मुनाफे की दर 25% से घट कर 20% ही रह गई। मुनाफे की दर घटती जाने से भी पूंजीपति अपने ऋणों को चुकाने में असमर्थ हो जाता है क्योंकि ऋण की किश्त और ब्याज लाभ में से ही चुकाई जाती है, लाभ की दर कम होते जाने से भुगतान की क्षमता भी प्रभावित होती है और बैंक पूंजी के डूबने का खतरा खड़ा हो जाता है।

संकट कैसे पैदा हुआ?

स्वतंत्रता के पश्चात जैसे-जैसे पूंजीपति वर्ग ने सार्वजनिक क्षेत्र की मदद से पूंजी संचयन बढ़ाया एवं कोटा, परमिट, लाइसेंस वाले औद्योगीकरण पर उसकी निर्भरता कम हुई वैसे ही सार्वजनिक बैंकों द्वारा नियंत्रित पूंजी के आबंटन पर भी उसकी निर्भरता कम होती गई। इसके बाद लाई गई नवउदारवादी आर्थिक नीतियों व बढ़ती प्रतिद्वंद्विता के दौर में भारतीय पूँजीपतियों ने भी पूंजी के जैविक संघटन को बढ़ाना शुरू किया। 8 जून 2017 के इकनॉमिक टाइम्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, “उद्योगों के वार्षिक सर्वेक्षण की हालिया रिपोर्ट बताती है कि 80 के दशक कि शुरुआत में जहाँ पूंजी की एक इकाई की लागत (ब्याज व मूल्यह्रास) श्रम शक्ति की एक इकाई से 16 गुना थी, 2015 में वह घटकर 0.6 गुना रह गई। अर्थात श्रम शक्ति के मुक़ाबले पूंजी की लागत कम हुई है और कंपनियों के लिए मजदूरों के स्थान पर पूंजी (अर्थात तकनीक व मशीनों) का प्रयोग लाभकारी हो गया है। पिछले 35 वर्षों में जहाँ रोजगार 1.9% की दर से बढ़ा है वहाँ निवेश की गई पूंजी 14% की चक्रवृद्धि दर से बढ़ी है।“

इससे भारतीय अर्थव्यवस्था में तेजी का एक बड़ा दौर आया – मुनाफे बढ़े, मालों-सम्पत्तियों के दाम चढ़े, शेयर बाजार नई ऊँचाइयाँ छु रहा था और जमीन-मकानों के दाम आसमान पर पहुँचने लगे। किंतु तभी वैश्विक आर्थिक संकट शुरू हो गया। इससे निपटने के लिए कींसवाद से प्रभावित यूपीए सरकार ने बैंक ऋण के बल पर आधारभूत ढांचे में भारी निवेश को बढ़ावा दिया। 2006 से 2011-12 के सालों में इससे जीडीपी में तेज उछाल आया। 2002-03 से 2006-07 में जीडीपी का 5% आधारभूत ढांचे में निवेश किया जाता था, 2012-13 तक वह बढ़कर 8.2% हो गया। इसका मुख्य हिस्सा सार्वजनिक बैंक ऋणों से आया और यही आगे चलकर सबसे अधिक एनपीए बने। 2 मई 2018 की हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, ‘2014 के अंत तक बैंकों के फंसे ऋणों का 44% पूंजी सघन क्षेत्रों में था – खनन, लोहा व इस्पात, आधारभूत ढांचा एवं विमानन; इसमें से भी 30% मात्र आधारभूत ढांचे में था।“

कुछ वक्त तक यह नीति आसन्न संकट को टालने में कामयाब दिखाई दी, पर ज्यादा वक्त नहीं। इसके नतीजे में नई समस्याएँ आ खड़ी हुईं – अचल पूंजी में अधिक निवेश से रोजगार सृजन कम हुआ, बाजार में मांग संकुचित हुई, उद्योगों की स्थापित उत्पादन क्षमता मांग के मुक़ाबले अधिक होने से उन्हें कम क्षमता पर काम करना पड़ा, प्रति इकाई उत्पादन लागत बढ़ गई, निवेशित पूंजी पर प्रति इकाई मुनाफा नीचे जाने लगा, उद्योगों में परिचालन से नकदी कम आने लगी, चालू पूंजी की आवश्यकता बढ्ने लगी, चुकाये जाने वाले ब्याज की मात्रा तेजी से बढ्ने लगी, और संचालन से प्राप्त नकदी से मूल छोड़िए ब्याज चुकाना मुश्किल होने लगा। बैंक ऋण का संकट आसन्न था। रिजर्व बैंक ने इससे निपटने के लिए ऋणों के ‘पुनर्गठन’ का सहारा लिया किंतु मूल समस्या के समाधान के अभाव में इसने बाद में और भी बड़े संकट को जन्म दिया।

बढ़ते पूंजी निवेश से मुनाफा दर कम होने की समस्या 2013-14 में ही सामने आ चुकी थी। 1 फरवरी 2014 के इकनॉमिक टाइम्स में यह रिपोर्ट थी, “2007-08 में 10.7% के शिखर पर पहुँचने के बाद, जीडीपी में कॉर्पोरेट मुनाफे का हिस्सा घटकर 2012-13 में 7.5% ही रह गया। बिक्री के प्रतिशत के तौर पर ब्याज का खर्च सितंबर 2013 में 15% पहुँच चुका था। कंपनियों का ब्याज खर्च तेजी से बढ़ा है और पिछले चर साल में दुगना हो गया है।“ इसी अखबार ने 15 मई 2017 को फिर लिखा, “भारतीय शेयर बाजार में भारी तेजी के बावजूद, भारत में जीडीपी की तुलना में लाभप्रदता का अनुपात घटकर 4.1% के दशक के निम्नतम स्तर पर पहुँच गया है।“ 31 जनवरी 2018 को संसद में प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण ने भी इसकी पुष्टि की है, “भारत में जीडीपी की तुलना में कॉर्पोरेट आय गिरकर 3.5% रह गई है।“
वहीं अति-उत्पादन के दावे की पुष्टि भी कई रिपोर्ट करती हैं। जहाँ सरकार और निजी पूंजीपति रिजर्व बैंक पर लंबे वक्त से ब्याज दरें कम करने और नकदी तरलता बढ़ाने का द्बाव बनाये हुए थे वहाँ रिजर्व बैंक बार-बार अपनी मुद्रा नीति में कहता रहा है कि समस्या मौद्रिक नीति की नहीं बल्कि कुल बाजार मांग के सिकुड़ने की है। रिजर्व बैंक की रिपोर्टें बताती हैं कि 2007 में जहाँ स्थापित उत्पादन क्षमता के 92% का प्रयोग हो रहा था वहाँ अब यह कुछ महीनों में तो 68% तक गिरी है जबकि औसत उपयोग दर 70-72% है। रिजर्व बैंक कि रिपोर्ट यह भी कहती हैं कि कुछ महीनों में तो कोयला एवं विद्युत उत्पादन मांग से अधिक होने के कारण विद्युत उत्पादन के न बिक पाने की समस्या खड़ी हो गई है जिससे विद्युत उत्पादन कंपनियों की आर्थिक स्थित संकटपूर्ण हो गई है। 29 जून 2015 के इकनॉमिक टाइम्स के अनुसार, “बहुत से कारखाने बंद पड़े हैं क्योंकि औसत क्षमता उपयोग गिरता जा रहा है, वित्तीय वर्ष 2011 के 83% से वित्तीय वर्ष 2015 की तीसरी तिमाही में यह 72% ही रह गया। फरवरी-मार्च 2019 में मारुति एवं अन्य वाहन निर्माता कंपनियों द्वारा उत्पादन में कटौती भी इसकी गवाही देती है।

मोदी सरकार की दवा!
बड़े पूँजीपतियों की चहेती मोदी सरकार ने संकट के इस दौर में अपने पृष्ठपोषकों को उससे निकालने की कोशिश की। इसके लिए उसने भारतीय अर्थव्यवस्था में पूंजीवाद के स्वाभाविक नियम से ही जारी पूंजी के संकेंद्रण और संलयन को और भी तेज करने के लिए दवा की दोहरी डोज़ – नोटबंदी तथा जीएसटी – अर्थव्यवस्था को दे डाली। इसने अर्थव्यवस्था में छोटी पूंजी की लागत को बढ़ाकर उसे बड़ी इजारेदार पूंजी के सामने प्रतिद्वंद्विता में कमजोर कर दिया। अखबारों में प्रकाशित फ़रीदाबाद लघु उद्योग एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव चावला का निम्न बयान गौर करने लायक है, “पूरी प्रक्रिया 8 नवंबर 2016 को आरंभ हुई और जीएसटी से और तेज हो गई। कारोबार निरंतर छोटी इकाइयों से बड़ी संगठित इकाइयों के पास गया है। नोटबंदी के बाद बाजार का के बड़ा हिस्सा संगठित कारोबारियों के पास चला गया। बड़ी कंपनियों के पास गया प्रत्येक रुपया किसी लघु या माइक्रो इकाई की कीमत पर गया है।“ रिजर्व बैंक की विभिन्न रिपोर्ट भी इसकी ही पुष्टि करती हैं। किंतु इससे बड़ी संख्या में लघु इकाइयां दिवालिया होकर अपने ऋण का भुगतान नहीं कर पा रहीं और मुद्रा-ऋण संकट को और भी गहन कर रही हैं।

किंतु जैसे हमने ऊपर ही कहा, बड़े उद्योग अधिक अचर पूंजी या तकनीक/मशीनों का प्रयोग करते हैं और तुलनात्मक रूप से कम श्रम शक्ति उपयोग में लाते हैं। अतः पहले जहाँ रोजगार सृजन की दर कम हो रही थी अब अचानक रोजगार विनष्ट होने शुरू हो गए, जिसकी पुष्टि न सिर्फ सीएमआईई के आंकड़े कर रहे हैं बल्कि कूद सरकार के एनएसएसओ सर्वेक्षण के आंकड़े भी जिन्हें सरकार ने सार्वजनिक होने से रोकने की पूरी कोशिश की थी क्योंकि ये बता रहे थे कि बेरोजगारी की दर 45 वर्षों के उचक्तम स्तर पर जा पहुंची है। इनकी चर्चा काफी हुई है इसलिए हम यहाँ इसके विस्तार में नहीं जाएंगे। लेकिन यह कहना जरूरी है कि पूंजीवादी व्यवस्था में श्रम शक्ति भी के माल है जिसके बाजार दाम अर्थात मजदूरी भी मांग और पूर्ति के नियम से तय होते हैं। बढ़ती बेरोजगारी से मांग के अनुपात में पूर्ति बढ़ जाती है और दाम अर्थात मजदूरी गिर जाती है। पिछले सालों में शहरी एवं ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में यह हुआ है जिसकी पुष्टि के लिए बहुत सारे तथ्य सार्वजनिक तौर पर मौजूद हैं। खुद सरकार द्वारा तय मनरेगा मजदूरी में महँगाई दर के मुक़ाबले बहुत कम वृद्धि इसी की पुष्टि करती है। यह दिखाता है कि हालांकि संकट पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में होता है मगर उसका सबसे गंभीर नतीजा मजदूर वर्ग को ही झेलना पड़ता है।

अति-उत्पादन के नतीजे में उद्योगों द्वारा स्थापित उत्पादन क्षमता पर भी काम न कर पाने का ही नतीजा था कि नए निवेश के प्रस्ताव बहुत कम हो गए और पुराने प्रस्ताव ठंडे बस्ते में जाने लगे, रोजगार सृजन बंद हो गया और आर्थिक संकट अपने भयानक रूप में सामने आने लगा व बहुत सारे पूंजीपति दिवालिया होने लगे। खुद मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने 26 अप्रैल को सीएनबीसी टीवी को दिये एक इंटरव्यू में संकट के कारणों की पुष्टि करते हुए कहा कि कम मांग और अधिक उत्पादन क्षमता की वजह से अर्थव्यवस्था ‘धीमी’ पड़ गई है जिससे निजी क्षेत्र नया निवेश नहीं कर रहा है। नए निवेश के प्रस्ताव घट कर 14 साल के निम्नतम स्तर पर हैं, सिर्फ 9.5 लाख करोड़ रु, उसमें भी निजी क्षेत्र के आधे से कम हैं। 2006-07 से 2011-12 के वक्त 25 लाख करोड़ रु सालाना तक नया निवेश हो रहा था, उसमें भी लगभग दो तिहाई निजी निवेश था! इस स्थिति में नए रोजगारों सृजन की बात तो भूल ही जाना होगा, बेरोजगारी जवानों के लिए तो और भी भयंकर होने वाली है। आज के इस आर्थिक संकट का समाधान वर्तमान व्यवस्था में किसी पार्टी के पास संभव नहीं है। चुनाव के बाद सरकार यही करेगी कि पूँजीपतियों को राहत देने के लिए जनता पर बोझ और बढ़ाए – इसके अतिरिक्त कुछ मुमकिन नहीं। अर्थव्यवस्था के संकट और सरकार की विपत्तिजनक वित्तीय स्थिति को चुनाव तक तो किसी तरह ढांपकर रखा जा रहा है पर उसके बाद के लिए योजनाएं अभी से तैयार की जा रही हैं कि कैसे इस सबका बोझ मेहनतकश जनता पर डालकर पूंजीपतियों को राहत दी जायेगी। उसके लिए कई प्रस्ताव अभी से सामने आने लगे हैं, जैसे रेलवे किराये बढ़ाने का प्रस्ताव पहले ही मीडिया में सामने आ चुका है। इसी तरह 22 अप्रैल के नवभारत टाइम्स के अनुसार वित्त मंत्रालय ने सार्वजनिक उपक्रमों को कहा है कि वे अपनी उस सारी संपत्ति की सूची अभी से तैयार कर लें जो तुरंत बेची जा सकती हो, और उसे एक साल के अंदर बेच डालें।

पूंजीवादी ‘कल्याण’, कितना कल्याणकारी?

यहाँ वर्तमान चुनावों में चर्चा का विषय मोदी की किसान मानधन या राहुल गांधी की न्याय योजनाओं पर भी कुछ चर्चा जरूरी है। हम अभी मान लेते हैं कि ये योजनायें पूरी तरह लागू की जायेंगी और इनका लाभ उनको ही मिलेगा जिन्हें बताया गया है। निश्चित रूप से ही जिन्हें कुछ नकदी मिलेगी उन्हें इससे तात्कालिक लाभ भी होगा। लेकिन क्या पूंजीवादी व्यवस्था के संकट से पैदा कंगाली-बदहाली तथा स्वयं पूंजीवादी व्यवस्था के संकट का हल बताई जा रही ये योजनाएं ऐसा कर सकती हैं? पूंजीवादी व्यवस्था का संकट बुर्जुआ अर्थशास्त्रियों के शब्दों में कहें तो ‘सिकुडती मांग’ पर वास्तव में खरीदारी क्षमता से अधिक या अतिउत्पादन का संकट है। यह होड में दूसरे मालिकों को पछाड़कर खुद बडे पूंजीपति बनने के लिए अचल पूंजी या मशीनों-तकनीक के बढते निवेश से कम श्रम शक्ति के प्रयोग से ही अधिकाधिक उत्पादन की प्रक्रिया से पैदा होता है। इसके साथ ही होती है बडी तादाद में छोटे उत्पादकों की बरबादी, उनका श्रमिकों की कतारों में शामिल होना, और पैदा होती है बेरोजगारों की भारी रिजर्व फौज तथा श्रमशक्ति के बाजार दाम में गिरावट। यही आज भारत की स्थिति है – छोटे किसान व अन्य छोटे पैमाने के उत्पादक तबाह बरबाद हो रहे हैं पर अतिउत्पादन के संकट से जूझती पूंजीवादी व्यवस्था में उनके लिए वैकल्पिक रोजगार नहीं हैं, जो हैं वे भी बहुत गिरे मेहनताने पर। क्या न्यूनतम आय के लिए दी जाने वाली मदद इस संकट से निकाल सकती है? कुछ लोगों का कहना है कि इस नकद मदद से बाजार में मांग बढ जायेगी जिससे अतिउत्पादन और बेरोजगारी को दूर करने में सहायता मिलेगी? किंतु ऐसी योजनाएं समस्त संपत्ति को एक अत्यंत छोटे तबके के हाथ में केंद्रित करने वाली पूंजीवादी व्यवस्था की स्वाभाविक गति व चरित्र को नहीं बदल सकतीं। अगर ऐसा हो सकता तो जिन यूरोपीय देशों में ऐसी आय व बेरोजगारी भत्ता आदि ‘कल्याणकारी’ नीतियां पहले से ही मौजूद थीं उनमें वर्तमान आर्थिक संकट पैदा ही न हुआ होता। असल में आय में यह नकद मदद अधिक नया उपभोग पैदा करने के बजाय बस सार्वजनिक उपभोग को निजी उपभोग से प्रतिस्थापित ही करेगी क्योंकि इसके लिए अन्य बहुत से सार्वजनिक खर्च (शिक्षा, स्वास्थ्य, अन्य सार्वजनिक सुविधाओं-कल्याण कार्यक्रमों) में कटौती की जायेगी और इन सार्वजनिक सुविधाओं का निजीकरण और भी तेजी से किया जायेगा। अतः इसका असर अत्यंत सीमित व तात्कालिक ही होगा। जैसे 2008 में लाये नरेगा का असर 2010-11 तक समाप्त हो कर उसने और भी भयानक आर्थिक संकट को जन्म दिया था। इस संकट से जन्मे असंतोष का लाभ उठाकर ही मोदी के नेतृत्व में फासिस्ट संघ जनता को झूठी आशाओं के भ्रमजाल में फंसाकर सत्ता में पहुंच सका था, क्योंकि इस असंतोष को दिशा देने के लिए कोई वास्तविक क्रांतिकारी मजदूर आंदोलन मौजूद नहीं था और संसदीय वामपंथ तो जन असंतोष के विरुद्ध सत्ता का सहयोगी बना हुआ था।

इस बार भी ऐसे वादों के सहारे चाहे कोई विपक्षी गठबंधन मोदी को सत्ता से दूर रखने में कामयाब क्यों न हो जाये पर ये योजनाएं जनता के एक छोटे हिस्से को कुछ तात्कालिक लाभ के बाद और भी गहन आर्थिक संकट तथा तीव्र असंतोष को जन्म देंगी। मजदूर वर्ग की शक्तियां या तो उसे एक वास्तविक परिवर्तनकामी दिशा देने की तैयारी करें अन्यथा अगर वे फिर से मेहनतकश जनता को इन्हीं सुधारवादी कदमों के भ्रम में फंसाने में लगे रहे तो आगे आने वाले जनरोष का फायदा फिर से फासिस्ट शक्तियों को ही होगा।

इसका ही एक दूसरा पहलू यह है कि भारत, और दुनिया, के पूंजीपति वर्ग में दो धाराओं के बीच एक बहस चल रही है, हालांकि दोनों का मकसद एक ही है – पूंजीवादी शोषण की व्यवस्था की हिफाजत करना। तमाम कोशिशों के बावजूद बढ़ते आर्थिक संकट और घटती मुनाफ़ा दर पूंजीपति वर्ग के बड़े हिस्से को फासिस्ट राह अपनाने की ओर बढा चुकी है – वित्तीय पूंजी के धनबल-मीडिया शक्ति आदि से बरबाद होते टटपुंजिया तबके को राष्ट्र, धर्म, जाति, इलाकाई छद्म गौरव की पुनर्स्थापना के बहाने मजदूर वर्ग व दमित राष्ट्रीयताओं, धार्मिक अल्पसंख्यकों, वंचित जातियों-समुदायों के खिलाफ खड़ा कर पूंजीपति वर्ग को मेहनतकश जनता की क्रूर नग्न लूट की छूट देना। किंतु एक हिस्सा यह चेतावनी भी दे रहा है कि मेहनतकश जनता का शोषण अब उस हद तक पहुँच गया है कि उनके लिए विद्रोह ही एकमात्र उपाय बच जाने वाला है क्योंकि मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था में उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा है। अतः यह जरूरी है कि ऐसा कुछ किया जाये कि उनके पास पूंजीवादी व्यवस्था में कुछ खोने लायक होने का भ्रम बना रहे, नहीं तो पूरी पूंजीवादी व्यवस्था के लिए जोखिम खड़ा हो जाएगा। इस हिस्से को मूलतः पूंजीवादी लूट के लिए मजदूर वर्ग पर फासिस्ट हमलों से कोई वैचारिक ऐतराज नहीं है। लेकिन व्यवहारिक तौर पर ये महसूस करते हैं कि पूंजीवादी लूट को बरकरार रखने के लिए फासिस्ट हमले के साथ ही कुछ ‘कल्याणकारी’ भ्रम को बनाए रखना जरूरी है। वारेन बफेट, बिल गेट्स से प्रेमजी जैसे पूंजीपति, पिकेट्टी से रघुराम राजन जैसे बुर्जुआ बुद्धिजीवी, सैंडर्स से कोर्बिन जैसे नेता इसी दूसरे समूह में हैं जो कह रहे हैं कि सबसे कंगाल मजदूरों को कुछ राहत, खैरात, न्यूनतम आय सहायता, जैसे भ्रमों में उलझाए रखना अत्यंत जरूरी है ताकि वे पूरी शोषण की व्यवस्था के खिलाफ ही न उठ खड़े हों। रघुराम राजन अभी 27 मार्च को ही ‘ईटी नाऊ’ पर प्रसारित एक इंटरव्यू में इस पर सीधे प्रश्न का जवाब देते हुए वो पूंजीपति वर्ग के ही दूसरे हिस्से को आश्वासन दे रहे हैं कि वे बस उतनी ही मदद के पक्ष में हैं जिससे मजदूर जिंदा रह कर आगे भी मजदूरी करने लायक रहें, मदद की मात्रा इतनी न हो कि वे मजदूरी करने से हतोत्साहित हो जाएँ, अर्थात यह न्यूनतम मजदूरी से इतना कम रहे कि वे बहुत कम मजदूरी पर भी पूँजीपतियों को अपनी श्रम शक्ति बेचने से रुकें नहीं।

इस तरह हम पाते हैं कि वित्तीय व्यवस्था में वर्तमान संकट पूंजीवादी उत्पादन संबंधों का परिणाम है जो अभी अति-उत्पादन और मुनाफे की गिरती दर के भँवर में फँसा है जिससे उद्योगों की एक बड़ी संख्या वित्तीय संस्थानों से लिए ऋणों के भुगतान लायक नकदी आय अर्जित करने में असमर्थ हो चुकी है और दिवालिया हो रही है। पूंजीवादी व्यवस्था के अंदर इसका एकमात्र तात्कालिक समाधान मौजूदा उत्पादक क्षमता का भारी विनाश और बड़ी तादाद में कारोबारों के दिवालिया होने से पूंजी का अधिक संकेंद्रण एवं सांद्रण ही है, मगर वह भी आगे चलकर और संकटों को जन्म देगा।

(यह लेख समयांतर में प्रकाशित हो चुका है)

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