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रिपोर्ट

पीएम की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य का बयान: अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में

कृष्णकांत

पीएम की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रथिन रॉय ने कहा है कि अर्थव्यवस्था गंभीर संकट की ओर जा रही है। डर है कि भारत मंदी के संकट में फंस जाएगा। सरकार की अलग अलग संस्थाएं डूबती अर्थव्यवस्था पर चिंता जता रही हैं। कंपनियां डूब रही हैं। 70 साल में पहली बार रोजगार का आंकड़ा माइनस में गया है, लेकिन भारत की शहरी युवा पीढ़ी ने अपनी गर्दन रेत में धंसा ली है और मंत्र जप रहे हैं कि आएगा तो मोदी ही।

हालांकि, भारत की पढ़ी लिखी जनता के लिए यह कोई मसला नहीं है। हम सब उसी को मानते हैं जो कोई ताकतवर आदमी कहता है। जैसे मोदी सरकार कहती है कि विदेशों में हमारा डंका बज रहा है। भारत की अधिकांश जनता मान लेती है। जबकि अमेरिका आपको ईरान से तेल न खरीदने का आदेश दे रहा है, मसूद अजहर मामले में आपको गच्चा दिया गया और आतंकवाद, कश्मीर, पुलवामा आदि को मसौदे से हटा दिया गया। अब कोई यह बताए के अगर इन बातों को हटा दिया तो अज़हर पर प्रतिबंध चाहिए क्यों था? इसलिए कि वो मांसाहारी है? आपका एजेंडा चीन और अमेरिका तय कर रहे हैं। नेपाल, भूटान और श्रीलंका जैसे देशों ने आपको घेरने में चीन की मदद की, लेकिन मोदी कहते हैं कि विदेश नीति का डंका बज रहा है और आप मान रहे हैं कि बज रहा है।

आम फ़हम बातचीत में ठीक ठाक शिक्षित लोग मानते हैं कि मोदी ने देश को बहुत ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। वह ऊंचाई क्या है यह किसी को नहीं पता। एक बहुत वरिष्ठ और बहुत जहीन संपादक नोटबन्दी के समय कह रहे थे कि परिणाम पर मत सोचो। हमने कहा कि कश्मीर या नक्सलवाद की समस्या सुलझाने के लिए अगर वहां कत्लेआम करा दिया, बम गिरा दिया तो आप इसे साहस कहकर इसकी तारीफ करेंगे या अपनी ही जनता का संहार करने के लिए इसे एक मूर्खतापूर्ण कृत्य बताएंगे। वे नाराज हुए, हम चुप हुए और बात खत्म हो गई।

हम सदियों से ताकतवर लोगों की गुलामी करने वाले लोग हैं। सवाल करना हमें खुद नहीं पसंद है। ऐतिहासिक बहुमत की सरकार नेहरू और राजीव के भूतों से चुनाव लड़ रही है। नेहरू और राजीव कितने बुरे थे या कितने अच्छे, यह तो दुनिया जानती है। हम यह नहीं पूछना चाहते कि मंच से तीन दर्जन गालियां सुनाने वाला पीएम रोजगार, अर्थव्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य के आंकड़े क्यों नहीं उचार पा रहा।

हम वही समाज हैं जिससे कहा जाता है कि क्रीम लगाओ, गोरे हो जाओगे। हम अपनी शक्ल पर गौर किये बिना बरसों तक क्रीम रगड़ते हैं। यह सहज सवाल जनता का होना चाहिए था कि नेहरू और राजीव तो मर चुके हैं। हम आप जिंदा हैं। हमने उनके बदले आपको चुना था। अब आप बताइए कि आपने क्या किया?

क्या आप ऐसा पूछ सकते हैं? अगर नहीं पूछ सकते तो दशकों पुराने वो अंग्रेजी संदेह अब भी आपका पीछा करेंगे कि आप लोकतंत्र के लिए तैयार नहीं हैं।

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