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रिपोर्ट

भारतीय अर्थव्यवस्था वेंटिलेटर पर, 10 दिनों में विदेशी निवेशकों ने निकाले 11134 करोड़ रूपए

अर्थव्यवस्था के हालात बहुत तेजी से बिगड़ रहे हैं। विदेशी निवेशकों ने एक से नौ अगस्त के बीच भारतीय पूंजी बाजार से 11,134.60 करोड़ रुपये निकाल लिए हैं। इसके पहले जुलाई में विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी मार्केट से 11000 करोड़ रुपये निकाले थे जो पिछले नौ महीने में सबसे ज्यादा थे।

यानी इसका मतलब है विदेशी निवेशक इंडियन मार्केट से दिन दूनी रात चौगुनी की गति से पैसा निकाल रहा है।

पांच जुलाई में बजट आने के बाद से शेयर बाजार की गिरावट का आलम यह है कि उसने एक महीने में गिरने का पिछले 17 साल का रिकार्ड तोड़ दिया है.

सच तो यह है कि अर्थव्यवस्था 2019 के लोकसभा चुनाव होने के 6 महीने पहले से बदहाल पड़ी हुई है लेकिन बड़े बड़े अर्थशास्त्रियों को अब जाकर दिख रहा है। चुनाव से पहले आंकड़ों की बाजीगरी से दिनरात झूठे आंकड़ों दिखाकर हमे भरमाया गया है। चाहे रोजगार के आंकड़े आप देख लीजिए चाहे राजकोषीय घाटे के लेकिन पोल कभी न कभी तो खुल ही जाती है।

मई महीने में निर्यात की विकास दर 3.9 प्रतिशत थी. लेकिन, इस साल जून में निर्यात में (-)9.7 की गिरावट आई है. ये 41 महीनों में सबसे कम निर्यात दर है।

रियल एस्टेट सेक्टर बुरी तरह से पिटा रहा है। बिल्डरों का आकलन है कि इस वक़्त देश के 30 बड़े शहरों में 12.76 लाख मकान बिकने को पड़े हुए हैं. कोच्चि में मकानों की उपलब्धता 80 महीनों के उच्चतम स्तर पर है. वहीं, जयपुर में ये 59 महीनों, लखनऊ में 55 महीनों और चेन्नई में ये 75 महीनों के अधिकतम स्तर पर है।

जून के आंकड़ों के मुताबिक ही देश में वाहनों की बिक्री पिछले 19 साल के न्यूनतम स्तर पर थी. लेकिन, जुलाई में आए आंकड़े और डराने वाले हैं. ऑटो सेक्टर में वाहनों की सेल पिछले 11 महीनों से लगातार गिर रही है लेकिन जब इसकी वजह से प्रोडक्शन बन्द करने की नोबत आ गयी तब जाकर मीडिया की नींद खुली है पानी गले तक आ गया है।

बिगड़ते आर्थिक हालात का लोगों की आमदनी पर सीधा असर पड़ा है. जो FMCG क्षेत्र में साफ दिख रहा है इकॉनमी में खपत कम हो रही है। लोग साबुन-तेल तक खरीदना टाल रहे हैं। मार्केट रिसर्च फर्म नीलसन ने इस बाबत एक रिसर्च किया. इसके मुताबिक फाइनेंशियल ईयर 2019 के पहले तीन महीनों यानी अप्रैल, मई और जून में इस सेक्टर में 10 फीसदी की गिरावट रही. ये गिरावट बीते 9 महीने से देखी जा रही है. नीलसन के मुताबिक, मूल्य वृद्धि या राजस्व जुलाई-सितंबर 2018 में 16.5% से गिरकर इस साल जून तिमाही में गिरकर 10% रह गया। अगर बात पैकिंग वाले उत्पादों की बिक्री की करें तो इसी अवधि में ये आंकड़े 13.4% से गिरकर 6.2% हो रह गए हैं।

कितना लिखें और क्या क्या बताएं, आप लोगो को! हर सेक्टर पिटा रहा है!

सबसे बड़ी बात जो अब अर्थशास्त्री बोलने का साहस कर पाए हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की यह मंदी चक्रीय नही नहीं बल्कि ढांचागत है यानी साधारण उपायों से काम नहीं चलने वाला है।

और ऐसी स्थिति में पिछले कई दशकों में ऐसा पहली बार हुआ है कि जब वित्त मंत्रालय में ऐसा कोई आईएएस अधिकारी नहीं है, जिसके पास अर्थशास्त्र में पीएचडी की डिग्री हो. और जो अर्थव्यवस्था की बढ़ती चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार को नीतियां बनाने में मदद कर सके. यह है सरकार की तैयारी.

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