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दुनिया में केवल दो ही वर्ग हैं: ‘शोषक और शोषित’, तय आपको करना है आप किसमें फिट बैठते हैं

ये कोई आज की बात नहीं है. वर्ग संघर्ष सदियों से चला आ रहा है. लोगों ने समय-समय पर इसके ख़िलाफ़ आवाज़ भी बुलंद की है. पर आज सूरत ये है कि हमें ख़ुद ही नहीं पता कि हम किस ओर हैं. अग़र आप थोड़ी देर को अपने काम के बारे में सोचे तो पाएंगे कि या तो आप शोषक की भूमिका निभा रहे हैं या ख़ुद आपका ही शोषण हो रहा होगा.

इन दो वर्गों के बीच संतुलन बनाने को आए दिन मज़दूर और किसान वर्ग के लोग आंदोलन करते रहते हैं. मग़र अफ़सोस कि पूंजीवादी ताकतों की चालाक और कुटिल बुद्धि के आगे इनको कमज़ोर बनाने की हर संभव कोशिशें की जाती रहती हैं.

जगह-जगह ट्रेड यूनियनों को ख़त्म किया जा रहा है, निजीकरण की मार पड़ने से तो इन आंदोलनों को और भी ज़्यादा नुकसान पहुंचा है. विरोध की आवाज़ों को डर से दबाने का चलन बढ़ता ही जा रहा है. डर- नौकरी का, भुखमरी का, पैसों का, जान का, परिवार के पालन-पोषण का. इस डर से हर कोई चुपचाप अपना शोषण करवाने को मजबूर होता जा रहा है.

ऐसे में भी गिरते-पड़ते चाहे जैसे, अपना सब कुछ दांव पर लगा कर लोग सड़कों पर विरोध जताने को उतरते हैं. हाल ही की बात करें तो चाहे दिल्ली में देश भर के किसानों का जुटना हो या गुरुग्राम-गाज़ियाबाद में कारखानों के श्रमिकों का आंदोलन, गाहे-बगाहे विरोध की आवाज़ें उठती रहती हैं मग़र इन सबमें सबसे अफ़सोस जनक बात ये रहती है कि समाज के दूसरे तबके के लोग इनके साथ नहीं खड़े होते हैं. होते भी हैं तो बहुत थोड़े से.

देश भर में किसान और मज़दूर परेशान हैं. उनकी परेशानी भी लोग जानते हैं और उनकी मांगे क्या हैं ये भी. इन सबके बावजूद दुख और हैरानी तब होती है जब खुद को पढ़ा-लिखा और समझदार मानने वाले लोग भी इन्हें गलत ठहराते हैं.

इनमें कुछ तो सरकार के चमचे रहते हैं और कुछ बिन पेंदी के लोटे. “ये मांग गलत है-ये मांग नाजायज़ है, सरकार से जितना बन पड़ रहा है, कर तो रही है”….इनके मुंह से ऐसी बातें सुनाई देंगी आपको.

अरे भाई, अब क्या ही कहें. जायज़ और नाजायज़ का फैसला करते कैसे हो आप. हर जायज़ मांग शुरुआत में नामुमकिन करार दे कर ही खारिज की जाती है. ये आप पर है, कि आप कब तक उस मांग पर अड़े रहते हैं.

क्रांतिकारी ‘चे ग्वेरा’ के शब्दों में कहे तो “Demand the impossible”. मतलब जो असम्भव है, उसी की मांग करो. इसका मतलब ये भी नहीं कि आसमान से तारे तोड़ने को कहा जाए. लेकिन अगर कोई किसान, मज़दूर चाहता है कि उसकी मेहनत का ठीक-ठाक उसे दाम मिले, उसके बच्चे अच्छी शिक्षा हासिल कर सकें, परिवार को दो वक़्त का खाना नसीब हो जाए, बुढ़ापे के लिए कुछ पेंशन मिल सके और जीवन चैन से कट सके तो इसमे हर्ज़ ही क्या है?

सभी आंदोलन शुरुआत में, सही-गलत मांगो का हवाला देकर दबाए जाते हैं. मांग उठाने वालों को एहसास दिलाया जाता है कि, भाईसाहब आपकी मांग गलत है…ये हमारे हाथ में नहीं है. मगर आखिर में जब मांगे मान ली जाती हैं तो इतिहास उसे सही साबित करता है.

अब उदाहरण के लिए काम के घंटों का तय होना या रविवार की छुट्टी को ही लीजिये. आज की ही तरह उस दौर में भी इन जैसी तमाम मांगों को नामुमकिन करार दे कर टाला जाता रहा था. लेकिन आज दुनिया जानती है कि हमें और आपको ऐसे नियमों के बनने का कितना फ़ायदा हुआ है. जो लोग पानी पी-पीकर हक़ की लड़ाई लड़ने वालों को झूठा और दोगला बताते हैं, वो ये भूल जाते हैं कि जिस छुट्टी का वे हफ़्ते भर इंतेज़ार करते हैं दरअसल वो भी किसी ने लड़ कर हासिल की थी.

समस्या ये है कि हम अपने को मज़दूर नहीं मानते हैं. हाथ में फावड़ा या बेलचा हो चाहे कलम और की-बोर्ड, हम सब मज़दूर ही हैं.
80 के दशक में सईद अख़्तर मिर्ज़ा निर्देशित एक हिंदी फ़िल्म आई थी, “अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यूं आता है”.

नसीरुद्दीन शाह अभिनीत इस फ़िल्म में दिखाया गया है कि कैसे हम अपने अंदर के मज़दूर को भूल जाते हैं. मालिक के ज़रा सा हंस-बोल देने से हमे ऐसा लगने लगता है कि हम भी उसके बराबर के हैं. अपने साथ के मज़दूरों से ही हम कन्नी काटने लगते हैं. मगर आख़िर में सच्चाई समझ आते ही हमें उन्हीं मज़दूरों के साथ खड़ा होना पड़ता है.

कार्ल मार्क्स ने-‘ दुनिया के मज़दूरों एक हो’ का नारा ज़माने पहले दिया था. मगर आज तक दुनिया के मज़दूर एक ना हो सके. क्यूं…क्यूंकि मज़दूरों को पता ही नहीं है कि वो मज़दूर हैं.

दुनिया का दस्तूर है साथियों, बिना लड़े कुछ हासिल नहीं होता है. सर झुका कर सलाम करते रहना, ख़ुद को धोखा देना है. हम लड़ते हैं, अपने आज के लिए नहीं बल्कि आने वाली नस्लों के लिए. आज आप जिन सुविधाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं, वो भी किसी की लड़ाई और क़ुर्बानी का ही नतीजा है. इतिहास आपको सम्मान की नज़रों से देखे इसके लिए बेहद ज़रूरी है कि सही और ग़लत का फर्क समझ कर, ग़लत के लिए आवाज़ बुलंद करें. ना बुलंद कर सकें तो कम-से-कम जो कर रहे हैं उनको ग़लत तो न ही ठहराएं.

नीचे, 1880 में लिखे गए रूसी साम्यवादी विचारक Peter Kropotkin के “An Appeal to the Young” लेख का एक अंश. श्रमजीवी आंदोलनों में समाज के युवाओं की क्या भूमिका होनी चाहिए ये उसपर है-

तुम देखोगे कि हर जगह- इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका आदि देशों में जहां कहीं भी विशेष अधिकार-सम्पन्न और अत्याचार-पीड़ित लोगों के दो अलग-अलग दल मौजूद हैं, वहीं श्रमजीवियों में एक ज़ोरदार आंदोलन पैदा हो रहा है.

इस आंदोलन का उद्देश्य सम्पत्तिशाली दल की चलाई हुई ग़ुलामी को सदा के लिए नष्ट कर देना और न्याय तथा समानता के आधार पर एक नए समाज की नींव डालना है.

अब जन समूह का काम केवल अपनी शिकायतों के कह देने से नहीं चल सकता. उन दुख भरे गीतों के गाने से उनको संतोष नहीं मिल सकता, जिनको पुराने ज़माने के निरंकुश राजाओं के नीचे दबे हुए किसान गाया करते थे.

अब लोग अपने परिश्रम का पूरा मूल्य समझते हुए काम करते हैं, यद्यपि उनके अधिकार के रास्ते में एक नहीं अनेक बाधाएं मौजूद हैं.
वे सदा इसी बात पर ग़ौर किया करते हैं कि ऐसा क्या उपाय किया जाए जिससे दुनिया में सबका जीवन सुखमय हो जाए. बजाय वर्तमान अवस्था के, जिसमें तीन-चौथाई मनुष्य-जाति का जीवन शापग्रस्त या दैवी-कोप से पीड़ित के समान हो रहा है, वे समाज शास्त्र की कठिन समस्याओं पर विचार करते हैं और अपने निर्मल स्वाभाविक ज्ञान, अपने निरीक्षण और अपने दुखमय अनुभव से उनको हल करने का यत्न करते हैं.

अपने ही समान दुर्दशाग्रस्त दूसरे साथियों का सहयोग प्राप्त करने के लिए वे अपना दल बनाते हैं और अपने को संगठित करने की कोशिश करते हैं. वे संस्थाएं बनाते हैं, जिनका काम थोड़े से चंदे द्वारा कठिनाई के साथ चलता है. वे दूसरे देशों में रहने वाले अपने हम-पेशा भाइयों के साथ संबंध जोड़ते हैं, और इस प्रकार इस दिन को नज़दीक लाने में, जब विभिन्न राष्ट्रों में युद्धों का होना असंभव हो जाएगा, वे शोर मचाने वाले और मौखिक सहानुभूति प्रकट करने वाले परोपकारी सुधारकों की अपेक्षा बहुत अधिक काम कर दिखाते हैं.

इस बात का पता रखने के लिए कि हमारे दूसरे भाई क्या कर रहे हैं, उनके साथ अपना परिचय बढ़ाने के लिए, अपने विचार की वृद्धि और प्रचार के लिए, वे मज़दूरों के अख़बार निकालते हैं और इसके लिए उनको ना जाने कितनी-कितनी कोशिशें करनी पड़ती हैं.

यह कैसा कभी ना रुकने वाला संग्राम है!
कितनी ही बार थक जाने, प्रतिज्ञा भ्रष्ट हो जाने, अत्याचार का शिकार बन जाने के कारण कार्यकर्तागण कार्यक्षेत्र से हट जाते हैं और उनकी जगह नए कार्यकर्ताओं का प्रबंध करना पड़ता है. कभी तोपों और बंदूकों की गोलियों से नेताओं का ख़ात्मा हो जाता है और तमाम संगठन नए सिरे से करना पड़ता है. कभी भीषण हत्याकांड के फल से सारा काम ही चौपट हो जाता है और फिर नए ढ़ंग से आंदोलन शुरू किया जाता है. इन सब कारणों से काम को बार-बार आरम्भ करने से ना जाने कितनी शक्ति व्यर्थ होती रहती है.

श्रमजीवियों के अख़बार उन लोगों द्वारा संचालित किए जाते हैं, जिन्होंने अपने को आहार और निद्रा से वंचित करके थोड़ा-बहुत ज्ञान ज़बरदस्ती प्राप्त कर लिया है.

उनके आंदोलनों का आधार ग़रीब मज़दूरों से कौड़ी-कौड़ी करके इकट्ठा किया हुआ वह धन है जिसे वे जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकताओं को त्याग कर और प्रायः सूखी रोटी पर बसर करके बचाते हैं. इन सब कामों को करने के साथ-साथ उनको सदा इस बात का भय बना रहता है कि जब कभी उनके मालिकों को इस बात का पता लग जाएगा कि उनका मज़दूर-उनका ग़ुलाम, साम्यवादी हो गया है, उसी दिन से उनके कुटुम्ब को भूखों मरना पड़ेगा.

ये बातें हैं जो तुमको दिखलाई पड़ेंगी, अगर तुम जन-समूह के भीतर जाओ. इस कभी ना ख़त्म होने वाले संग्राम में ग़रीब मज़दूर कठिनाइयों के बोझ के नीचे पिसता हुआ इस प्रकार के उद्गार प्रकट करने लगता है-

“कहां हैं वे नवयुवक जो हमारे पैसे से शिक्षित बने थे ? जिनके लिए हमने, जब वे अध्ययन कर रहे थे, वस्त्र और भोजन जुटाया था !
जिनके लिए हमने अपनी झुकी हुई पीठ पर भारी बोझ उठाकर और ख़ाली पेट रहकर इन मकानों को, इन विद्यालयों को, इन अजायबघरों को तैयार किया था!

जिनके लिए अपना ख़ून सुखाकर इन बढ़ियां किताबों को छापा, जिनको हम पढ़ तक नहीं सकते!

कहां हैं वे प्रोफ़ेसर, जो मनुष्य-समाज के विज्ञान को जानने का दावा करते हैं, पर जिनकी निगाह में एक दुष्प्राप्य कीड़े का मूल्य, मनुष्य से बढ़कर है?

कहां हैं वे लोग, जो स्वाधीनता का प्रचार करते फिरते हैं पर जो कभी हमारे जैसे प्रति-दिन पैरों तले कुचले जानेवाले लोगों की सहायता को खड़े तक नहीं होते?

ये लेखक, ये कवि, ये चित्रकार- सभी ढ़ोंगी हैं. ये वैसे तो आंखों में आंसू भरकर सर्व-साधारण की दुर्दशा का वर्णन करते फिरते हैं, पर इतने पर भी कभी हम लोगों के पास आकर हमारे काम में मदद नहीं करते.”

इन शिक्षित कहलाने वाले लोगों में से कुछ लोग कायरतापूर्ण उदासीनता का भाव रखकर संतोषपूर्वक सुख भोगते रहते हैं, और शेष बहुसंख्यक लोग इन श्रमजीवियों को हुल्लड़बाज कहकर इनसे नफ़रत करते हैं और अगर कभी ये उनके विशेष अधिकारों पर हमला करना चाहें तो इनपर झपटने को सदा तैयार रहते हैं.

(ऊपर लिखी इन बातों को पढ़ने के बाद याद करने की कोशिश करें कि बीते एक साल के दौरान हुए आंदोलनों में आपने क्या भूमिका निभाई… शारीरिक ना सही मानसिक रूप से ही सही, किस ओर खड़े हुए आप?)

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