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भारतीय मध्य वर्ग और युद्धोन्मादी अंधराष्ट्रवाद के बारे में कुछ स्फुट विचारणीय बातें …

अंधराष्ट्रवादी युद्धोन्माद की लहर हिन्दी पट्टी में, यानी उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, बिहार, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा में ही सर्वाधिक तूफ़ानी बनकर बहती है। दक्षिण के राज्यों में इसका प्रभाव सबसे कम दिखाई देता है। उनमें भी केरल में सबसे कम होता है और कर्नाटक के कुछ खित्तों में थोड़ा ज्यादा है। महाराष्ट्र की मेहनतक़श आबादी में तो नहीं पर मध्य वर्ग के उग्र हिंदुत्ववादियों में यह लहर मौजूद है, हालाँकि वहाँ मध्य वर्ग का तर्कशील और सेकुलर हिस्सा भी मज़बूत है। बंगाल, ओडिशा और असम में लाख कोशिशों के बावजूद युद्धोन्माद की लहर कभी उतनी मज़बूत नहीं हो पाती और उत्तर-पूर्व के अन्य राज्यों में तो यह है ही नहीं।

इस फ़र्क़ के कारण ऐतिहासिक हैं। यह हिन्दी पट्टी ही है, जहाँ का पढ़ा-लिखा मध्य वर्ग भी परले दर्जे का कूपमंडूक, पुरातनपंथी और जाति-धर्म के बंधनों में जकड़ा हुआ है। मध्य काल और औपनिवेशिक काल के धर्म-सुधार आन्दोलन और सामाजिक सुधार आन्दोलन यहाँ के समाज की अन्तश्चेतना में गहराई तक पैठ नहीं पाए, जल्दी ही वे भटक गए या ठहराव-ग्रस्त हो गए, और यह भी एक सच है कि प्रायः उनका चरित्र अपेक्षतया कम रेडिकल था। एक और भी तथ्य यह है कि इस इलाके में ‘रिफोर्मेशन’ के बरक्स ‘काउंटर-रिफोर्मेशन’ की धारा हमेशा मज़बूत रूप में खड़ी रही। मध्यकालीन निर्गुण भक्ति आन्दोलन के बरक्स सगुण भक्ति की धारा की शक्तिशाली मौजूदगी इसका बस एक उदाहरण है जिसके शिखर-पुरुष तुलसी थे। इस हिन्दी पट्टी के बड़े हिस्से में ज़मींदारी व्यवस्था के अंतर्गत सर्वाधिक सामंती उत्पीड़न था और ज्यादातर इन्हीं सामंती (सवर्ण) उत्पीड़कों के भीतर से इस इलाके का आधुनिक मध्य वर्ग विकसित हुआ जिसकी चेतना में आधुनिकता के संघटक तत्व बहुत ही कम थे। आज़ादी के बाद इस इलाके में सामंती भूमि-सम्बन्ध सबसे मद्धम गति से टूटे और पुराने सामंती वर्गों से जो नया मध्य वर्ग विकसित हुआ वह विचारों और जीवन में निहायत प्रतिक्रियावादी था। हिन्दी पट्टी में बड़े-बड़े महानगरों का विकास हुआ, पर हिन्दी पट्टी का जो मध्य वर्ग यहाँ का निवासी बना, वह अपने पारिवारिक-सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में ग्रामीण जीवन की बर्बरताओं और रूढ़ियों से मुक्त नहीं था। आश्चर्य नहीं कि इन महानगरों में आप को ऐसे कथित मार्क्सवादी बुद्धिजीवी मिल जायेंगे, जो जड़ों से जुड़ने के नाम पर ग्रामीण जीवन के अनालोचनात्मक प्रशंसक होंगे और उनकी चेतना लोकवाद या नरोदवाद से आगे की नहीं होगी। आश्चर्य नहीं कि मार्क्सवादी हिन्दी आलोचना के दो शिखर-पुरुषों में से एक, रामविलास शर्मा की आत्मा हमेशा “अतीतआकुल” और “भारतव्याकुल” रहा करती थी और दूसरे, यानी नामवर सिंह को हिंदुत्ववादी फासिस्ट नेताओं और बुद्धिजीवियों के साथ गलबहियाँ करने में तथा खुले मंचों से अपने सवर्ण पूर्वाग्रहों को प्रकट करने में कोई हिचक नहीं होती थी। एक तरफ सेक्युलर और सुसंस्कृत और दूसरी ओर हिन्दू धर्म के प्राचीन गौरव का महिमा-मंडन करते हुए सती-प्रथा के समर्थन तक चले जाने वाले यशस्वी पत्रकार प्रभाष जोशी हिन्दी पट्टी की ही पैदावार हो सकते थे। जो मध्यवर्गीय नागरिक जितना ही रूढ़िवादी होगा, अतार्किक होगा, जाति-धर्म के बंधनों में जकड़ा होगा, युद्धोन्मादी अंधराष्ट्रवाद का ज़हर उसके ऊपर उतना ही अधिक प्रभावी होगा। वैसे तो इस वर्ग की आम प्रकृति ही ऐसी है कि यह अंधराष्ट्रवाद की चपेट में आ जाता है। भूलना नहीं चाहिए कि फासिज्म तृणमूल स्तर से संगठित, इसी मध्य वर्ग का धुर-प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन होता है और अंधराष्ट्रवाद फासिज्म का सबसे प्रभावी और आज़मूदा हथियार होता है।

अंधराष्ट्रवाद हालाँकि मेहनतक़श आबादी के एक हिस्से की चेतना की ऊपरी परत पर भी कालिख की तरह छा जाता है, पर मध्य वर्ग की चेतना की पोर-पोर में यह ज़हर की तरह भिन जाता है। चूँकि यह मध्य वर्ग ही सोसायटी का ‘वोकल सेक्शन’ होता है और इसी के बीच अपने मार्किट का फैलाव होने के कारण न्यूज़ चैनल और अखबार भी अपनी सामग्री और भाषा इसी के मिजाज़ के हिसाब से तैयार करते हैं, तथा सोशल मीडिया पर भी यही वर्ग छाया रहता है, इसलिए परिदृश्य कुछ ऐसा दिखाई देता है मानो पूरे देश की जनता के सर पर उन्माद का भूत चढ़कर बोल रहा है। आप किसी मज़दूर बस्ती में जाइए तो वहाँ भी आपको आज जैसे माहौल में “पाकिस्तान को नेस्तनाबूद कर दो” और “गद्दारों को भूनकर खा जाओ” टाइप देशभक्ति की भावना प्रथमदृष्टया दिखाई देगी, लेकिन जैसे ही आप इस उन्मादी देशभक्ति के बुनियादी कारणों पर बात करेंगे, लोगों की ज़िंदगी की परेशानियों और उनके कारणों पर बात करेंगे, 95 फीसदी लोग आपकी बातें सुनने लगते हैं और सहमत भी होने लगते हैं। इस आबादी का बहुलांश आज भी समझ रहा है कि युद्ध का यह माहौल संघियों ने और उनकी सरकार ने आम जनता का ध्यान बुनियादी सवालों से भटकाने के लिए बनाया है। अगर खुद समझ नहीं रहा है तो कम से कम समझाने पर आसानी से समझ जाता है।

जो सोशल डेमोक्रेट, बुर्जुआ लिबरल और संसदीय जड़वामन वामपंथी होते हैं, वे आम मेहनतक़श आबादी की ज़िंदगी से बहुत दूर हो जाते हैं और मध्य वर्ग तथा सफ़ेदपोश-कुलीन मज़दूरों तक सिमट जाते हैं। इसीलिये उन्हें लगता है कि युद्धोन्मादी अंधराष्ट्रवाद की लहर समाज के पोर-पोर में भीतर तक धँसी हुई है और उसके विरोध में वे आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। दूसरी बात यह कि, छद्म-वामपंथियों की चेतना स्वयं ही बुर्जुआ राष्ट्रवाद के जीवाणुओं-विषाणुओं से संक्रमित होती है, इसलिए वे युद्धोन्मादी “देशभक्ति” का कारगर विरोध कर ही नहीं सकते।

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