लोकवाणी

मुख़्तलिफ़ आवाज़, निगाह और विचार

राजनीति

नजरिया: साहब कांशीराम की बहुजन चेतना का विकास करना क्यों जरूरी है?

खुशबू शर्मा

भारत में सत्ता को केंद्रीकरण कर, तानाशाही स्थापित करना बहुत मुश्किल बात नहीं है। भारतीय समाज धर्म और जाति के नाम पर इस कदर बँटा हुआ है कि लोग चाहे अपने साथ होने वाला अन्याय सहन कर लेंगे लेकिन दूसरे धर्म और जाति से आने वाले भारतीय के साथ एक प्लेन पर आकर लड़ना उन्हें मंजूर नहीं। ब्राह्मण को दलित के साथ, हिंदू को मुसलमान के साथ और पुरूष को महिला के साथ एक ही पंक्ति में, बराबर खड़ा होना कहाँ बर्दाश्त होगा। यह सामाजिक संरचनाऐं भारतीयों के पैरों की बेड़ियाँ हैं, जो उन्हें कभी नाकारा सरकारों के खिलाफ एकजुट होने की इजाजत नहीं देंगी। राजनीतिक ‘क्रांति’, ‘रेवल्यूशन’ के विचार को जमीनाम पर साकार करने के रास्ते में भारतीयों की सामाजिक रूप से कम्पार्टमेंटलाइज़ होने की प्रवृत्ति सबसे बड़ी बाधा है। समाज में भिन्नता होना अच्छा होता है लेकिन सामाजिक वर्गों के बीच गैर बराबरी, नफरत और द्वेष होना सौहार्द के लिए दीमक का काम करता है। 

यह सच है कि भाषा, धर्म, जाति, रंग की भिन्नता होते हुए भी हम एक देश बनने में कामयाब रहे हैं, लेकिन निश्चित रूप से हम एक समाज बनने में असफल रहे हैं। हमारा एक समाज के रूप में कोई एक साझा उद्देश्य नहीं है, ना ही हमें आपस में लगाव है। बदलाव एकजुटता की मांग करता है, आंदोलन तब सफल होते हैं जब उनमें शरीक होने वाला हर एक आदमी अपने निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर बड़े परिप्रेक्ष्य में चीजों को देखता है। भारतीय गरीबी और बेरोजगारी में रहना स्वीकार कर लेंगे लेकिन किसी दूसरे धर्म और जाति के लोगों के साथ खड़े होना और एक स्वर में आवाज़ उठाना उन्हें कभी मंजूर नहीं होगा। सत्ता में बैठे लोग इस बात को बहुत अच्छे से जानते हैं, इसीलिए वे हर संभव कोशिश करते हैं कि ये वाटर टाइट कंपार्टमेंट ना सिर्फ बने रहें बल्कि आपस में एक दूसरे को लेकर संदेह की स्थिति में रहें। सत्ता लगातार विभिन्न वर्गों के बीच अविश्वास पैदा करने का काम करती है जिससे बड़े जनआंदोलन की संभावना ख़त्म हो जाए।

भारतीय जन को अंधविश्वास में बहुत विश्वास है। उनके लिए यह मानना बहुत मुश्किल है कि उनकी गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी का कारण उनकी किस्मत नहीं है, बल्कि सरकार है। नौकरी पाने के लिए वे तंत्र-मंत्र, झाड-फूंक और यज्ञ-हवन करवाने में लगे रहते हैं, और आजीवन इसी भ्रम में जीते हैं कि कभी उनके राहु-केतु सही अवस्था में पहुँच जाएँगे, जिससे उनका जीवन बेहतर हो जाएगा। लोगों की सोच में दूर दूर तक यह बात नहीं होती, ना ही इस बात की समझ होती है कि सरकार का पहला काम जनता को अच्छा जीवन जीने के लिए अनिवार्य सभी परिस्थितियाँ उपलब्ध करना है। पूरा जीवन एक भारतीय अपने आप और अपनी किस्मत को कोसने में लगा देता है, लेकिन कभी सत्ता से सवाल नहीं करता। सरकार को नाकारा बनाने में मध्यमवर्ग का सबसे ज्यादा हाथ होता है। संख्या में सबसे ज्यादा और जिम्मेदारी सबसे कम। यह वर्ग सबसे ज्यादा अंधविश्वासी, स्वार्थी और अनभिज्ञ होता है। फुटपाथ पर बैठे भिखारी को दस रूपए देकर अपने सारे सामाजिक और राजनीतिक दायित्वों से निवृत हो जाता है। निचले तबके से घृणा करने वाला और पूँजीपति वर्ग को सराहने वाला यह वर्ग किसी भी आंदोलन या राजनीतिक गतिविधि (वोट डालने को छोड़कर) से कोई वास्ता नहीं रखता। अपनी नई पीढ़ी को राजनीति से दूर रहने की सलाह देने वाले इस वर्ग को अपने सामाजिक और राजनैतिक दायित्वों का कोई भान नहीं है। राजनीति इनके लिए हराम है, आंदोलनों और हड़ताल रोजमर्रा की खुशनुमा जिंदगी में बाधा हैं। शिक्षा इनके लिए सरकारी नौकरी या मोटे पैकेज वाली प्राइवेट नौकरी हासिल करने का ज़रिया है। ये तबका बदलाव के नाम से ही कांपने लगता है। यह यथास्थितिवाद का समर्थक है और इसीलिए सत्ता का सबसे प्रिय तबका भी यही होता है जिसे आसानी से बेवकूफ बनाकर अपना उल्लू सीधा किया जा सकता है।

ऐसे में अगर देश की शोषक और दमनकारी व्यवस्था को कोई चुनौती दे सकता है तो वह सिर्फ एक मजबूत बहुजन आंदोलन है बशर्ते ओबीसी तबके को अपनी वास्तविक स्थिति का ज्ञान हो। पिछले कुछ समय में यह देखा गया है कि दलित और आदिवासी चेतना में सुधार हुआ है और दोनों ही वर्गों ने अपने अंदरूनी विषमताओं को एक तरफ रखकर, एकजुट होकर बड़े आंदोलन खड़े किए हैं, फिर चाहे वह 5 अप्रैल का भारत बंद हो या विश्वविद्यालयों में रोस्टर की लड़ाई। इसी चेतना का नतीजा है कि ऐसी मनुवादी सरकार को मनुवाद के सबसे बड़े दुश्मन अंबेडकर का नाम जपना पड़ रहा है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि ओ.बी.सी. तबके का एक बड़ा हिस्सा आज भी मनुवादियों का समर्थक है। सामाजिक न्याय और फूले- अंबेडकरवादी चेतना से मरहूम यह तबका शोषक और शोषित दोनों की भूमिका निभा रहा है। गौरतलब है कि ओ.बी.सी. देश की पूरी जनसंख्या का पचास प्रतिशत से अधिक है और दलित और आदिवासी तबके की तुलना में कुछ हद तक आर्थिक रूप से सशक्त भी। दिलचस्प यह भी है कि सवर्णों को छोड़कर बाकि वर्ग न  सिर्फ जातिगत, बल्कि आर्थिक रूप से भी शोषित है। यानी सामाजिक और आर्थिक आधार पर शोषित होने वाला तबका एक ही है। ऐसे में साहब कांशीराम की बहुजन चेतना का विकास कर ही शोषितों को एकजुट किया जा सकता है। अन्य पिछड़ा वर्ग को यह समझने की जरूरत है कि जातिगत हाइरार्की और आर्थिक व्यवस्था में वे भी ठके गए हैं। उन्हें दलित, आदिवासी, गरीब और शोषित तबके के पाले में खड़ा होना है ना कि सत्ता पर कब्जा जमाए बैठे पूँजीवादी सवर्ण शोषकों की तरफ। बहुजन आंदोलन ना सिर्फ सरकारों को चुनौती देने मे सक्षम है, बल्कि सत्ता के जातिवादी और पूँजीवादी स्वरूप में भी आमूलचूल परिवर्तन करने का माद्दा रखता है।

(लेखिका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली की छात्रा हैं)

LEAVE A RESPONSE

Your email address will not be published. Required fields are marked *