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रिपोर्ट

रेलवे का निजीकरण शुरू, मुनाफे के बावजूद रायबरेली के रेल कारखाने को सबसे पहले बेचेगी सरकार

गिरीश मालवीय

‘‘जो निगमीकरण का असली मायने नहीं जानते, उन्हें मैं बताना चाहती हूं कि यह दरअसल निजीकरण की शुरुआत है. यह देश की बहुमूल्य संपत्तियों को निजी क्षेत्र के चंद हाथों को कौड़ियों के दाम पर बेचने की प्रक्रिया है.” ….. ‘इससे हजारों लोग बेरोजगार हो जाते हैं’

कल लोकसभा में यह कथन रायबरेली के मॉडर्न कोच कारखाने के संदर्भ में सोनिया गाँधी ने कहा है. आज यह खबर किसी भी बड़े अखबार में किसी न्यूज़ चैनलों की हेडलाइन में कही भी नहीं है। यह बिके हुए गोदी मीडिया की ताकत है कि दिल्ली में एक पार्किंग विवाद के कारण से सड़क किनारे बने एक छोटे से मंदिर की तोड़फोड़ पर राष्ट्रीय बहस चलाई जा सकती है लेकिन वही एक आदेश से जहाँ लाखों लोगों की नोकरी खतरे में हो उस पर कोई चर्चा नहीं की जा सकती?

रेल मंत्रालय ने एक 100 दिन का एक्शन प्लान तैयार किया है। उसमें जिन कारखानों को चिह्नित किया गया है, उनमें सबसे पहला नाम रायबरेली के लालगंज में स्थित आधुनिक रेल डिब्बा कारखाने का है।

सोनिया गांधी ने कहा कि रेलवे के माडर्न कोच कारखाने में आज बुनियादी क्षमता से ज्यादा उत्पादन होता है. यह भारतीय रेलवे का सबसे आधुनिक कारखाना है. सबसे अच्छी इकाइयों में से एक है. सबसे बेहतर और सस्ते कोच बनाने के लिए मशहूर है।

क्या सोनिया गाँधी झूठ कह रही हैं?

नहीं वह सच कह रही हैं।

सच भी यही है कि जिस रेल कोच फैक्ट्री रायबरेली का निजीकरण का आदेश दिया गया है। वह फैक्ट्री लगातार प्रगति कर रही है। फैक्ट्री में सन 2018-19 में 1425 एलएचबी कोच बने हैं। जिनकी औसतन लागत 2.05 करोड़ रुपये प्रति कोच है। जबकि सन 1995 में इस तकनीक को जब आयात किया गया था, तब प्रति कोच की लागत 5.17 करोड़ रुपये थी। अब इस साल इसका उत्पादन बढ़ाकर 2158 करने के करीब पहुंच रहे हैं.

यानी हर साल उत्तरोत्तर जहाँ कोच बनाने की संख्या बढ़ती जा रही है। वही उनकी लागत पर भी काम किया जा रहा है और उसे भी कम किया जा रहा है लेकिन उसके बावजूद उस फैक्टरी का निजीकरण करने के रास्ते पर कदम उठाए जा रहे हैं ताकि जल्द ही उसे अडानी अम्बानी को बेचा जा सके?

जब 2016 में पहली बार रेलवे के निजीकरण की बातें सामने आयी थी तो वाराणसी रायबरेली में इस बात पर हंगामा मच गया था। उस साल मोदी ने वाराणसी में एक दौरा किया था जिसमें उन्होंने रेलवे के एक कार्यक्रम में ट्रेड यूनियनों को भरोसा दिलाया था, “हम रेलवे का निजीकरण नहीं करने जा रहे हैं. ऐसा करने की ना तो हमारी इच्छा है और ना ही हम इस ओर सोच रहे हैं.”

लेकिन यह पहली बार तो नहीं है जहाँ मोदी जी अपनी बात से पलटे हों।

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