लोकवाणी

मुख़्तलिफ़ आवाज़, निगाह और विचार

हास्य-व्यंग्य

अगर जीवन में आपने जनरल डब्बे की यात्रा का लुत्फ़ ना उठाया तो क्या ही दुनिया में आए

ट्रेन की यात्रा बहुत सुहावनी होती है. फिल्मों में तो इसे और सुहावना बना दिया जाता है. “छोटी सी कहानी से, बारिशों के पानी से, सारी वादी भर गई, लाss लाss लाss लाsss”, या फिर राजेश खन्ना-शर्मिला टैगोर का गाना, “मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू, आई रुत मस्तानी कब आएगी तू, बीती जाए ज़िन्दगानी कब आएगी तू, चली आsss, आ तू चली आssss”.

ऐसे सैकड़ों गीत होंगे, जो ट्रेन की यात्रा को बड़े ही प्यार और रोमांस भरे ढंग से दिखाते आपको सुनने को मिल जाएंगे. होता भी यही है, मगर तब जब आप रिजर्वेशन करा के चल रहे हो (त्यो-त्यौहार में हालांकि उसमे भी आफत रहती है). रिजर्वेशन अगर ‘एसी’ क्लास में है तो फिर तो खैर क्या ही कहना, तूं ही तो हैय्ये हया फिर बाबू.

मामला कब फंसता है ??
जब आप ‘जनरल’ श्रेणी में यात्रा करते हैं. अरे भाई साहब कसम से, ‘इस रात की सुबह नहीं’ वाली फ़ीलिंग आती है.

अभी चंद रोज पहले आनन-फ़ानन में दिल्ली जाना हुआ, बैठे जनरल पर और चल दिए (एक-दो बार और जनरल “डायर” में जा चुके हैं वैसे).

हां तो सबसे पहले जंग शुरू होती है सीट पाने के लिए भीड़ के साथ दौड़ लगाने की (यकीन मानों दोस्तों हलक सूख गया था दौड़ते-दौड़ते, डीडीएलजे के राज-सिमरन वाली फ़ीलिंग बिल्कुल भी नहीं आई थी).
इसके बाद अंधेरे डब्बे में जहां जगह मिली फट्ट से बैग रख दिया और चढ़ गए ऊपर, अपनी कब्जाई सीट पर बैठने (नोट- अनजान पाठकों को बता दें की जनरल डिब्बे में सीट कब्जाने का एक रूल ये भी है की अगर आप खिड़की से रुमाल या किसी किस्म की कोई पन्नी-मोमिया भी सीट पर खाली रहते फेंक देते हैं, तो उसपर आपका कब्जा सर्वसम्मति से मान लिया जाता है).

खैर सीट मिल गई, इतनी खुशी हुई की क्या ही कहें. हम तो खैर बैठ गए, अब इधर-उधर देखना शुरू किया. हद-से-हद पांच मिनट के अंदर डब्बा ऐसे भरा, जैसे हिटलर के गैस चैम्बर में यहूदियों को भर दिया गया हो. पैर रखने की जगह नहीं. हिरोशिमा और नागासाकी के परमाणु विस्फोट के बाद जैसे ‘जो जहां-जैसा था, वैसा ही रह गया था’ ठीक उसी तरह डब्बे के अंदर लोग भी एक ही जगह पर ठिठक से गए.

थोड़ी देर के बाद ही जिस गैस चैम्बर को मैं काल्पनिक समझ रहा था, वो वास्तविकता में परिवर्तित हो चुका था. रह-रह के आलू-मूली के परांठों की महक वातावरण में कौंध उठती थी.

कुछ लोग साइड में ऊपर की ओर सामान रखने को बनाई गई रैक पर इतनी गहरी नींद में सो रहे थें, मानो ट्रेन सुबह की चली हो और ये तब से उसी में हों (जानकारी के लिए बता दें की ‘श्रमशक्ति’ कानपुर से ही बन कर चलती है). दरअसल ये साइकोलॉजिकल हथियार होता है ऐसे डब्बों में सफर करने वालों का. गहरी नींद में होने का दिखावा इसलिए करना पड़ता है की कहीं-कोई आपको सरकने को ना बोल दे. अगर आप दूसरों को ये दिखाएंगे की आप कम्फर्ट में बैठे हैं तो बहुत ही तीव्र संभावना रहती है की सामने वाला अपनी तशरीफ़ आपकी सीट पे जबरन रख दे.

इतने में मेरी नज़र एक बंदे पर पड़ी. भाई साब ने बैंगनी रंग का एक अंगौछा निकाला, डब्बे के बीच की गैलेरी के ऊपर की जगह में ‘डाईगोनली’ उस गमछे को बांध दिया और फिर पालने की तरह उसमें लेट के झूलने से लगे. मैं हैरान, अवाक रह गया. उनके चेहरे को देखने को लपक पड़ा. मुझे लगा हो-ना-हो, ये ‘बेयर ग्रिल्स’ हैं, मैन वर्सेज वाइल्ड की जगह शायद ‘मैन वर्सेज ट्रेन’ का एपिसोड बना रहे हों. ज्यो ही उनकी तारीफ करते हुए वाह-वाह की, भाई साब का चेहरा दिखा. बेयर ग्रिल्स नहीं थें, मगर जो भी थे पूरी रात झूलते हुए सफर किये.
धीरे-धीरे रात बढ़ती गई. गाड़ी अपनी रफ्तार में चलती जा रही थी. किसी का पैर किसी के मुंह पर, किसी का हाथ, किसी और के सर पर, ऐसे ही सब बैठे-सोए थे.

सर को दो-तीन झटका लगता, फिर अचानक से आंख खुलती, इधर-उधर देखते, फिर आंख बंद कर लेते. ये प्रक्रिया सभी के साथ बिल्कुल एक जैसी होती थी. 2-3 घंटे का समय बीतने के बाद कोई शख्स बहुत हिम्मत करके, किसी तरह भीड़ को चीरता हुआ आगे बढ़ने लगा. एक सुर में सबने हल्ला मचाना शुरू कर दिया- “कहां, कहां जा रहे. आगे जगह नहीं, वापस जाओ.” बंदा झल्लाया और बोला-“अरे यार, टॉयलेट करने भी ना जाए क्या आदमी. हद्द है, हर बात पर लड़ाके हो जाते हो यार.”

भाई जब आगे बढ़ा तो पाया की टॉयलेट के अंदर भी चार लोग बैठे हुए थे. किसी तरह मनाने पर दो मिनट को बाहर आए, तो वो भाई साब टॉयलेट का इस्तेमाल कर सके. चूंकि मेरी सीट टॉयलेट के पास की ही थी, इसलिए इस पूरे वाकये को मैं देख सका.

इस बीच छिटपुट लड़ाई और चिल्लम-चिल्ला की आवाज़ कभी पास से तो कभी सुदूर से कानों में लगातार पड़ती ही रही. खैर, किसी तरह सुबह हुई और सफ़र बीत ही गया. कुल मिला के यही कहना है की एक बार ऐसे सफ़र का भी मज़ा लीजिये हुज़ूर. चौरासी लाख योनियों के बाद मनुष्य का जीवन मिलता है, अगर इस मानव जीवन में आपने जनरल डब्बे की यात्रा का लुत्फ़ ना उठाया तो क्या ही दुनिया में आए.

LEAVE A RESPONSE

Your email address will not be published. Required fields are marked *