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ऐ लड़की राजनीति समाज

महिलाओं के राजनीति में आने से मर्दों की पितृसत्ता और यौन कुंठा की गठरी क्यों खुल जाती है?

अरे सपना चौधरी राजनीति में चली गई तो स्टेज पर ठुमके कौन लगाएगा, राजनीति में शामिल होकर सपना स्टेज पर भाषण देती हुई सपना कहां जचेगी। सपना तो सपना तभी मानी जाएगी जब वह स्टेज पर तेरी आंख्यो का यो काजल पर ठुमके लगाएगी. स्टेज पर माइक थाम राजनीति करती सपना भला लोगों को कैसे सुहाएगी। देश के कुंठित मर्द जिनकी औरतें एक हाथ लंबा घूंघट किए घूमती फिरती हैं वे अपने पैसे किस पर लुटाएंगे। सपना के मटकते कूल्हों पर चरमसुख की प्राप्ति करने वाले मर्द कहां जाकर अपनी ‘मर्दानगी’ साबित करेंगे।

अभी सपना के कांग्रेस में जाने की खबर थमी भी नहीं थी कि सपना चौधरी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कह दिया की वह कांग्रेस, बीजेपी, सपा, बसपा किसी पार्टी में शामिल नहीं हुई, वह सिर्फ एक कलाकार हैं और कलाकार बने रहना चाहती हैं। न्यूज़ रूम में सपना का मज़ाक बन गया कि अरे सपना चुनाव लड़े या न लड़े क्या फर्क पड़ता है हमारा भला तो उसी में है कि सपना के गाने चलते रहे। सपना के गाने बंद हो गए तो हमारा इंटरटेनमेंट डेस्ट बस तैमूर के सहारे खबरें कैसे बनाएगा। और यह न्यूज़ रूम उसके लिए लोक कलाकार जैसे शब्द इस्तेमाल नहीं करना चाहता, ऐसा लगता है जैसे सपना चौधरी के लिए डांसर शब्द इस्तेमाल कर यह न्यूज़ रूम उसकी बेइज़्जती करता है। डांसर, नाचने वाली ये शब्द इस पितृसत्तात्मक मीडिया को आज भी औरतों की बेइज्ज़ती के हथियार नज़र आते हैं। ये उस लाइन को अनसुना कर देते हैं जब सपना यह बार-बार कहती हैं- मैं डांसर हूं और मुझे इस बात का गर्व है।

सपना बात राजनीति की करती हैं और न्यूज़ रूम पैकेज बनाता है- देखिए कौन है सपना चौधरी और जानिए उनकी दिलकश अदाओं का राज। खुद को थोड़ा प्रोग्रेसिव दिखाने वाले चैनल पैकेज के बैकग्राउंड में तेरी आंख्यों का यो काजल चलाकर ही संतुष्ट हो जाते हैं। न्यूज़ रूम में सपना का मज़ाक उड़ाने वालों में खिलखिलाते ज़्यादातर वही मर्दवादी चेहरे थे जो शायद मेट्रो में हर दिन सपना के विडियो देखते हुए आते होंगे। ये मर्द सिर्फ सपना के अस्तित्व को नहीं नकार रहे थे बल्कि वे इस बात पर अपनी मोहर लगा रहे थे कि महिलाओं का राजनीति में होना ही मज़ाक है।

ये वही न्यूज़ रूम है जो प्रियंका के भाषणों से अधिक उनके कपड़े, चेहरे के रंग और मिसेज वाड्रा होने पर ज़ोर देता है। कांशी राम की जयंती और पुण्यतिथि पर गेस्ट हाउस कांड की चर्चा और उनके निजी रिश्तों की पड़ताल किए बिना नहीं रह पाता। यह मीडिया आज भी मायावती के गहनों की गिनती करता नहीं थकता।

यह वही समाज है जहां राबड़ी देवी के भाषणों का मजा़क आज तक उड़ता है और उनके बच्चों की गिनती सालों से रुकी ही नहीं है। स्मृति के राजनीतिक रूप से अपरिपक्व होने की आलोचना उनके मोटापे का मज़ाक बना या उनकी ऐक्टिंग के दिनों की तस्वीरें शेयर कर की जाती हैं। वसुंधरा राजे को सलाह दी जाती है कि उनका मोटोपा बढ़ रहा है इसलिए बेहतर है कि वे आराम करें। ममता दीदी का नाम ही हिटलर दीदी रख दिया जाता है क्योंकि जब एक महिला आदेश देती है तो पुरुष का अहं उसे स्वीकार नहीं पाता। सोनिया गांधी के वेश्या या बार डांसर होने की फेक ही सही पर खबरें दिन-रात हमारी फीड से होकर गुज़रते रहते हैं। हमारे ‘कद्दावर’ नेता भी कभी मायावती को काली-कलूटी तो कभी सोनिया को विदेशी मेम या वेश्या कहने से नहीं चूकते। ये आलोचना, ये पैमाने उस देश में गढ़े जाते हैं जहां 524 सीटों में से सिर्फ 66 महिला सांसद हैं। यह देश संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले पर 149वें पायदान पर आता है। महिला आरक्षण बिल इस देश में अधर में सालों से लटका पड़ा है।

यहां जो एक बार गौर करने लायक यह है कि बात जहां महिला नेताओं की आती हैं वहां इन्हीं ओछे और छिछले पैमानों के बलबूते उनकी आलोचना की जाती है। राजनीतिक मुद्दों/पैमानों से इतना महिला नेताओं की आलोचना का आधार हमेशा इतना ही बेहूदा और घटिया रहा है। ये पैमाने न्यूज़ रूम में भी तय किए जाते हैं. न्यूज़ रूम को आम लोगों से इतर नहीं समझना चाहिए क्योंकि न्यूज़ रूम भी अपने अंदर पितृसत्ता की गठरी और यौन कुंठा लेकर घूम रहे मर्दवादी चेहरों से ही बनता है।

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