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ईश्वर चंद्र विद्यासागर की मूर्ति तोड़ने वाले संघी समाज को अंधविश्वासों में फंसाना चाहते हैं!

पश्चिम बंगाल में कल अमित शाह के रोड शो के दौरान BJP-TMC कार्यकर्ताओं में लड़ाई हो गई. इसी दौरान उपद्रवियों ने विद्यासागर कॉलेज में ईश्वर चंद्र विद्यासागर की प्रतिमा को तोड़ दिया. शाह की रैली के बाद हुई हिंसा और मूर्ति टूटने पर के बाद, यह जानना जरूरी है कि ईश्वर चन्द्र विद्यासागर कौन थे और इन ढोंगियों को उनसे क्या परेशानी है.

मुरारी त्रिपाठी

29 दिसंबर 1841 को ईश्वर चंद्र विद्यासागर कलकत्ता के फोर्ट विलियम कॉलेज में प्रमुख पंडित बने. इन दिनों उन्होंने देखा कि समाज में स्त्रियों की हालत बहुत खराब है. स्त्रियों को पढ़ने नहीं दिया जाता है, उनका बचपन में ही विवाह कर दिया जाता है. विधवा हो जाने पर उन्हें घर में कैद कर लिया जाता है. ये विधवा औरतें कैद से छूटकर वेश्या बन जाती हैं. यह सब देखकर उनका ह्रदय द्रवित हो गया.

यही वह समय था जब उन्होंने स्त्रियों के उत्थान के बारे में गंभीरता से सोचना प्रारम्भ किया. इसी क्रम में उन्होंने नारी शिक्षा के लिए विद्यालय खोले. इनमें कलकत्ता का मेट्रोपोलिटन स्कूल प्रमुख था. एक अनुमान के मुताबिक उन्होंने ऐसे करीब 35 विद्यालयों की स्थापना की. विद्यालयों के साथ-साथ उन्होंने नारी शिक्षा और बाल विवाह के विरोध में आन्दोलन भी चलाए.

विद्यालयों के खोले जाने के बाद भी लोग अपनी लड़कियों को पढ़ने के लिए नहीं भेज रहे थे. हालाँकि, ईश्वर चन्द्र इससे निराश नहीं हुए. वे लोगों के घर-घर जाकर लड़कियों को पढ़ने के लिए भेजने का आग्रह करने लगे. इसका परिणाम सकारात्मक निकला और विद्यालयों में स्त्रियों की संख्या बढ़ने लगी.

1851 में वे संस्कृत कॉलेज में प्रोफेसर बने. इस समय समाज में विधवाओं का जीना दूभर होता जा रहा था, तो उन्होंने विधवा पुनर्विवाह के लिए सामजिक आन्दोलन शुरू किया. कहा जाता है कि यह दौर बंगाली पुनर्जागरण का सबसे चरम समय था.

विधवा पुनर्विवाह के साथ-साथ उन्होंने बहुविवाह पर भी चोट की. उस समय पुरुष एक से अधिक महिलाओं से शादी कर लेते थे. 1856 में विधवा पुनर्विवाह एक्ट पारित हुआ. यह उनके लिए बहुत बड़ी जीत थी.

असल में उस समय विधवा औरतों के लिए नियम था कि उन्हें घर में सबसे पहले उठना पड़ता था. इसके बाद ठन्डे पानी में नहाकर अपने तन पर एक सफेद साड़ी लपेटनी होती थी. अच्छा भोजन करना उनके लिए मना था. वे पूरे दिन भगवान की पूजा ही करती रहती थीं. और तो और उन्हें किसी से भी मिलने कि मनाही थी. यहाँ तक वे खाना भी सबसे अंत में खाती थीं. यह बहुत अमानवीय था.

विधवाओं को उनका हक़ दिलाना विद्यासागर के लिए बिलकुल भी आसान नहीं था. वे लेख लिखते, सेमिनार करते, सभाएं बुलाते और भाषण देते, लेकिन हर बार सनातन धर्म के ठेकेदार शास्त्रों और पुराणों का बहाना देकर उनकी हर बात को काट देते. लेकिन विद्यासागर भी पीछे नहीं हटे. उन्होंने कहा कि अब समय बदल रहा है. जो अत्याचार औरतों के साथ पहले हुए हैं, उन्हें अब जारी नहीं रखा जा सकता है.

ऐसा करने पर उन्हें कट्टरपंथियों द्वारा जान से मारे जाने की धमकियाँ भी मिलती थीं. लेकिन वे इन धमकियों से कभी डरे नहीं. उन्होंने विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में दो विशाल ग्रन्थ लिखे. इसका समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ा. वे विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए पूरी तरह से समर्पित थे. इतने ज्यादा कि उन्होंने अपने बेटे की शादी एक विधवा से ही करवाई.

ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ने केवल स्त्रियों के उत्थान के लिए ही अपना पूरा जीवन होम नहीं किया, बल्कि समाज के वंचित तबकों को भी उन्होंने ऊपर उठाया. उनका मानना था कि सारे मनुष्य एक समान हैं, इसलिए किसी के साथ भेदभाव करना मनुष्यता के खिलाफ है.

उनका यह भी मानना था कि शिक्षा मनुष्य को विनम्र बनाती है और उसके आत्मविश्वास में वृद्धि करती है. इसी सिद्धांत पर चलते हुए उन्होंने अपने विद्यालयों के दरवाजे अछूतों के लिए भी खोल दिए थे. इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था. इस कारण से उनके कई साथी उनसे नाराज हो गए थे. लेकिन विद्यासागर ने उनकी नाराजगी को एक तरफ रखते हुए अपना ध्यान बस मानवता की सेवा में लगाया.

कल कमलगट्टों ने ईश्वर चंद्र विद्यासागर की मूर्ति तोड़ दी. ये कमलगट्टे खुद को सनातनी धर्म का सबसे बड़ा ठेकेदार बताते हैं. ईश्वर चंद्र विद्यासागर, राजा राममोहन राय, दयानंद और विवेकानंद जैसे धर्मसुधारक इनके गले नहीं उतरते. ये प्रगति के विरोधी हैं और समाज को पुरातन काल में ही फंसाए रखना चाहते हैं, ताकि इनकी तानाशाही कायम रहे. औरतों, दलितों और आदिवासियों को उनका हक ना मिले. ये इनकी असली चाहत है. एक तरफ ये नारी को देवी का दर्जा देने का दावा करेंगे तो दूसरी तरफ उसका जीना मुहाल कर देंगे. ऐसे निर्लज्ज ढोंगियों के खिलाफ आज प्रत्येक तरक्की और अमनपसंद इंसान को लामबंद होना होगा. यही वक्त की जरूरत है.

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