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मैनें वोट नहीं डाला तो लोकतंत्र कैसे कमजोर हुआ, यह तो पहले से ही कमजोर है?

Jasminder Tinkoo

चुनाव को कोई लोकतंत्र का महापर्व बोल रहा है, कोई कह रहा है कि देश के प्रति जिम्मेदारी निभाने का सबसे बड़ा दिन है। तो कोई कहता है कि यदि आप वोट नहीं डालते हैं तो आप सरकार से सवाल करने या आलोचना करने का अधिकार खो देते हैं।

लेकिन मेरे लिये यह दिन न तो महापर्व है और न ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी। इस दिन मैं वोट डालने वालों के फोटो और प्रतिक्रिया देखता रहता हूँ और यही सोचता हूँ कि कैसे हमारे देश वासी एक ऐसी प्रक्रिया को पूरा लोकतंत्र समझे हुए जो लोकतंत्र का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा है फिर मैं समझने की कोशिश करता हूँ कि कैसे हमारे देश में सच्चा लोकतंत्र स्थापित करने की लड़ाई को आगे बढ़ाया जाए।

मैं बुनियादी तौर पर चुनावी प्रक्रिया का विरोधी नहीं हूँ लेकिन भारत की मौजूदा चुनाव प्रक्रिया आम आदमी के साथ धोखे से ज्यादा कुछ भी नहीं है। ये चुनाव पैसे और जाति के दम पर लड़ा जाता है। पूरा चुनाव तीन या चार उम्मीदवारों के बीच में मुकाबले के तौर पर पेश कर दिया जाता है। हर बार सरकार बनने से सिर्फ ये तय होता है कि अब किस पूंजीपति को ज्यादा फायदा पहुँचाया जायेगा और किसको कम।जब नीतियां आम जनता की बजाए पूँजीपतियों के लिये ही बननी है तो फिर इतने सारे उम्मीदवारों का नाटक क्यों? सीधे पूँजीपतियों को ही प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित क्यों नहीं कर दिया जाता।

पिछले दस साल में जितना मैंने देखा है और भारतीय आर्थिक नीतियों के बारे में जितना मैंने पढ़ा और समझा है उससे समझा हूँ कि-

  • सरकार चाहे किसी की भी हो महंगाई को बढ़ना है।
  • सरकारी विभागों में ठेकेदारी प्रथा को बढ़ना है।
  • मजदूरों और किसानों की समस्या और बढ़नी है।

सामाजिक भेदभाव यूं ही बढ़ना है और यही होना है क्योंकि ये चुनाव इसीलिए होते हैं। जिन पार्टियों के बीच में मुकाबला मीडिया दिखाती है, ये पार्टियां पूंजीपतियों से चन्दा लेती हैं और ढोंग जनता की भलाई का करती है। इतना समझने के बाद किसी जिम्मेदार नागरिक का सबसे बड़ा फर्ज वोट डालने से ज्यादा ये पता करना है कि कैसे लोकतंत्र को पूँजीपतियों और शहरों की गिरफ्त से निकाल कर गांव की झोपड़ी तक पहुंचाया जाये।

कुछ महानुभव तो यहां तक पहुंच गये हैं कि पिछले चार साल से भारतीय संविधान और लोकतंत्र खतरें में आ गया है जबकि मैं ऐसा नहीं मानता। दरअसल भारतीय लोकतंत्र शुरू ही से अभिजात्य और मध्यवर्ग का लोकतंत्र रहा है। जिसकी नीतियां हमेशा ब्राह्मणवादी पूंजीवादी नीतियां रही हैं। गांव का गरीब आज भी थाने में जाने से डरता है। जहां सरपंच तो दलित या महिला बनते हैं लेकिन वास्तविक सरपंची दबंग या पुरुष ही करता हो।

जहाँ के आदिवासियों को कभी भी उनके संवैधानिक अधिकार नहीं दिये गये। जहाँ सामाजिक न्याय(आरक्षण व्यवस्था) के सवाल को यहां विश्वविद्यालयों ने लागू ही नहीं होने दिया। जहाँ राष्ट्रीयताओं की स्वायत्ता का कभी सम्मान नहीं किया गया। जहाँ श्रम कानूनों की सरेआम धज्जियां उड़ाई गयी या यूं कहें कि हर उस कानून को बिना जनता के आन्दोलनों के लागू नहीं किया गया जो आम जनता के हित में थे। वहां कोई कैसे बोल सकता है कि लोकतंत्र अभी खतरे में आया है जबकि ऐसा तो शुरू से ही है। संविधान की प्रस्तावना वाला भारत तो कभी रहा ही नहीं।

हमारा तो संघर्ष ही इस प्रस्तावना को लागू करवाने का है। लोकतंत्र को जब हम वोट तक सीमित कर देते हैं तो यें भी लोकतंत्र के लिये एक खतरा ही है।

जिस देश की संप्रभुता विश्व बैंक में गिरवी रखी हो तो उस देश के हर जिम्मेदार नागरिक के लिये जरुरी है कि वोट से आगे सोचे और कैसे एक अधूरे लोकतंत्र को पूरा लोकतंत्र बनाया जाये इस पर विचार करें। ये लोकतंत्र न तो जनता का है और न ही जनता के लिये है। ये एक ऐसा लोकतंत्र है जिसमें तंत्र ज्यादा और लोक कम है। कई बार तो लगता है कि तंत्र लोक की कमर तोड़ रहा है।

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