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कमीशन लेकर कन्हैया के लिए चंदा जुटाने वाली ourdemocracy.in कंपनी का पूरा खेल जान लें

यह देश बहुत उदार है। उदारता ऐसी जो नायक और खलनायक में फ़र्क नहीं करती। दरवाज़े पर खड़े भिक्षुक की जात नहीं पूछी जाती। उस पर शक भी नहीं किया जाता, भले भीतर से वह उठाईगीर हो। अफ़राजुल याद है? उदयपुर वाला? उसके लिए एक करोड़ के चंदे का लक्ष्य था, कितना जुटा कोई नहीं जानता। अंदाज़ा इससे लगा लीजिए कि हत्यारे शंभुलाल रैगर की बीवी के लिए ही अकेले तीन दिन में साढ़े सत्ताईस लाख चंदा इस देश की जनता ने दे दिया था। कैसे और क्यों? पता नहीं।

कठुआ और उन्नाव याद करिए। यहां की बलात्कार पीड़ितों के लिए एक दिन में चंदा पंद्रह लाख पार कर गया था। नाइंसाफी की घटनाओं को भूल जाइए, तो जिग्नेश मेवानी के चुनाव के लिए चौबीस घंटे में चौदह लाख के आसपास चंदा जुटने की चर्चा रही। जिसे हम चंदा कह रहे हैं, वह दरअसल नए ज़माने की crowdfunding है। यह परंपरागत चंदे से भिन्न एक धंधा है जिसमें बाकायदे कॉरपोरेट कंपनियां लगी हुई हैं। ऊपर मैंने जो भी मामले गिनाए हैं, रैगर को छोड़ बाकी के मामले में एक ही एजेंसी ने यह काम किया था, अपना पांच परसेंट कमीशन लेकर।

सेबी ने मार्च के पहले हफ्ते में crowdfunding करने वाली एजेंसियों को नोटिस थमाया। कुछ गड़बड़ चल रहा था। तत्काल इन एजेंसियों ने खुद को alternative investment fund के रूप में पंजीकृत कर लिया। यह बताने का कुल आशय यह है कि नए ज़माने में चंदा उगाहना बाकायदा एक संगठित पूंजीवादी उद्योग है। इसलिए इससे जनता के समर्थन का अंदाज़ा लगाने का कोई अर्थ नहीं। सुबह से जो लोग कन्हैया के चुनाव के लिए जुट रहे चंदे का चढ़ता कांटा और दानदाताओं की संख्या गिन गिन के फूले जा रहे हैं, वे अभी रामजन्म भूमि आंदोलन के चंदा मॉडल में अटके पड़े हैं। उन्हें इसके पीछे लगे कॉरपोरेट को खोजना चाहिए।

बहरहाल, तीन दशक पहले राम मंदिर के नाम पर जुटाए गए चंदे में एक सबक जरूर है जो आज भी बदले हुए मॉडल में कारगर है। इस देश के धार्मिक समूह कभी अगर मस्जिद या गुरद्वारों के लिए भी चंदा मांगते तो जनता बेशक खुशी खुशी दे देती। उसने मंदिर के लिए भी दिया। फिर हुआ क्या? चंदा लिया मंदिर बनाने के लिए, तोड़ दी मस्जिद! धोखा। विश्वासघात। यह ग़लत आज तक दुरूस्त नहीं किया जा सका। आरएसएस और विहिप इसके ऐतिहासिक दोषी हैं। लोगों ने अपना पेट काट कर मंदिर के लिए चंदा दिया था। उनका शाप लगेगा। आज नहीं तो कल। यही काम अगर 2019 में होता तो कोई नैतिक संकट नहीं था मस्जिद तोड़ने में। किसी को शाप नहीं लगता किसी का। कैसे?

आज कॉरपोरेट फंड चंदा उगाही कर रहा है कमीशन लेकर। कन्हैया से लेकर जिग्नेश से लेकर रैगर तक के लिए। उसे अपने कट से मतलब है, सरोकार से नहीं। सरोकार हम देख रहे हैं, गलती हमारी है। इसके उलट खतरा कहीं ज़्यादा है इस बार। अगर कहीं कन्हैया जैसे लोग भविष्य में पलटे, तो हम कहने के लायक भी नहीं रह जाएंगे कि बेटा जनता ने तुम्हें चंदा दिया था, उसका तो मान रखते। इस चंदे की कोई मानवीय जवाबदेही नहीं है। यहां कोई नैतिकता काम नहीं कर रही, जैसा राम मंदिर आंदोलन के दौर में था। मैं सुबह से इसी मुहावरे में सोच रहा हूं कि मंदिर बनाने के नाम पर चंदा जुटाकर अगर कन्हैया ने भविष्य में मस्जिद तोड़ दी, तो जवाबदेह कौन होगा और किसके प्रति?

कमीशन लेने वाला तो कट लिया पैसा जुटाकर। नेता तो सांसद विधायक बन गया। अब चाहे जो करे, कोई नैतिक दबाव तो है नहीं उसके ऊपर। बचा कौन? कटा किसका? ये सोचते हुए अक्षय कुमार के एक सरकारी विज्ञापन में सिगरेट फूंकने वाले नंदू के नाम उसका आखिरी डायलॉग याद आ रहा है – “अब सोच, और हंस!”

कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने लेटर हेड पर चुनावी चंदे की अपील जारी की है। चेक, डीडी आदि से योगदान मांगा है अपने 37 प्रत्याशियों के लिए। इनमें एक प्रत्याशी विशिष्ट है जिसे पार्टी चंदे का मुंह नहीं देखना, क्योंकि उसके लिए एक कंपनी क्राउड फंडिंग कर रही है। समर्थकों में उत्साह है कि पच्चीस लाख एक दिन में जुट गया। किसी को क्या समस्या होगी? बढ़िया है, जितना जुटे। मुझसे किसी ने पूछा कि चुनावी फंड के मामले के सनातन गरीब कम्युनिस्ट पार्टियां भी कन्हैया वाला तरीका क्यों नहीं अपनाती हैं? सवाल जायज़ था, जवाब क्या हो? ज़रा तथ्य देखिए।

ये जो कंपनी (ourdemocracy.in) कन्हैया के लिए चंदा जुटा रही है, इसके ग्राहकों में आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और भाजपा के प्रत्याशी भी हैं। पूरा उदारवाद है। कंपनी के संस्थापक अमेरिका के विदेश विभाग में फैलो रह चुके हैं। इसके एक सलाहकार वोडाफोन CSR के प्रमुख थे। एक और सज्जन प्रशांत किशोर की फैक्ट्री से निकले हैं। ये लोग लोकतंत्र को reclaim करने का दावा करते हुए चंदे का धंधा चला रहे हैं। विडंबना है। क्या कोई भी कम्युनिस्ट पार्टी ऐसे लोगों की कंपनी का सहारा चुनावी चंदे के लिए ले सकती है? नीतिगत मसला है। इतना आसान नहीं। फिर एक प्रत्याशी विशेष जब ऐसा करता है तो पार्टी की नीति से वह स्वायत्त कैसे हो जाता है?

ध्यान रहे, कन्हैया इसलिए विशिष्ट है क्योंकि वह कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य और प्रत्याशी है। मैं यह सवाल किसी अन्य बुर्जुआ संसदीय दल के लिए नहीं उठा रहा, केवल कन्हैया के लिए। कन्हैया के चंदा कैंपेन को लेकर सीपीआई की पॉलिसी क्या है? आज उसका फंड अमरीकी विदेश विभाग का आदमी मैनेज करेगा, तो कल कुछ भी हो सकता है। याद करिए, अरविंद केजरीवाल की फोर्ड फंडिंग विवाद को और सोचिए कि सेंध कहां तक लग चुकी है। आतिशी मार्लेना, धरमवीर गांधी, राघव चड्ढा, दिलीप पांडे, पंकज गुप्ता से लेकर नमो अगेन अभियान के लिए उत्तराखंड के स्वयंसेवकों तक, कन्हैया कुमार से लेकर आर्टिस्ट्स यूनाइट, यंग इंडिया मार्च, किसान मार्च, शाह फैसल, शहला राशिद और नाना पटोले तक – सबका मालिक एक है ourdemocracy.in

आश्चर्य किंतु सत्य। अलग अलग हाथ, जेब एक। इधर हम लोग अब भी वैचारिक मतभेदों में सिर खपाए जा रहे हैं।

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