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रिपोर्ट

कश्मीरी पंडित का सवाल, ‘कश्मीरी पंडितों को कब तक कश्मीरियत के खिलाफ इस्तेमाल किया जाएगा’

Shvaita Kaul

मैं कश्मीर में एक कश्मीरी पंडित परिवार में पैदा हुई. आतंकवाद का वह दौर जिसमें कश्मीरी पंडित परिवारों ने पलायन किया, मैंने अपनी आँखों के सामने देखा है. सड़क पर जाते हुए अचानक कर्फ्यू का लग जाना और फिर मुख्य रास्तों के बजाय गलियों से होते हुए वापस घर पहुंचना, आंसू गैस के गोले, बंदूकधारी आतंकी…

ये सब मैंने महज़ 5 साल की उम्र में देखा है. मुझे अच्छी तरह याद है जब कुछ आतंकी जबरन हमारे घर में बन्दूक लेकर घुसे थे. उस रात और अगली कई रातों को हम सो नहीं पाए थे. मुझे यह भी याद है कि किस तरह मार्च 1990 में रात के 2 बजे हमारा पूरा परिवार कश्मीर से हमेशा के लिए पलायन कर गया था. मुझे यह भी याद है कि हमारा पूरा परिवार किस कदर ख़ौफ़ज़दा था कि रास्ते में आतंकी हमें गोलियों से भुन सकते हैं. मुझे यह भी याद है कि बस ड्राइवर एक कश्मीरी मुस्लिम था. जी हाँ, कश्मीरी मुस्लिम! मुझे अच्छी तरह यह भी याद है कि किस तरह उस ड्राइवर ने हमसे कहा था, “मैं आप लोगों के साथ कोई भी अनहोनी नहीं घटने दूंगा”. ये सब कुछ मैंने तब देखा जब मैं 5 साल की थी. करीब 30 साल बीतने के बाद भी अगर बचपन के ये खौफनाक मंज़र आज तक मेरे ज़ेहन में हैं तो कश्मीर के उन मासूम बच्चों का क्या हश्र होता होगा जो पल-पल बन्दूक के साए में गुज़ार रहे हैं? उस मासूम बचपन का क्या हश्र होता होगा जब उसे pellet gun से target किया जाता होगा? उस नौजवानी का क्या हश्र होता होगा जब महज़ शक़ के आधार पर उसे हिरासत में लिया जाता होगा? उस कश्मीरी जनता को कैसा महसूस होता होगा जब दो कौड़ी के मीडिया चैनल उन्हें “पाकिस्ता‍न-परस्त” और “आतंकवादी” के रूप में प्रस्तुत करती होगी? संपर्क के सारे साधनों के टूट जाने पर कैसा लगता होगा, वह भी तब जब आपको अपने परिजनों की कोई खबर नहीं मिलती.

कश्मीर छोड़े हुए आज मुझे अरसा हो गया है. लेकिन आज भी अगर कहीं कश्मीरी भाषा बोलते हुए कोई सुनाई पड़ता है तो स्वाभाविक तौर पर अपनापन महसूस होता है. ये अपनापन उस साझा कश्मीरियत की देन हैं जिसे साम्प्रदायिकता का रंग चढ़ाकर ख़त्म करने की लगातार कोशिश की जा रही है.

कश्मीर के पूरे मुद्दे को भारत बनाम पाकिस्तान का एक मसला बनाकर और कश्मीरी पंडित बनाम कश्मीरी मुसलमान का मुद्दा बनाकर प्रस्तुत किया जाता है. कश्मीर पर बोलते हुए अकसर ऐसे धुरंधर मिल जाते हैं जिन्हें यह कहते हुए सुना जा सकता है कि “जब पंडितों को घाटी से निकाला गया तब कहाँ थे!” वह एक अलग बात है कि जब घाटी से कश्मीरी पंडित पलायन कर रहे थे तब ये तमाम धुरंधर भी बैठकर तमाशा देख रहे थे और आज कश्मीरी अवाम पर होने वाले हर अन्याय को justify करने के लिए कश्मीरी पंडितों को ढाल बनाकर प्रस्तुत कर रहे हैं. मैं इन घिनौनी कोशिशों से तहेदिल से नफरत करती हूँ. “हम” और “वो” की इस खाई से केवल राज्यसत्ता और उसके चाटुकारों को फायदा होता है और किसी को नहीं. इस खाई में जनता की हार है. वैसे आज इस देश के आर्थिक हालात जहाँ पहुँच गए हैं वहां फासिस्टों को पूरे देश को कश्मीर में तब्दील करने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगेगा. हमें ये भूलना नहीं चाहिए कि लोग जहाँ-जहाँ नाइंसाफी के खिलाफ लड़ रहे हैं उन पर “आतंकवादी” होने का लेबल चस्पां करना राजसत्ता के लिए कोई बड़ी बात नहीं है.

सबसे घटिया स्तर के लोग तो वो हैं जो Article 370 के रद्द होने को “कश्मीरी मुस्लिमों के साथ बदला लेने” के रूप में देख रहे हैं और उसका जश्न मना रहे हैं. ऐसे प्रतिक्रियावादी लोग जो एक किस्म के उत्पीड़न को justify करते हैं वो हर किस्म के उत्पीड़न को भी जायज़ ठहराते हैं. Article 370 कश्मीरी जनता को दी जाने वाली कोई भीख नहीं थी. कब‍ायलियों के हमले के समय की विशेष परिस्थितियों में एक provisional व्‍यवस्‍था के तहत कश्‍मीर का भारत के साथ विलय हुआ था जिसमें उसका अपना अलग संविधान और झण्‍डा भी था और उसे विशेष राज्‍य का दर्जा प्राप्‍त था. इस विशेष स्थिति को Article 370 प्रकट करती थी और भारत के साथ कश्‍मीर के रिश्‍तों को परिभाषित करती थी. 26 अक्‍तूबर 1947 को जिस ‘इंस्‍ट्रूमेंट ऑफ़ एक्‍सेशन’ पर हस्‍ताक्षर के ज़रिए कश्‍मीर का विलय हुआ था उसमें कश्‍मीरी अवाम के साथ किये गये वायदों को भारतीय राज्‍य ने कभी पूरा नहीं किया. कांग्रेसी हुकूमत ने कश्मीरी अवाम के साथ जिस विश्वासघात का आगाज़ किया था भाजपा ने आज उसे परवान चढ़ाया है.

वैसे इस पोस्ट के बाद कई “धुरंधर” फिर से एक बार मेरे फेक होने की घोषणा करेंगे और मुझ पर गालियों की बौछार करेंगे. मुझे ऐसे रेंगने वाले कीड़ों से बस एक ही बात कहनी है. (Go to Hell!)

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