लोकवाणी

मुख़्तलिफ़ आवाज़, निगाह और विचार

राजनीति रिपोर्ट

आडवाणी का टिकट कटा: ‘गुरू’ का पत्ता साफ कर ‘चेले’ ने ‘मार्गदर्शक’ को मार्ग दिखाया!

भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक और शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी का गांधीनगर से टिकट कटा, इसके साथ ही मुरली मनोहर जोशी और उत्तराखंड में मेजर जनरल खंडूरी व भगत सिंह कोशियारी के टिकट भी काटे गये हैं।

लाल कृष्ण आडवाणी का टिकट कटने पर जयंत जिज्ञासु लिखते हैं, आडवाणी जी की दशा पर हंसा नहीं जाना चाहिए। सोचिए, जो आदमी नफ़रत फैला कर किसी पार्टी को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाता हो, एक दिन उसकी ‘उपयोगिता’ समाप्त होने पर वही पार्टी उसे पूरी निष्ठुरता व निर्ममता से ठिकाने लगा देती है। सियासत में कुछ भी स्थाई नहीं होता। इसलिए, जिस भी पार्टी में रहिए, अपने विवेक को नीलाम करके मनुष्यता-विरोधी काम मत कीजिए। आज आप पार्टी के लाडले हो सकते हैं, कल को आपके सामने ही किसी मेडियोकर को आपके सर पर बिठा दिया जाएगा, और हो सकता है कि हर मंच पर आपको बाक़ायदा ज़लील भी कराया जाए।

इसलिए, रीढ़ की हड्डी सीधी रखिए, और लोकतंत्र की जड़ों को मज़बूत करते रहिए, फिर आप न उपहास के पात्र बनेंगे, न तरस के। इतिहास एक दिन आपके साथ न्याय करेगा।

आडवाणी जी, हमारे पिता की पीढ़ी ने आपकी ज़हरीली बोली झेली, हमने मोदी को झेला है, योगी को देख रहे हैं, आगे हमने राह ठीक नहीं की, तो हमारे बच्चे किसी भोगी को इस देश का ‘भाग्यविधाता’ मानने को अभिशप्त होंगे।

आडवाणी जी, तमाम बदनामियों के बावजूद पार्टी में आपको वह नहीं मिला, जो सही मायने में आपका प्राप्य था। शेष बची ज़िंदगी में आपको शांति और सेहत मयस्सर हो, सद्कामनाएं!

आडवाणी कमजोर नहीं है

सचिन झा का मानना है कि लोग आडवाणी को नहीं जानते हैं। आडवाणी ने अपने 60 वर्ष के राजनीतिक जीवन में 50 वर्ष विपक्ष में बिताया है। वो जिस पार्टी से जुड़े रहे हैं उसे 80% चुनावों में हारते हुए उन्होंने देखा है। देश के विभाजन के समय अपने जन्म भूमि से दूर आकर रहना सीखा है। आडवाणी न ही बेबकूफ है न ही पागल है और कमजोर तो बिल्कुल नहीं है।

जिस दिन मोदी प्रधानमंत्री बने उस दिन के बाद आडवाणी ने सोच लिया जिंदगी में एक हार और हो गयी अब 5 वर्ष फिर संघर्ष करना होगा। लाल कृष्ण ने मोरारजी देसाई, चंद्रशेखर और विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे नेताओं को बनते और खत्म होते देखा है। वो अब मोदी को खत्म होते देख रहे हैं।

हाथ जोड़ कर उनकी तस्वीर आडवाणी की एक मजबूत राजनीतिक चाल है। जो मोदी को एक निरंकुश और अशिष्ट नेता के रूप में साबित कर रही है। 2019 के चुनाव के बाद अगर मोदी की हार हुई तो आडवाणी के नेतृत्व में मार्गदर्शक मंडल की बैठक होगी और आडवाणी मोदी से कहेंगे बेटा पार्टी मैंने बनाया है मुझे लगता है “अब तुमसे न हो पाएगा” अब गडकरी को दे दो सबकुछ। यह उनकी जीत होगी! उस समय उस समय वो सभी आडवाणी के पीछे खड़े रहेंगे जिन्हें उन्होंने राजनीति सिखाया है।

अगर प्रतिभाशाली इंसान असफल होता है तो वो हरामजदगी का तालाब बन जाता है। वो मरते दम तक लड़ता है। जिस आडवाणी ने 2 सांसद होने पर देश भर में रथ यात्रा निकालने की योजना बना ली थी। वो अब क्या ही कमजोर होगा? अभी तो पक्ष विपक्ष के सैकड़ो सांसद उसके सामने सर झुकाते हैं।

प्रवीन लिखते हैं, सिर्फ बुजुर्ग होने के नाते आडवाणी से क्या सहानभूति रखना. उन्होंने नफरत के बीज से ही बीजेपी बनाई. उनका फैलाया हुआ ज़हर आज इनकी पार्टी के नेताओं में तेजी से पनप रहा है.

सारी ज़िन्दगी इन्होंने लोगों को मारने काटने वाली राजनीति की है. धर्म के नाम पर देश को दो कौमों में बाटने में इनका अहम योगदान है. इनके समय में जो डर लोगों के जेहन में बैठा वो आज तक नहीं निकल पाया. आडवाणी ने जो बोया वही काटा है.

‘गुरू’ का पत्ता साफ कर ‘चेले’ ने ‘मार्गदर्शक’ को मार्ग दिखाया! अटकलें नहीं चलीं! उनकी जगह किसी ‘परिजन’ को भी नहीं मिली! लेकिन बड़बोले साक्षी की धमकी काम आई।

1 COMMENTS

  1. यह सियासत और सत्ता का घिनौना सच है। मुगलकाल में भी यही होता था। पुत्र पिता को जेल भेजकर या हत्या कर जबरन सत्ता काबिज़ करता था। आज भी वही दुहराया जा रहा है। कभी उम्र का हवाला देकर तो कभी कुछ और ही कहकर….पर हो वही रहा है।
    बस अफसोस इस बात का है कि जो पार्टी संस्कार और संस्कृति की बात करने का ढिंढौरा पीटती है…….वही अपने बुजुर्गों को प्रताड़ित और अपमानित कर घर से बाहर का रास्ता दिखा रही है।

LEAVE A RESPONSE

Your email address will not be published. Required fields are marked *