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रिपोर्ट

लालू यादव की तरह कन्हैया कुमार भी इस चुनाव में जातिवादी घृणा का शिकार हुए हैं

ज़फर इकबाल

लालू प्रसाद यादव की पार्टी ने जिस तरह से लालू की जननेता वाली छवि को एक जाति में रिड्यूस कर दिया है वह देख कर दुख होता है। लालू के भाषणों में या बयानों में कभी भी आप जातिगत गंध नहीं महसूस करेंगे।

जो व्यक्ति उस जातिगत और सामंती शोषण से लड़ा हो उसके मन में कभी उस समाज के लोगों के लिए निजी बैर नहीं था। लालू की लड़ाई हमेशा वैचारिक ही रही। जिस नितीश कुमार ने लालू को जेल भिजवाया उसी के साथ गठबंधन करने के बारे में लालू ही सोच सकते थे।

ये वैचारिक समझदारी का ही मामला है कि लालू ने निजी वैमनस्य को भुलाकर भाजपा/आरएसएस को हराने के लिए नितीश कुमार ने हाथ मिलाया। आज उसी लालू यादव की पार्टी वैचारिक आधार पर लड़ने के बजाय अपने विरोधियों पर निजी हमले कर रही है। उसकी जाति खोज रही है। उन पत्रकारों की भी जाति खोज रही है जो रिपोर्टिंग कर रहे हैं। ये सब देख कर लालू दुखी ही होंंगे।

लालू एक पर्सनैलिटी कल्ट हैं। एक हिरोईज़्म उनके भीतर रहा है। वो हमेशा पार्टी से बड़े नेता रहे। वो पार्टी की संरचना या उसकी मज़बूती की वजह से नहीं जीतते थे। उनका अपना करिश्मा था उनकी अपनी शैली थी। लालू ने एक सपना दिया था उस सपने को सच होता हुआ दिखाया भी। किसी पत्थर तोड़ने वाली को टिकट दे देना साधारण से साधारण कार्यकर्ता को उसके नाम से बुलाना। न जाने ऐसी कितनी है कहानियाँ जो मिथ में तब्दील हो गई हैं।

हर बड़ा नेता एक सपना देता है लोगों को जीने की नई उम्मीद देता है। आज फिर से लोग सपना देखना चाहते हैं। बहुत छोटे छोटे सपने-बच्चों को गुणवत्तापूर्ण और मुफ्त शिक्षा मिले, जब बीमार पड़े तो ईलाज हो जाए, वो इतने पैसे कमा सकें कि ठाक से घर परिवार चला सकें। इससे ज्यादा की उम्मीद भला कोई क्या करता है। लेकिन पिछले 25 सालों की सामाजिक न्याय वाली सरकारों ने ये सुनिश्चित किया है क्या? कथित सवर्ण लोगों ने तो अपने बच्चों को निजी स्कूल में भेज दिया वो अपने लिए सक्षम हैं। जिनके नाम पर आप शासन करते रहे फिर भी उनका भला किया क्या? अब अगर कोई उनको ये सब सपने देखने के लिए कह रहा तो क्या बुरा है इसमें। आप उसको खदेड़ देंगे।

लालू ने जातिवाद और साम्प्रदायिकता को लेकर खुल कर काम किया। ये उनके रणनीति का हिस्सा नहीं विचार का हिस्सा रहा है। मुख्यमंत्री रहते हुए प्रशासनिक स्तर पर लालू ने जातिवाद और साम्प्रदायिकता से पूरी चुनौती दे उसे नियंत्रित किया। देश भी इसका कोई नज़ीर नहीं मिलता। प्रशासनिक स्तर पर जिस तरह का काम हुआ उस तरह से ज़मीन पर नहीं हुआ। राजद अपने काडरों के बीच में इस सोच को नहीं ले जासका।

लालू की अपनी जाति के लोगों को लगा कि अब वक्त आगया है अपना भी शासन हो। लालू के दूसरे कार्यकाल में साधू यादव को नेतृत्व में वो दबंगई चालू हुई। इसी के साथ वो सपना बिखरने लगता है जो लालू ने लोगों को दिखाया था। ज़मीन पर लोगों के बीज जातिवाद और साम्प्रदायिकता पर कोई बहस नहीं हुई। एक अवसर था जो हाथ से फिसल गया। ये विचार नेता और उसकी पार्टी से होकर काडर और वोटर तक जाना चाहिए था जो नहीं हो सका। ऐसा हुआ होता तो यादवों का एक बड़ा तबक़ा लालू को अपना नेता मानते हुए भी भाजपा में नहीं जाता। जाति के नाम पर दलितों का शोषण नहीं होता।

लालू अब जबकि राजनीति से लगभग संन्यास की मुद्रा में है तब उनका उत्तराधिकार कौन लेगा? राजद ने आधिकारिक रूप से तेजस्वी को अपना नेता घोषित किया है। लेकिन कुछ सवाल भी है। वे राजद के नेता हैं या लालू के उत्तराधिकारी या जनता के नेता? लालू के परिवार के भीतर ही दो और लोग हैं जो उत्तराधिकारी हो सकते थे। दबंद यादवों का एक बड़ा तबक़ा तेजप्रताप को अपना नेता मानता है। अगर परिवार में ही किसी को बागडोर देनी थी फिर मीसा भारती सबसे योग्य उम्मीदवार थी। पप्पू यादव ने भी लालू के लिए बहुत काम किया था लेकिन किसी को भ्रम नहीं था कि उनको कुछ मिलेगा। एक नेता के रूप में तेजस्वी की अच्छी पैकेजिंग की गई। दिल्ली में रहने वाले बोद्धिक गिरोह ने तेजस्वी को लपक लिया। राजद जितना बिहार में आंदोलन करती है उससे कम दिल्ली में नहीं करती। ये लोग तेजस्वी को जनता का नेता नहीं बौद्धिकों का नेता बना रही है। अपने समाज के बौद्धिकों के गिरफ्त में आ गए। उन क्रांतिवीरों की सारी क्रांतिकारिता एक अदद नौकरी का जुगाड़ कर लेने भर की ही।

लालू की असली विरासत जो किसी भी जननेता की विरासत हो सकती है वो है एक बेहतर कल का सपना। जो है उससे बेहतर की उम्मीद। सभी की बुनियादी ज़रूरतें पूरी हो। धर्म-जाति के नाम पर शोषण न हो। किसी की जाति में उसे रिड्यूस नहीं कर दिया जाए, जो रोहित वेमुला को साथ हुआ आज किसी और के साथ हो रहा है, कल किसी और के साथ होगा।

कन्हैया को लेकर जिस तरह का विरोध हो रहा है या जिस प्रकार से घृणा का माहौल राजद समर्थकों या कार्यकर्ताओं द्वारा बनाया जा रहा है वह अभूतपूर्व है। ऐसी घृणा कुछ कथित उच्च जाति के लोगों के मन में लालू यादव के लिए रहा है। जिस जातिगत घृणा का विरोध लालू समर्थकों को करनी चाहिए थी आज वो उसी का शिकार है। यादववाद आप करें और दूसरों पर ‘भूमिहारवाद’ का आरोप लगाएँ।

रवीश कुमार ने कन्हैया कुमार की रिपोर्टिंग क्या कर दी वो जातिवादी हो गया। अब तक वही जातिवादी रवीश कुमार आपका हितैशी था क्यों वो आपको जगह देता था। आपकी लड़ाई में वही शामिल था। कन्हैया के बहाने राजद समर्थकों का जातिवाद नंगा हो गया है। जिस जातिवादी नज़रिए से वो विरोध करते रहे आप भी कीजिए। बाकी सामाजिक न्याय का मर्सिया आप ही पढ़ेंगें। आप ही उसकी क़ब्र खोदेंगे।

1 COMMENTS

  1. शानदार लेख। हालांकि मैं कन्हैया का समर्थक नहीं हूं लेकिन कुछ दम-खम तो है इस लड़के में। खुद मैं भी भूमिहार हूं।

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