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सरकार मेहरबान तो बाबा पहलवान, किसान बेशक रहे परेशान

योग को घर-घर पहुंचाते हुए योग गुरु रामदेव न केवल योग के, बल्कि मैंगो कैैंडी से लेकर नूडल्स, बिस्किट, कपड़ों और आयुर्वेदिक दवाओं के व्यापारी भी बन गए। बहुत जल्द उन्होंने अपने व्यापार को करोड़ों के टर्नओव्हर तक पहुंचा दिया है। देश की कई जानी-मानी हस्तियों के साथ वे योग और राजनीति का मंच साझा करते दिखते हैं। और उनके हंसते चेहरे के साथ पतंजलि के उत्पादों के विज्ञापन टीवी चैनलों में सुर्खियां प्रायोजित करते हैं। इस देश ने धर्म, राजनीति, समाजसेवा, कला, शिक्षा, चिकित्सा, सबको कारोबार में तब्दील होते देखा था, अब योग का कारोबार भी देख रही है। अपनी सफलता से उत्साहित रामदेव ने 2017 में कहा था, कि बिक्री के आंकड़े बहुराष्ट्रीय कंपनियों को कपालभाति करने को मजबूर कर देंगे।

कपालभाति एक तरह का प्राणायाम ही है, जिसमें सांस छोड़ते हुए पेट को अंदर की ओर खींचा जाता है। बहरहाल रामदेव ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों को कपालभाति करवाया या खुद ही उनके साथ अनुलोम-विलोम करने लगे, ये तो पता नहीं अलबत्ता उनकी व्यापारिक नीतियों और सत्ता की मेहरबानी से किसान जरूर कपालभाति करने पर मजबूर हो रहे हैं। सूखा, कर्ज, उचित समर्थन मूल्य का न मिलना ऐसी तमाम समस्याओं से जूझते हुए उनके पेट पहले ही भीतर तक धंस चुके हैं और सांसें जीवन का साथ छोड़ चुकी हैं, ऐसे मेंं अब किसानों के जले पर महाराष्ट्र सरकार ने नमक छिड़का है। ख़बर है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने बाबा रामदेव को लातूर में सोयाबीन प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करने के लिए मौजूदा बाज़ार दर से आधी कीमत पर यानी 50 प्रतिशत की छूट के साथ 4 सौ एकड़ जमीन मुहैया कराने का प्रस्ताव दिया है।

मुंबई मिरर की खबर के अनुसार, मुख्यमंत्री ने खुद रामदेव को पत्र लिखकर यह प्रस्ताव दिया है। गौरतलब है कि नांदेड़ में 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस कार्यक्रम में रामदेव और फड़नवीस ने एक साथ मंच साझा किया था और उसके एक हफ़्ते बाद ही यह प्रस्ताव रामदेव को मिल गया। फड़नवीस ने रामदेव को ख़त में लिखा है कि सोयाबीन प्रोसेसिंग यूनिट से न केवल किसानों को उनकी फसल की अच्छी कीमत मिलेगी, बल्कि इससे रोज़गार के अवसर भी पैदा होंगे। साथ ही कहा गया है कि यह प्रस्ताव राज्य सरकार की सूक्ष्म, छोटे और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) को प्रोत्साहित करने की नई नीति का हिस्सा है।

ज़मीन पर 50 प्रतिशत की छूट के साथ ही फड़नवीस सरकार ने स्टैंप ड्यूटी हटाने, रामदेव द्वारा अदा की जाने वाली जीएसटी लौटाने के अलावा एक रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली बिल का भुगतान जैसी सहूलियतों का भी प्रस्ताव रखा है। इतनी मेहरबानी करने के पीछे मक़सद क्या है, इसकी पड़ताल अवश्य होनी चाहिए, क्योंकि करीब तीन साल पहले भी फड़नवीस सरकार ने नागपुर में पतंजलि फ़ूड और हर्बल पार्क के लिए इसी तरह रामदेव को मामूली कीमत पर 230 एकड़ ज़मीन मुहैया कराई थी।

हालांकि अब तक फ़ूड पार्क मैन्युफैक्चरिंग यूनिट शुरू होने के कोई संकेत नहीं मिल रहे हैं। खास बात यह है कि लातूर के औसा तालुके में जो ज़मीन रामदेव को कौड़ियों के भाव देने का प्रस्ताव दिया गया है, वह भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) फैक्ट्री के लिए 2013 में किसानों से अधिग्रहीत की गई थी। तब किसानों से नौकरी का वादा किया गया था। किसानों ने भी एक राष्ट्रीय परियोजना के लिए ज़मीन छोड़ी थी, जैसे वे देश भर में छोड़ते रहे हैं। लेकिन अब उस ज़मीन पर एक निजी उद्योग की तैयारी से किसान फिर छला हुआ महसूस कर रहे हैं। किसानों के मुताबिक उन्हें साढ़े तीन लाख रुपये प्रति एकड़ की दर से भुगतान किया गया, जबकि वर्तमान समय में ज़मीन की कीमत 45 लाख रुपये प्रति एकड़ है। अपनी ज़मीन भेल के लिए देने वाले किसानों को यह भी नहीं मालूम कि उन्हें निजी कारखाने में नौकरी मिलेगी या नहीं, या मिलेगी तो किन शर्तों के साथ।

महाराष्ट्र में बीते कुछ वर्षों में कई बार किसान आंदोलन हुए, जो यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि वहां किसान किस दुर्दशा में खेती कर रहे हैं। विधानसभा में भाजपा सरकार के आंकड़े हैं कि 2015 से 2018 तक कम से कम 12021 किसानों ने आत्महत्या की, यानि हर रोज़ आठ किसानों ने मौत को गले लगाया। इसके बाद भी फड़नवीस सरकार लघु उद्योगों को प्रोत्साहित करने के नाम पर दिग्गज उद्योगपति पर कृपा बरसा रही है। अगर इतनी सहृदयता किसानों के साथ दिखाई जाए, तो खेती भी बचेगी, लघु उद्योग भी बढ़ेंगे और किसान भी ज़िंदा रहेंगे। सरकार को भी खेद प्रदर्शन और आत्महंता के परिजनों को मुआवजा देने की जहमत नहीं उठानी पड़ेगी। लेकिन इससे उद्योगपति करोड़ों के कारोबार को अरबों-खरबों तक कैसे पहुंचाएंगे, शायद यह चिंता सरकार को है, इसलिए मेहरबानी जारी है।
(साभार देशबन्धु )

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