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चौधरी छोटूराम: जिसने आज़ादी से पहले किसान-मज़दूरों के कदमों में सारे हक़ लाकर रख दिए थे

राकेश सांगवान

“ खुदा के बन्दे हजारों देखें , बणों में फिरते मारे-मारे
मैं तो उसका बंदा बनूँगा जिसको खुदा के बन्दों से होता प्यार “

सैंट स्टीफन स्कूल (दिल्ली) के हॉस्टल में करीब 24 देहाती परिवेश के बच्चे रहते थे। हरियाणा(उस समय पंजाब) के गढ़ी सांपला गांव के किसान के बेटे को इन बच्चों का मॉनिटर बनाया गया। होस्टल का सफाई कर्मचारी हॉस्टल की सफाई के बजाए अधीक्षक (पंडित जानकी नाथ) के घर पर काम करता रहता था और होस्टल में देहाती परिवेश के छात्रों को जरूरी सुविधाओं से वंचित रखा गया था। उसको यह नागवारा थी, उन्होंने यह बात प्रिंसिपल के संज्ञान में लाई और सभी सहपाठियों से इस अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने को कहा। सभी विद्यार्थियों ने हड़ताल कर दी जो पंद्रह दिन तक चली। हड़ताल से विवश होकर प्रिंसिपल केली (Kelly) ने सभी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध करवाईं और सफाई कर्मचारी को निर्देश दिया कि वह मॉनिटर की आज्ञा का पालन करे। उसके ऐसे साहस के कारण उनके सहपाठी उन्हें “ जनरल रॉबर्ट “ कह कर बुलाते थे। उस जनरल रॉबर्ट का नाम था चौधरी छोटूराम।

चौधरी छोटूराम पर तरह-तरह के इलाज्म लगाये जाते रहे , कोई उन्हें घोर साम्प्रदायिक बताता तो कोई कुछ। पर उनका कहना बड़ा साफ़ था कि “ मैं सांप्रदायिक नहीं हूँ , न मैं हिन्दू के हक़ के लिए और न मुस्लिम के हक़ लिए लड़ रहा हूँ , मैं लड़ रहा हूँ सिर्फ किसान, मजलूम, पिछड़ों के हक़ के लिए। मेरा पंथ सामान्य धर्मनिरपेक्ष और आर्थिक आधार पर टिका है। साल 1939, एक जनसभा का संबोधित करते हुए चौधरी छोटूराम ने कहा था कि “ इस देश में नो करोड़ मुस्लिम हैं, यह नामुमकिन है कि हिंदू उन्हें इस देश से बाहर निकाल दें, या मुस्लिम हिंदूओं को ख़त्म कर दें। इसलिए आपसी नफरत को भुला कर , हमें भाईचारे की मिसाल देते हुए मिलकर देश की आज़ादी व आर्थिक समृधि के लिए काम करना चाहिए “ ।

चौधरी छोटूराम एक बहुत दूरदर्शी व सच्चे राष्ट्रवादी हस्ती थे। उन्होंने पंजाब के हर तबके के उत्थान के लिए काम किया, कानून बनाए। पंजाब में दलित तबके के सामाजिक उत्थान के लिए छुआ-छूत कानून बनाया। हिसार के मोठ गाँव में जाट व रांगड़ो ने चमारों को कुँए से पानी भरने से मना कर दिया जिसके लिए वह खुद मोठ गाँव गए और वहां जाटों व रांगड़ो को समझाया और खुद कुँए से पानी भरवा कर चमार के सर पर घड़ा रखा। मजलूमों-मजदूरों के लिए उन्होंने कई कानून बनाए। कानून बना कर बेगार ख़त्म की, कार्य के घंटे तय किये, न्यूनतम भत्ता तय किया। पंजाब में मजलूम भूमिहीनों को मुलतान-निलिबार में में कृषि भूमि अलोट कर उन्हें ज़मींदार बनाया। पूरे देश में यह पहला ऐसा वाक्या था जहाँ भूमिहीनों को कृषि भूमि अलोट की गई थी। अछूतों को शिक्षा संस्थानों व नौकरियों में आरक्षण व वजीफों का प्रावधान किया।

पंजाबियों की आर्थिक हालातों में सुधार का जो सबसे पहला प्रयास उन्होंने किया वह था पंजाबियों को फौज में भर्ती का आह्वान। उनके इस प्रयास का असर यह हुआ कि देहात के जो पंजाबी फौज में भर्ती हुए उससे सालाना 4-5 करोड़ की आमदनी बढ़ी जोकि उस वक्त पंजाब के लैंड-रेवेनुए के बराबर थी।

कृषि व किसानों के हालातों के सुधार के अनेक कानून बनाए। कृषि सिंचाई के लिए कई परियोजनाएं शुरू की। 1927 में सदन में थल परियोजना का प्रस्ताव रखा। खरीफ नहरें विस्तार योजना (1940), हवेली परियोजना 1939, दो गैर बारहमासी नहरें , हिसार व रोहतक जिलों के लिए (1941 -42), पश्चिमी पंजाब में सिंचाई की संभावनाएं देखने के लिए 1943-44 में एक डिविजन का गठन किया। साल 1943 में गुडगाँव जिले में बंद सिंचाई को पुनर्जीवित किया, नई योजना, टयूब-वेल सिंचाई व लिफ्ट सिंचाई सिस्टम, पश्चिमी युमना नहर से सिंचाई। साल 1944 में सिंध व बिलासपुर सरकारों से सभी बाधाएं दूर कर 8 जनवरी 1945 यानि ठीक उनके निर्वाण दिवस से एक रात पहले भाखड़ा बाँध परियोजना की फाइल पर अपने दस्तखत किये। पर ये अफ़सोस है कि भाखड़ा बाँध पर उनका न कोई नाम न कोई उन्हें याद करता है।

ये पहलु आजतक अछूता है कि पंजाब में उद्द्योग के लिए चौधरी छोटूराम ने जो नीतियाँ बनाई वह सिर्फ पंजाब ही नहीं देश के विकास में मील का पत्थर साबित हुई। उन्होंने पंजाब के भविष्य को देखते हुए उद्द्योग लगाने पर जोर दिया। इसके लिए उन्होंने एक इकबाल का शेर कहा था कि
“ वतन की फ़िक्र कर नादान मुसीबत आने वाली है
तेरी बर्बादियों के मश्वरे हैं आसमानों में
न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिंदुस्तान वालों
तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में “

1938 में चौधरी छोटूराम ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया कि विदेशी मुल्कों के साथ प्रतिस्पर्धा कम करने के लिए, पंजाबी औधोगिक प्रगति के हित में, औद्योगिक और उपभोगताओं को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए। पंजाब में कुटीर व छोटे उद्योगों के लिए व्यापक योजना बनाने के लिए उन्होंने उस ज़माने के जानेमाने अर्थशास्त्री के.टी.शाह को इसका जिम्मा दिया। पंजाब में उद्योगों के विकास के लिए 1938-39 में उन्होंने कुछ लोग विदेशों में ट्रेनिंग के लिए भेजे, इसके लिए 10000 का बजट रखा। पंजाब में ‘ इंडस्ट्रियल रिसर्च फण्ड ‘ गठन किया, जोकि पूरे देश में यह पहली पहल थी, इसके लिए 150000 अलग से फंड का प्रबंध किया।

चौधरी छोटूराम की उद्योग नीतियों व प्रयासों का उस दौर में खूब सराहना हुई। सिविल एंड मिलिट्री गजट ने लिखा था कि ‘ यह भारत के आधुनिक आर्थिक इतिहास में अग्रणी उपाय हैं ‘। उड़ीसा के प्रीमियर श्री बिस्वा नाथ ने दिसम्बर 1937 , द-ट्रिब्यून अख़बार को एक व्यक्तय दिया था कि औद्योगिक विकास में पंजाब उन प्रान्तों से भी आगे निकल गया है जिनमें कांग्रेस की सरकार है। ऐसा ही व्यक्तय बॉम्बे के उद्योग मंत्री श्री एल.एम्.पाटिल ने दिया था कि पंजाब की यूनियनिस्ट सरकार ने इस दिशा में सराहनीय उल्लेखनीय काम किया है।

जब हम आगरा से आगे निकलते हैं तो चौधरी छोटूराम द्वारा उस दौर में संयुक्त पंजाब में रखी विकास की बुनियाद का अंदाजा हो जाता है। आज भी आगरा से आगे और हरियाणा-पंजाब के कृषि और किसान के हालात में फर्क खुद ही सब बयान करते हैं। मैं अक्सर यूपी-बिहार-बंगाल-उड़ीसा-झारखण्ड-मध्यप्रदेश से यहाँ हरियाणा पंजाब में मजदूरी करने आने वालो से पूछता हूँ कि जब आपके यहाँ इतने उद्योग हैं तो फिर आप अपना घर-बार छोड़ इतनी दूर मजदूरी करने क्यों आते हैं ? सबका जवाब होता है कि साहब वहां इतनी मजदूरी नहीं मिलती। उनकी बात भी सही है मैंने खुद अभी दो साल पहले कानपुर में देखा कि गुडगाँव में कॉल-सेण्टर में नौकरी करने वाले को जहाँ कम से कम आठ हजार रूपये मिलते हैं वही कानपुर में 4-5 हजार रूपये मिलते हैं। ऐसे ही 1999 में मैंने रायपुर (छात्तिश्गढ़) के पास खेती की ज़मीन ली थी, वहां उस वक्त खेती-मजदुर मात्र 18 रूपये दिहाड़ी पर मिल जाता था जबकि हरियाणा में उस वक्त 90 रूपये दिहाड़ी थी।

चौधरी छोटूराम भ्रष्टाचार व शोषण को लेकर बड़े सख्त थे। इसके लिए उन्होंने जाट गजट व द-ट्रिब्यून ‘ ठगी बाजार की सैर ‘ , ‘ बेचारा ज़मींदार ‘ नाम से धारावाहिक लेख निकाले थे।

चौधरी छोटूराम की इन सब उपलब्धियों पर मद्रास के मुख्यमंत्री सी.राजगोपालचारी ने कहा था कि चौधरी छोटूराम ने पंजाब के विकास के जो कार्य किया हैं उन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता। चौधरी छोटूराम का सिर्फ उद्देश्य ही बड़ा नहीं था, ख़ास बात ये थी कि उन्हें यह भी पता था कि इसे हासिल कैसे करना है।

जानेमाने साहित्यकार खुशवंत सिंह ने लिखा था कि ‘ छोटूराम के बारे में कुछ भी छोटा नहीं था। वह बिना किसी विरोधाभास के एक बहुत बड़ा नाम है ‘।

नेशनल यूनियनिस्ट ज़मींदार पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री बी.डी.अग्रवाल जी अक्सर कहते हैं कि ‘ चौधरी छोटूराम ने जो काम किये उनको सही तरीके से पेश नहीं किया गया। वो एक बहुत बड़े विद्धवान व दूरदर्शी इन्सान थे, जिसने हर तबके के विकास के लिए काम किया। पर उनका नाम एक देहाती सा नाम है छोटूराम इसलिए लोग सोचते हैं कि ऐसे ही देहाती सा आदमी होगा कोई। यदि उनका नाम छोटूराम की जगह कोई रोबर्ट्स जैसा कुछ होता तो आज उनके नाम और काम की चर्चा पूरे विश्व में हो रही होती ‘।

बसंत पंचमी यानि सर छोटूराम जयंती पर रहबर चौधरी सर छोटूराम उर्फ़ जनरल रोबर्ट्स को शत-शत नमन।

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