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कॉमरेड आर. बी. मोरे: वह नेता जिसे डॉ आंबेडकर सच्चा कम्युनिस्ट मानते थे

कॉमरेड आर. बी. मोरे के बारे में मुझे अभी दो-चार दिन पहले सुभाष गाताडे की किताब चार्वाक के वारिस पढ़ते हुए पता चला। गाताडे ने उन्हें कम्युनिस्ट आंदोलन की उन ज़रूरी आवाज़ों के रूप में याद किया है जो मार्क्सवादी नजरिये को जाति विरोधी कार्यक्रम के साथ जोड़ने की कोशिश के तौर पर उठ रही थीं।

1 मार्च 1903 को जन्म्मे कॉमरेड आर. बी. मोरे का डॉ. भीमराव आंबेडकर के साथ गहरा रिश्ता था। चार्वाक के वारिसमें कॉ. मोरे के उस ऐतिहासिक पत्र अस्मपृश्यता की समस्या और जाति प्रथा के एक हिस्से को उद्धृत किया गया है जो उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो को लिखा था और जिसमें आंबेडकर का जिक्र दमित तबकों के मसीहा के रूप में किया गया है।

अस्पृश्यता की परिघटना को सामंती परिघटना कहते हुए विश्लेषित करना काफी नहीं है। हमें भारतीय सामंतवाद की अलग विशिष्टताओं का अध्ययन करना होगा और उन्हें विश्लेषित करना होगा। वर्णाश्रम व्यवस्था और जातिप्रथा भारतीय सामंतवाद की खास विशिष्टताएं हैं। दुनिया में कहीं भी उनको देखा जा सकता है...।

हम लोगों ने अभी भी वर्ण हिन्दू सर्वहारा की पुरानी मध्ययुगीन वर्ण हिन्दू चेतना के ख़िलाफ़ संघर्ष करने की आवश्यकता को पहचाना भी नहीं है। वर्ण हिंन्दू कामगार अभी भी यही सोचता है कि वह सबसे पहले मराठा या ब्राह्मण है औऱ बाद में कामगार है। वर्ग चेतना की तुलना में जाति चेतना अधिक ताकतवर दिखाई देती है। यह जाति चेतना वह बड़ी बाधा है जो हमारे मज़दूर वर्ग में सर्वहारा की वर्ग चेतना के विकास को बाधित कर रही है। ..

अब जहां तक अस्पृश्यता के ख़िलाफ़ संघर्ष का सवाल है तो डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर की भूमिका सबसे अधिक लड़ाकू और सबसे अधिक समझौताविहीन दिखती है। उन्होंने ही अकेले इस बात को रेखांकित किया कि अस्पृश्यता की जड़ में वर्ण व्यवस्था और जाति प्रथा है, जिसे पूरी तरह जड़-मूल से ख़त्म करना होगा। उन्होंने बेहद निर्ममता के साथ सभी पुराने हिन्दू धर्मग्रन्थों पर हमला किया और इसमें कोई भी आश्चर्य नहीं जान पड़ता कि वह आज अस्पृश्यों के सबसे दमित तबकों के लिए एक किस्म के मसीहा हैं।

कॉमरेड आर..बी. मोरे के जन्मदिन पर सोशल मीडिया पर वायरल सामग्री जो संभवत: शेखर नाग की पोस्ट है, में उनके कुछ महत्वपूर्ण कामों का उल्लेख किया गया है। मोरे महाड चवदार तालाब के ऐतिहासिक सत्याग्रह के प्रमुख संघठक थे। डॉ. आंबेडकर की अगुआई में 1927 में हुए इस सत्याग्रह से पहले से ही इस मसले पर आंदोलनरत डॉ. मोरे उन लोगों में से थे जिन्होंने डॉ. आंबेडकर से इस मसेल पर हस्तक्षेप का अनुरोध किया था।

उन्होंने 1930 मे मुंबई के मजदूरों के बीच काम करना शुरू किया। मोरे कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए पर दिलचस्प यह है कि इसके लिए उन्होंने डॉ. आंबेडकर से विचार-विमर्श किया बल्कि कहें कि उनकी अनुमति से ही कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता हासिल की।

कॉमरेड आर..बी. मोरे ने कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल होने के बाद महाराष्ट्र के कोंकण इलाके मे किसानों के शोषण को लेकर काम किया। वहां स्थापित किए गए किसान संगठन के वे सेक्रेट्री थे।

उन्होंने मज़दूर, किसान और अछूतों की समस्या पर जनचेतना जागृत करने के लिए 1930 मे ही आह्वान पत्रिका निकाली। वे डॉ. आंबेडकर की “जनता” पत्रिका में भी लिखते थे। इससे पहले डॉ. आंबेडकर के “बहिष्कृत भारत” के संपादन मे भी उनका योगदान था। 1956.मे डॉ. आंबेडकर ने हिंदू धर्म छोडकर बौद्ध धम्म अपनाया, तो मोरे ने उनका समर्थन किया था। आंबेडकर से उनका लगातार निकट का रिश्ता रहा।

1931 मे तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने आह्वान पत्रिका को देशद्रोह का झूठा इल्ज़ाम लगाकर प्रतिबंधित कर दिया और कॉमरेड मोरे को मुंबई थाना और कुलाबा जिला से तडीपार कर दिया गया लेकिन वे अंडरग्राउंड रहकर काम करते रहे।

लखनऊ मे 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा के पहले स्थापना सम्मेलन में भी कॉमरेड आर बी.मोरे महाराष्ट्र की तरफ से संस्थापक सदस्य की हैसियत से उपस्थित हुए।

1940 के दशक मे उन्होने महाराष्ट्र, कर्नाटक, आगरा, झांसी मे सफ़ाई कामगार समाज के मजदूरों के शोषण के विरोध मे संगठन खड़ा किया। वे 1945 में भारतीय मजदूरों के प्रतिनिधि के तौर पर पेरिस में अंतर्राष्ट्रीय मजदूर सम्मेलन मे शामिल हुए। उन्होंने पहली बार उस सम्मेलन मे भारत में अछूतों के साथ होने वाले भेदभाव की बात उठाई।

उनके वक्तव्य का विषय था- भारत में शोषित-अछूत वर्ग को कैसे सामाजिक भेदभाव का सामना करते हुए अमानवीय जीवन जीना पडता है

कॉमरेड आर..बी. मोरे महाराष्ट्र के मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के साप्ताहिक जीवनमार्ग के संस्थापक संपादक थे। राहुल सांकृत्यायन ने 1945 में अपनी किताब नये भारत के नये नेता में कॉमरेड मोरे का उल्लेख “नये भारत का नेता` कहकर किया था। उनका निधन 11 मई 1972 को हुआ।

कॉमरेड आर..बी. मोरे ने अपने परिवार के सदस्यों को भी वामपंथ की शिक्षा दी। उनके पुत्र कॉमरेड सतेन्द्र मोरे भी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के आजीवन सदस्य रहे और मुंबई के धारावी क्षेत्र से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर विधायक भी निर्वाचित हुए।

आर. बी. मोरे के पौत्र कॉमरेड सुबोध मोरे भी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता हैं। जन संघर्ष और आंदोलन में बौद्धिक योदगदान में उनकी उल्लेखनीय भागीदारी है।

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