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रिपोर्ट

हर बार की तरह क्या इस बार भी किसान बस चुनावी मुद्दा बनकर रह जाएगा?

लोकसभा चुनाव के इस दौर में एक चर्चा आमतौर पर चली हुई है कि 5 एकड़ से कम जमीन पर खेती करने वाले किसानों 6000 रुपये वार्षिक पेंशन दी जा रही है। कुछ किसानों के बैंक खातों में 2000 रुपये की पहली किश्त आ भी गई हैं। सब लोगों को ये देखकर बहुत अच्छा लगता है कि किसानों की बहुत अच्छा हो रहा मगर किसी भी पार्टी की कोई भी सरकार रही हो वो किसान की मूलभूत आवश्यकताओं के हिसाब से असली समस्य को समझ नहीं पाई।

कर्ज माफी भी एक राहत है पर कोई स्थाई हल नहीं है। घाटे का सौदा बनती जा रही खेती किसान को दोबारा से कर्जदार बना देगी। अगर 6000 वार्षिक पेंशन की बात करें तो एक दिन के 17 रुपये से भी कम बैठते हैं और कोई भी समझदार व्यक्ति ये जानता है कि 4 सदस्यों के परिवार में 17 रुपये की क्या अहमियत है। वैसे भी इसका लाभ बेहद कम लोगों तक पहुंंचेगा। आमतौर पर राजस्थान, मध्यप्रदेश, बुंदेलखंड, महराष्ट्र के हर दम सूखाग्रस्त इलाकों में जमीन एक बड़े किसान वर्ग के पास 5 एकड़ से जमीन ज्यादा है मगर पानी की कमी के कारण सारी जमीन यू ही बंजर पड़ी रहती है।

 पिछले बीस सालों में कांग्रेस और भाजपा ने बराबर बराबर देश पर राज किया, पर अफसोस कि कोई भी सरकार किसानों की मुश्किल की असल जड़ नही ढूंढ पाई। पिछले कई सालों में बढ़ती मंहगाई के हिसाब से फसलों का लाभकारी मूल्य नहीं मिलने से किसान लगातर कर्जदार हो रहे हैं। एक बार मनमोहन सरकार ने भी किसानों का कर्जा कुछ शर्तों के साथ माफ किया था, जिसमें बेहद कम किसान उस कैटेगरी में आ सके। मगर फिर दोबारा से किसान उसी कर्ज में डूब गए। खादों पर मिलने वाली सब्सिडी अब या तो बेहद कम हो गई हैं या खत्म हो चुकी है, इन मे यूरिया, डी ऐ पी, पोटाश जैसी महत्वपूर्ण खाद भी शामिल हैं। इसके साथ फसलों में इस्तेमाल होने वाली कीटनाशक, खतपतवार नाशक, फफूंदी नाशक दवाओं की दाम कई गुना बढ़े हैं। ऊपर से बाजार में नकली दवाओं की आमद भी बहुत ज्यादा है, जिससे खेती को तो नुकसान है ही है वही पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य को भी नुकसान है।

लगभग 3 साल पहले पंजाब में कपास की फसल पर नकली दवाओं के प्रयोग के कारण पूरे मालवा क्षेत्र की कपास की फसल खराब हो गई, नतीजतन उसे खेत मे ही नष्ट करना पड़ा और कई किसान कर्ज में डूबे और कई किसानों ने आत्महत्या तक कर ली। खेती में सबसे ज्यादा डीजल इस्तेमाल होता है और पिछले कई सालों से डीजल के दाम आसमान पर पहुंंच गए। अब इन सब कारणों की वजह से प्रति एकड़ खर्चा कई गुना बढ़ गया है। अब मुनाफे और लागत में बेहद मामूली अंतर बचा है।

 इसके अलावा फसलों का मंडीकरण बेहद खराब रहा है भारत में। कुछ फसलों का न्यूनतम दाम सरकार तय करती हैं और कुछ की खरीद भी करती है मगर थोड़े इलाके में सिर्फ गेंहू, धान, गन्ने की ही फसलों पर ध्यान होता है। धान की भी कई किस्म निर्यात पोलिसी पर ही निभर्र करती है जिसमें हमारी बासमती की किस्में आ जाती हैं, इन पर निजी खरीद वाले किसान को खूब लूटते हैं और पेमेंट में भी भारी दिक्कत होती है। उत्तर भारत के गन्ना किसानों को मीलों को बेचे हुए गन्ने की पेमेंट एक एक साल तक नहीं मिलती। कई बार आंदोलन कर तो कई बार कोर्ट केस कर के अपने बेचे गन्ने की पेमेंट हासिल होती है।पिछले साल वेस्ट यूपी में इसी तरह ही अटकी हुई गन्ना पेमेंट को लेकर कई आंदोलन हो चुके है। आप ही बताये बिना पेमेंट के किसान कैसे घर चलाये? 

सब्जी किसानों को पिछले 3 साल साल से मार पड़ रही है। दाम बेहद नीचे हैं। एक किलो आलू को पैदा करने के 5 से 7 रुपए खर्च बैठता मगर किसान को मंडी में ये भी दाम नहीं मिलता जबकि ग्राहक को वही आलू 29 रुपये प्रति किलो मिल रहा होता हैःः इसी तरह मटर, टमाटर, लहसुन, प्याज किसानों का भी हाल है। कई बार तो फसल मंडी तक लाने में लगे भाड़े की लागत भी सब्जी बेच कर नहीं निकलती। कुछ लोग बताते हैं कि सब्जी किसानों पर सबसे ज्यादा मार नोटबन्दी और जीएसटी से पड़ी। पहले सब्जी मंडी में बहुत सारे छोटे छोटे व्यपारी होते थे जो 10 लाख , 20 लाख जैसी रकमो का नकद में काम करते थे, जिससे सब्जी मंडी आपस बाजार गर्म रहता था और किसान को फायदा होता था। मगर अब सिर्फ बड़े व्यपारी या बड़ी कम्पनियां ही बाजार में हैं, जो दिल खोलकर किसानों का शोषण करती है।

भारत की लगभग 70% आबादी गाँव मे रहती है और ये भारतीय बाजार के बहुत बड़े ग्राहक हैं। गाँव के लोग मॉल में ना जाकर आम छोटे दुकानदारों से खरीद करते हैं। गाव की आबादी किसान और खेती मजदूर और उनसे जुड़े सहायक धंधों वाले लोग हैं जिन का सब कुछ खेती से किसी ना किसी तरह सबंध जुड़ा होता है। किसान की फसल का बड़ा हिस्सा दवाओं, खाद और डीजल की बड़ी कम्पनियों के पास चला जाता है, ऊपर से नकली दवाओं और समय पर पेमेंट ना मिलने से कर्जदार किसान बाजार में क्या खरीदारी करेगा। इससे बाजार भी खत्म होता है। किसान की आमदन बढ़ाने की के लिये अगर कार्य किये जाए तो किसान खुद ही समृद्ध हो जाएगा। मगर इस बात पर कभी कोई भी सरकार ध्यान नहीं देती। बस हर बार की तरह किसान चुनावी मुद्दा बन कर रह जाता है।

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