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बाबा महेंद्र टिकैत पुण्यतिथि विशेष: वह किसान जिनकी हुक्के की गड़गड़ाहट से नेता कांपते थे

आदर्श सिंह तरार

साल 2011, तारीख 15 मई। जब बार-बार आसमान से हेलीकॉप्टर के आने-जाने की आवाज सुनाई देने लगी तो चौपाल मे बैठे एक बाबा बोल उठे,
“दिखे जा लिया टिकैत”

यह सुनते ही चारो तरफ शांति और मेरे रोंगटे खडे हो गए। उस दिन पश्चिमी उत्तरप्रदेश का किसान तो मानो अनाथ सा हो गया, उसकी आवाज चली गई।

आज उनकी पुण्यतिथि है।

उन जैसा ना कोई था और ना होगा
एक अलग ही शख्सियत थे बाबा टिकैत जिनके एक आहवान से लाखों की भीड जुट जाती थी और एक हुंकार से सरकारे हिल जाती थी। उनकी छवि एक अक्खड, ठेट, देहाती किसान नेता की थी, यानी जो जिद पर टिक जाए वो टिकैत।

80 के दशक मे चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की लोकप्रियता और जलवे चरम पर थे। न जाने कितने प्रधानमंत्री किसानों की चौखट पर आने को बाध्य हो गए और किसानों की मांग सुननी पड़ी।

बाबा टिकैत जब भी अपनी पैतृक गांव सिसौली में हुक्के की गड़गड़ाहट के बीच कोई ब्यान जारी करते थे तो लुटियन्स दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में बैठे लोगों को पसीने शुरू हो जाते थे।

उन्होंने अपने घर आए प्रधानमंत्री तक को करवे से पानी पिला दिया।
चाहे भ्रष्टाचार हो या बढी बिजली दरे बाबा टिकैट ने किसानों के साथ हर प्रकार के शोषण को रोका।

जनसमूह पर गोलियां भी चली, लाठीचार्ज भी हुआ। चौधरी टिकैत स्वंय लहुलुहान भी हुए पर हिम्मत नहीं टूटी।

सन 1988 की दिल्ली की उस बोट रैली ने लुटियनस में रहने वाले विद्वानों को हिला दिया था, जब ट्रैक्टर भर-भर हज़ारों नहीं कई लाखों किसानों ने दिल्ली घेर ली, और दिल्ली मे डेरा डाल दिया। तब दिल्ली ही नहीं सरकार के भी पसीने छूट गए। वह रैली आजाद भारत की सबसे बड़ी किसान रैली थी।

चौधरी महेंद्र सिंह टिकैट एक बेहद साधारण और जमीनी किसान नेता थे। उनके भाषण की शैली बिल्कुल आम पर बहुत प्रभावशाली थी। कब प्यार से सरकार को समझाते हुए “ऐसी है बात” बाबा टिकैत गरम हो जाए किसेे मालूम।

उनके भाषण सुनकर किसान जोश से भर जाता था। किसान को लगता था वह भी कुछ है उसकी भी ताकत है। अगर सरकार या प्रशासन कुछ गलत करेगी तो बाबा टिकैत हमारे साथ हैं।

उन्होंने गुर्जर, जाट, दलित, मुसलमानों को उनकी असली जात बताई – “किसान “

उनकी हर रैली मे हर वर्ग, धर्म, जाति का किसान आता था, और अपने हको की लड़ाई लडता था। शायद यही कारण था कि बाबा टिकैट के गुजर जाने के बाद पश्चिम उत्तर प्रदेश पर गिद्धों की नजर आ पडी।

बाबा टिकैट की मौजूदगी मे कोई भगवे बाणे, खाकी कच्छे, या संघी कभी भी पश्चिमी उत्तरप्रदेश मे पैर नहीं पसार सके।

बाबा टिकैट जाट-गुर्जर, मुसलमान, दलित एकता के सूत्रधार थे। जब राजस्थान मे गुर्जर आरक्षण संघर्ष चल रहा था तब टिकैट ने बेझिझक किरोड़ीमल बैंसला जी को अपना समर्थन दे दिया और समर्थन में सिसौली से राजस्थान की तरफ कूच किया था।

वह भी दिन थे जब एक मुसलमानी लडकी का अपहरण हो गया था और बाबा टिकैट ने 20 दिन भोपा नहर पर उस नाबालिग लड़की को इंसाफ दिलाने के लिए आंदोलन किया था। बाबा टिकैट की रैली में मुसलमान भारी संख्या मे होते थे और उनमें बेहद विश्वास रखते थे।

उनकी रैली मे जब मंच से हर-हर महादेव का नारा लगता था, तब भीड से अल्लाह हू अकबर की आवाज आती थी और जब मंच से अल्लाह हू अकबर का नारा लगता था। तब भीड से हर हर महादेव की आवाज आती थी।

कुछ ऐसा माहौल था तब पश्चिमी उत्तरप्रदेश का जाट और मुसलमानों में ऐसा आपसी सौहार्द था। साल 1988 में जब मेरठ में हिन्दू मुस्लिम दंगो के बीच बाबा टिकैत ने कमिश्नरी के घेराव की घोषणा की और साम्प्रदायिक सदभाव के तौर पर उनके नारे अलाह हू अकबर और हर हर महादेव की गूंज ने हिन्दू-मुस्लिम उन्माद में बहे लोगों को उन्हें पहले किसान होने का अहसास करवाया।

पर संघी और भगवा वालों ने सब कुछ लूट लिया। शायद अगर बाबा टिकैट जीवित होते तो ना जलता मुजफ्फरनगर, बाबा अपने स्टाइल से सब ठीक कर देते और न पंचायत में इन संघियो की मंच पर चढने की हिम्मत होती और न सरकार की नजरअंदाज करने की।

बाबा टिकैत का ठेठ ग्रामीण लहजा हमेशा सत्ता को दण्डवत होने को मजबूर कर देता था। अपनी जिंदगी में दर्जनों बार जेल गए बाबा टिकैत ने कभी किसान की पगड़ी को झुकने नहीं दिया।

आज किसान बेबस है गूंगा है, उसकी आवाज जो चली गई।

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