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राजनीति रिपोर्ट

क्या है बहुजन मतदाताओं के मन की बात?

सुशील मानव

उत्तर प्रदेश दलित राजनीति की दृष्टि से देश का सबसे महत्वपूर्ण राज्य है। यही वो प्रदेश है जहां से कोई दलित महिला तीन बार मुख्यमंत्री के पद तक पहुँची। अबकी बार प्रदेश से मायावती को प्रधानमंत्री के पद तक पहुँचाने की बात सपा-बसपा गठबंधन की ओर से की जा रही है। वहीं दलित समाज भी भाजपा द्वारा आरक्षण लाभ के मुद्दे पर पैदा की गई दरार के चलते जाटव-गैरजाटव में स्पष्ट बँटा दिख रहा है। बता दें कि भाजपा लगातार आरक्षण के मुद्दे को उठाकर कहती आई है कि पिछड़ा आरक्षण का सारा लाभ यादवों को और दलित आरक्षण का सारा लाभ जाटव समुदाय के लोगों मिलता रहा है, अतः दलित और पिछड़े वर्ग आरक्षण की समीक्षा करके ऐसा प्रावधान होना चाहिए ताकि आरक्षण का लाभ गैर-जाटवों व गैर-यादवों को मिल सके। इस तरह आरक्षण के मुद्दे पर स्पष्ट विभाजन करके भाजपा गैर-जाटव और गैर-यादव वोटों को अपने पाले में खींचने में कामयाब हुई और यूपी व केंद्र की सत्ता में दो-तिहाई बहुमत के साथ काबिज है।

इंद्रजीत सरोज को बसपा से निकालने से मायावती से नाराज़ हैं पासी मतदाता

पासी वोटर बसपा में इंद्रजीत सरोज को अपना नेता मानता रहा है। इंद्रजीत सरोज बसपा में दूसरी कतार के बड़े नेता थे। मायावती द्वारा उन्हें बसपा से निकाल बाहर करने के चलते पासी वोटर मायावती से नाराज़ है।

फूलपुर लोकसभा सीट के मतदाता गुलाब चंद्र भारतीया कहते हैं- गठबंधन को हमारे समुदाय ने मन से स्वीकृति नहीं दी है। हम गेस्ट हाउस कांड को नहीं भूल सकते। वो कहते हैं मायावती ने सपा से आज इसलिए गठबंधन किया है क्योंकि लोकसभा और फिर विधानसभा में करारी हार के बाद मायावती खुद हाशिये पर चली गई थी।”

गुलाब चंद्र कहते हैं- “मायावती ने इंद्रजीत सरोज, अशोक कुमार रावत, मनीष कुमार रावत जैसे दलित नेताओं और समर्पित पार्टी कार्यकर्ताओं को पार्टी से निकालकर अच्छा नहीं किया। बसपा अपने संघर्ष के दौर के समय के लोगों से पूरी तरह खाली हो चुकी है। दरअसल ये पार्टी भी अब ब्राह्मणों के अधीन हो चुकी है। बसपा अब सतीश मिश्रा के बताए रास्ते पर चल रही है। दलित नेतृत्व को टिकट देने के बजाय बसपा अध्यक्ष पैसे वाले प्रत्याशियों को टिकट बेंच रही है, मानो दलित वोटबैंक उनकी निजी प्रोपर्टी हो। मायावती गरीब सवर्णों को आरक्षण देने की बात पहले से भी उठाती आई हैं और मोदी सरकार द्वारा लाए गए सवर्ण आरक्षण बिल को मायावती समर्थन करती हैं। ये एक तरह से दलित समुदाय के साथ धोखा है।”

गुलाब चन्द्र

दलित खुद को हिंदू मानते हैं

जौनपुर संसदीय सीट के मतदाता राकेश कुमार सरोज बताते हैं- “पिछली बार उन्होंने भाजपा को वोट दिया था। क्यों दिया था इसका कारण वो बताते हैं कि मोदी ने जातिवाद से परे देश और विकास की बात की थी इसलिए हम उनके साथ गए। क्या दलित मतदाता भी सांप्रदायिक विभाजन के चलते मोदी को वोट दिया था। राकेश कुमार हां में सिर हिलाते हुए कहते हैं सच्चाई यही है कि दलित खुद को हिंदू मानते हैं। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक स्तर पर भले ही मुस्लिम पसमांदा और दलित एक जैसे हों, राजनीतिक स्तर पर पिछले चुनावों में बसपा द्वारा इन्हें एकसाथ लाने की पुरजोर कोशिश हुई थी पर वो नाकाम हो गई इसी का नतीजा है कि लोकसभा में बसपा का एक भी प्रतिनिधि नहीं है जबकि यूपी विधानसभा में भी बसपा बद से बदतर स्थिति में पहुंच गई। जौनपुर सीट ओबीसी बाहुल्य होने के अलावा पासी और ठाकुर जाति की प्रमुखता से है।

राकेश सरोज

निषाद समुदाय के लोग निषाद पार्टी के खिलाफ़ हैं

गोरखपुर सदर सांप्रदायिक राजनीतिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील सीट है और पिछले 27 वर्षों से लगातार इस सीट पर गोरखनाथ मठ के मठाधीशों का कब्जा रहा है। 2018 के उपचुनाव में बसपा समर्थित सपा प्रत्यासी के जीतने से इस सीट से मठ की मठाधीशी टूटी है। यहां आजकल एक नारा जोरों से चला है- ‘मूलनिवासी बोल पचासी’। ये एक तरह से दलित, ओबीसी, आदिवासी समुदाय को एक साथ लाने की कोशिश है। गोरखपुर के दीपक कुमार बताते हैं कि मतदाता छले जाने से निराश और जागरुक हुए हैं। इसका अंदाजा इस बात से लगाइए कि जब निषाद पार्टी के मुखिया संजय कुमार निषाद ने कथित तौर पर 50 करोड़ रुपए लेकर भाजपा के साथ गठबंधन किया, तो निषाद समुदाय के लोग उनसे बहुत नाराज हुए और उनके खिलाफ नारेबाजी करते हुए उनके आवास पर तोड़फोड़ की। आज वंचित तबके के लोग आँख मूँदकर नेता को फॉलो नहीं करते वो देखते हैं कि नेता अपना निजी हित साध रहा है या समुदाय का। यही कारण है कि निषाद समुदाय के लोग निषाद पार्टी के साथ भाजपा के साथ जाने के बजाय सपा-बसपा गठबंधन के उम्मीदवार रामभुआल निषाद को सपोर्ट कर रहे हैं। बता दें कि गोरखपुर के उपचुनाव में निषाद पार्टी के मुखिया संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद सपा उम्मीदवार के तौर पर भाजपा उम्मीदवार को हराकर सांसद बने थे। दूसरी ओर हिंदू युवा वाहिनी के सुनील सिंह भी निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। योगी आदित्यनाथ ने उन पर रासुका लगाकार जेल भेजवा दिया था। गोरखपुर की ठाकुर लॉबी इससे भी योगी व भाजपा के खिलाफ है।”

बहुजन नेता ही देश में संविधान लागू कर सकता है

प्रतापगढ़ संसदीय क्षेत्र ब्राह्मणवादी, सामंतवादी क्षेत्र है। संविधान लागू हुए भले 70 साल हो गए हों पर यहां आज भी रानी राजा होते हैं। इस क्षेत्र में रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया की तूती बोलती है। राजा भैया की नवगठित पार्टी ‘जनसत्ता दल लोकतांत्रिक’ से उनके भाई अक्षय प्रताप सिंह चुनावी मैदान में हैं। कांग्रेस ने यहां से रानी रत्ना सिंह को उतारा है। भाजपा की ओर से संगमलाल गुप्ता जबकि गठबंधन प्रत्याशी के तौर पर बसपा से अशोक त्रिपाठी चुनाव लड़ रहे हैं। प्रतापगढ़ संसदीय सीट के मतदाता बसंत लाल पुश्तैनी तौर पर शादी व्याह में बाजा बजाने का काम करते हैं। वो कहते हैं प्रतापगढ़ सीट सामंतवादी समाज का एक आदर्श उदाहरण है। यहां कानून और प्रशासन की नहीं राजा की चलती है। यहां दिनदहाड़े, सिपाही, जेलर डीएसपी तक की हत्या हो जाती है। इसमें किसका हाथ है सब को पता होता है लेकिन प्रशासन कभी उस तक पहुंच ही नहीं पाता। लेकिन जब यूपी की सत्ता में मायावती थी तो यहां भी कानून और प्रशासन काम करने लगा था। राजा उस जगह पहुंच गए थे जहां उन्हें होना चाहिए था। बसंत लाल कहते हैं संविधान को बहुजन नेता ही सही मायने में लागू कर सकता है क्योंकि उनमें संविधान के प्रति अपार निष्ठा और सम्मान होता है, जबकि सवर्ण नेता तो संविधान से नफ़रत करते हैं क्योंकि संविधान ने उनके अमानवीय सामंती व्यवस्था को ध्वस्त करके बहुजनों को उनकी गुलामी से मुक्त करवा दिया है।

दिल्ली की चांदनी चौक संसदीय क्षेत्र के मतदाता रमेश कुमार मोची के पुश्तैनी पेशे ले जुड़े हुए हैं। उनके दोनो बेटे भी इसी काम करते हैं। बिटिया अंबेडकर यूनिवर्सिटी से एमए कर रही है। रमेश कुमार कहते हैं जीते कोई भी हम जो कर रहे हैं हमें वही करके कमाना खाना है। वैसे भी सारे दलित नेता तो भाजपा के साथ ही है, फिर सीधे मोदी को ही क्यों न वोट किया जाए।

मायावती के प्रशासन का हर कोई मुरीद है

यूपी में प्रशासन व्यवस्था हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रहा है। सवर्ण हो या अवर्ण आम हो या खास मायावती के प्रशासन की लगभग हर कोई प्रशंसा करता है। योगी सरकार के आने के बाद यूपी में लगातार हजारों फर्जी एनकाउंटर के जरिए दलित, अल्पसंख्यक व पिछड़े समुदाय के लोगों की हत्याएं की गई हैं। फूलपुर के लालचंद्र बताते हैं कि होली के अगले रोज पूरे दिन वो इलाहाबाद के पोस्टमार्टम हाउस में थे। वहां उस रोज पोस्टमार्टम के लिए आई लगभग 70 लाशों में से अधिकांश शव दलितों के थे। इससे अंदाजा लगा सकते हैं कि ये सरकार किस हद तक बहुजन विरोधी है।”

इसके अलावा उत्तर प्रदेश में पिछले 2 सालों में लगातार कई स्थानों पर हिंदुत्ववादियों द्वारा अंबेडकर की मूर्तिंयो को निशाना बनाकर तोड़ा गया है। सहारनपुर जातीय हिंसा, भीमा कोरेगांव, एससी/एसटी एक्ट पर हमला, 13 प्वाइंट रोस्टर आदि कई मुद्दों पर मौजूदा सरकार के खिलाफ़ बहुजन वोटर मायावती और गठबंधन के साथ है।

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