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मनोहर पर्रिकर : वह दमदार संघी जिसने गोमांस का विरोध करने वालों को सबक सिखाया

गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर चले गए। उनके जाने पर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं भाजपा और संघ की विचारधारा से इत्तिफ़ाक़ न रखने वाले लोगों तक ने व्यक्त कीं, वे उसके पात्र भी थे। कम लोग होते हैं, जो अपने व्यक्तित्व और कामकाज़ की शैली से आकर्षित करते हैं। उनकी मृत्यु पर जिस तरह की जल्वा-नुमाई हो रही है, वह स्वाभाविक है। उन्होंने जीवन के प्रति जैसी बे-परवाई दिखाई, वैसी रीत राजनीति में है नहीं। हम जब राजनीतिक भेदभाव का दरीचा खोलकर बाहर झांकते हैं तो उनके बारे में बहुत कुछ ऐसा दिखाई पड़ता है, जो समकालीन राजनीति में सामान्यत: नहीं है।

लेकिन मुझे 2015 के नवंबर में उस समय बड़ी हैरानी हुई जब पर्रिकर ने अभिनेता आमिर खान के एक बयान पर कहा था, अगर कोई ऐसा बोलता है तो उसे ज़िंदगी में सबक़ सिखाना बहुत ज़रूरी है। अगले दिन उन्होंने सफ़ाई दी कि उन्होंने किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं कहा था। दरअसल, दिल्ली में इंडियन एक्सप्रेस के रामनाथ गोयनका पुरस्कार समारोह के दौरान आमिर ख़ान ने एक प्रश्न के उत्तर में उस समय के सामाजिक वातावरण को लेकर कह दिया था कि उनकी पत्नी किरण राव बच्चों के भविष्य को लेकर डरी हुई हैं। वह कह रही है कि हमें तो देश छोड़कर किसी और देश में बस जाना चाहिए। यह वह दौर था जब बहुत से लोग कट्‌टरतावादियों के कारण देश के वातावरण काे अपने लिए असुरक्षित मान रहे थे।

हालांकि ये लोग भूल रहे थे कि आपातकाल के दौरान देश में ‘एक पोस्टर वाली औरत’ का ख़तरनाक़ भय तारी था। इंदिरा युग के उस भय को देखेें तो मोदी युग का भय कुछ भी नहीं है। अगर इसका किसी को प्रमाण चाहिए तो वह उस दौर में लिखी प्रसिद्ध लेखक धीरेंद्र अस्थाना की कहानी ‘विचित्र देश की प्रेमकथा’ पढ़ लें। इसका मतलब ये नहीं कि मोदी सरकार और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के समर्थकों को वह सब करने का हक़ मिल जाता है, जो अपनी सत्ता के उन्माद में कम्युनिस्ट, कांग्रेसी, समाजवादी, आम आदमी आदिआदि करते रहे हैं या कर रहे हैं। कट्टरता कट्टरता ही है। वैचारिक पिछड़ापन वैचारिक पिछड़ापन ही है। भले वह किसी धर्म या किसी देश का हो।

इंदिरा युग की याद दिलाना इसलिए ज़रूरी लग रहा है, क्योंकि अगर इस देश के महान लोगों ने उस बुरे दौर को लाने वालों को घूरे पर फेंक दिया तो ये क्या चीज़ हैं? हमें ‘जब दहर के ग़म से पनाह नहीं मिलती है तो हम लोगों ने इश्क़ ईजाद किया तो कभी शहर-ए-बुताँ में ख़राब फिरे कभी दश्त-ए-जुनूँ आबाद किया। इसलिए कुरबत और सोहबत में रहो और दिल को शाद करो। ज़रूरी नहीं कि लब ओ आरिज़ ओ ज़ुल्फ़ ओ कनार पर सदा ही आपकी हथेलियां टिकी रहें।

मुझे पर्रिकर ने एक बार तब हैरानी में डाला जब उन्होंने गोमांस को लेकर बयान दिया। जुलाई 18, 2017 को उन्होंने गोवा विधानसभा में कहा, ‘अभी पणजी से 40 किलोमीटर दूर गोवा मीट कॉम्पलेक्स में 2000 किलो गोमांस हर दिन तैयार हो रहा है, लेकिन मांग बहुत ज़्यादा है। इसलिए हम बाकी गोमांस कर्नाटक के वेलागावी से परिवहन करवाएंगे।’

इसके बाद गोवा में हिन्दूवादी एनजीओ गोरक्षक अभियान ने प्रदेश में गोमांस पर प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर आंदोलन किया तो पूरे प्रदेश में गोमांस की आपूर्ति ठप हो गई। गाेमांस विक्रेता हड़ताल पर चले गए। चार दिन हड़ताल रही। इस पर गोवा के मुख्यमंत्री के नाते पर्रिकर ने जनवरी 11, 2018 को गोरक्षकों को चेताया, अगर किसी ने गोमांस के व्यापार में बाधा पहुंचाई तो उसे सख़्त दंडित किया जाएगा। पुलिस ने कड़ी कार्रवाई की और गोमांस विक्रेता मनोहर पर्रिकर ज़िंदाबाद के नारे लगाते चले गए। गोमांस का कारोबार फिर परवान चढ़ गया। यह छद्म हिंदुत्ववादियों का दोगलापन है कि वे अपने गोमांस समर्थक नेता के बयानों पर चुप्पी साध लेते हैं और विरोधी अगर ऐसा कुछ कहें तो उसका जीवन नरक बनाने पर तुल जाते हैं। क्या इससे इतर कुछ पाखंड हो सकता है?

लेकिन पर्रिकर में कुछ तो था। वे आँख नशीली बात रसीली चाल बला की और बाँकी मानदंड वाली शख़्सियत थे। उनके गोमांस संबंधी बयानों के कारण मैंने उनसे किसी कट्‌टर हिन्दू को नाराज़ नहीं देखा और उनके सबक सिखाने वाले बयान को लेकर किसी मुसलमान को भृकुटियां ताने नहीं पाया। अलबत्ता, उन्हें जब अग्नाशय का कैंसर हुआ और वे ऐम्स में भर्ती हुए तो हिन्दू महासभा के एक नेता स्वामी चक्रपाणि ने अवश्य उन पर एक अप्रिय कटाक्ष किया कि अगर पर्रिकर गोमांस पर प्रतिबंध लगा देते तो वे इस रोग से पीड़ित नहीं होते। उनका परोक्ष मंतव्य था कि पर्रिकर गोमांस की छूट देने के कारण इस बीमारी से पीड़ित हुए हैं।

पर्रिकर ने रेवाड़ी में 2016 में भी एक बयान देकर चौंकाया था। उन्होंने कहा, पाकिस्तान जाना और नरक में जाना एक समान है।

आईआईटी पढ़कर वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में गए, लेकिन वहां से निकले तो अपने भीतर के कट्‌टरपंथ को नरम-मुलायम बनाकर। और जिस समय ज़रूरत पड़े तो गोमांस के लिए भी तैयार। यानी वे उस दुरंगे पत्थर जैसे थे, जिसकी माला बनाकर फ़कीर लोग पहनते हैं। इसे ही फ़कीरों की भाषा में संगे-सुलेमानी कहते हैं। वे काम के दीवाने थे। घर से ज़्यादा लोगों के काम में जुटे रहते थे। दिल्ली में उन्हें रक्षा मंत्री भी बनाया गया, लेकिन उनका मन गोवा में था। और अंतत: वे ‘इंशा’-जी उठो अब कूच करो इस शहर में जी को लगाना क्या, वहशी को सुकूँ से क्या मतलब जोगी का नगर में ठिकाना क्या वाले अंदाज में चले गए।

इस शालीन और सम्मोहक व्यक्तित्व को प्रणाम।

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