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रिपोर्ट

मायावती की मूर्तियाँ और मान्यवर कांशीराम की वसीयत बनाम मीडिया की नूरांकुश्ती

पिछले साढ़े चार सालों में गोदी मीडिया या एक अलग ही रूप देखने को मिला है। बढ़ती बेरोज़गारी, जोकि बीते चार दशकों में सबसे ज़्यादा है, उस शायद कोई ख़बर ही नहीं है। किसानों की समस्याओं एवं उनकी बढ़ती आत्महत्याओं का भी इनसे कुछ ख़ास लेना देना नहीं लगता। भारत में बढ़ती महँगाई, पेट्रोल-डीज़ल के दाम एवं गिरते विदेशी निवेश भी कहीं विशेष कवरेज में नहीं हैं। ‘गोदी मीडिया’ पूर्णतया आँखे मूँद चुकी है, भारत की वास्तविक समस्याओं से।

मूलभूत समस्याओं से हटकर, राजनैतिक लाभ वाले मुद्दों की अनावश्यक ही विशेष कवरेज का हाल ही में एक नया खेल सामने आया है. दलित प्रेरणा स्थल में बाबासाहेब डॉ. भीम राव अम्बेडकर एवं साहेब कांशीराम के साथ लगी कुमारी मायावती की मूर्ति पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से ये क्या कहा कि ’प्रथम दृष्टित्या देखकर लगता है कि उन्हें उन मूर्तियों का ख़र्चा, कुमारी मायावती को ख़ुद वहन करना होगा’; देश की अग्रणी मीडिया को जैसे मौक़ा ही मिल गया, नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री वाली कुर्सी को हिलाने की हिम्मत रखने वाली स्त्री को अपमानित करने का। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने हालाँकि कोई फ़ैसला नहीं सुनाया है, ये फ़ैसला अप्रैल में सुनाया जाएगा, परंतु गोदी मीडिया ने अपना फ़ैसला अभी से सुना दिया है कुमारी मायावती के विरुद्ध। जबकि ये स्थल, कहीं से भी पद का अथवा जनता के पैसे का दुरुपयोग नहीं है।

बहुजनों का स्थल
भारत में, विशेषकर दिल्ली में बहुत सारे महापुरुषों के स्मारक हैं। ये स्मारक भी एक ख़ास तबके एवं जाति विशेष से आने वाले मोहनदास कर्मचंद गांधी, जवाहरलाल नेहरु, राजेंद्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री, मोररजी देसाई, शंकर दयाल शर्मा आदि नेताओं के हैं। उधर दूसरी तरफ़, शोषित तबके से आने वाले महापुरुषों एवं नेताओं का एक भी ऐसा स्मारक स्थल नहीं हैं। ऐसे में कुमारी मायावती ने लखनऊ और नोएडा में, दलित प्रेरणा स्थल बनाकर न केवल डॉ भीम राव अम्बेडकर एवं मान्यवर कांशीराम जैसे महापुरुषों को श्रद्धाजंलि देने का काम किया, अपितु सदियों से शोषित समाज को भी एक प्रेरणा स्थल देकर उनमें आत्मविश्वास भरने का काम किया है। दोनों ही इन महापुरुषों की जयंती एवं महापरिनिर्वाण दिवस पर आज भी इन स्थलों पर यह समाज बहुत ही जोश-ओ-ख़रोश के साथ अपनी हाज़िरी लगाता है।

लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान
भारत में समय-समय पर लोकतांत्रिक संस्थाओं का दुरूपयोग होता रहा है। चाहे वह सीबीआई अथवा ईडी का मामला हो, दंगों में स्थानीय पोलिस की भूमिका हो, कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन हो, या फिर कैबिनेट से बिना चर्चा किए डीमोनेटाईज़ेशन जैसे जनता विरोधी एवं मनमाने फ़ैसले लेना। इसके विपरीत कुमारी मायावती की सरकार में लोकतांत्रिक संस्थाओं का पूरा सम्मान होता है। उनकी सरकार में किसी दंगे इत्यादि का भी कोई मामला नहीं आया। सीबीआई भी बहुत बार उनके भाई आनंद पर बहुत बार रेड मार चुकी है। जिसमें उन्होंने सीबीआई को सम्मान के साथ सहयोग भी किया है। जबकि केंद्र से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्री, सीबीआई जैसी का दुरुपयोग एवं अपमान करते रहे हैं। अभी हाल ही में पश्चिम बंगाल, सीबीआई को लेकर केंद्र और राज्य के बीच हुई नूरांकुश्ती का एक बेहतरीन उदाहरण बना। जबकि इससे पहले केंद्र में भी कैबिनेट की जानकारी के बिना आधी रात में डिमोनेटाईज़ेशन करके जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों का अपमान किया था। परंतु दलित प्रेरणा स्थल के निर्माण में कैबिनेट की मंज़ूरी थी। दूसरे शब्दों में जनता के पैसे का कोई दुरूपरोग नहीं किया गया अपितु एक संवैधानिक फ़ैसला था; जोकि जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा लिया गया फ़ैसला था।

हाथी की मूर्तियाँ
हाथी, भारत में रहने वाले मूलनिवासियों का प्रिय पशु रहा है। यहाँ बसने वाले पिछड़ों एवं बहुजनों की पसंदीदा सवारी हाथी, हमेशा से ही भारत में मूलनिवासियों की समृद्धि का परिचायक रहा है। इतिहास में भी तथागत बुद्ध की मूर्तियों के दोनों तरफ़ हाथी की सूँड ऊपर किए हुए मूर्तियाँ देखने को मिलती हैं।वहीं आज भी भारत का सांकेतिक चिन्ह हाथी ही है।


भगवान बुध राजगीर में हाथी नालागिरी के साथ

विश्व में चीन को जहाँ ड्रैगन के रूप में देखा-दिखाया जाता है, वहीं भारत को हाथी के रूप में दिखाया जाता है। यहाँ तक कि भारत में कनाडा के राजदूत डेविड एम॰ मेलोनि द्वारा भारतीय विदेश नीति पर लिखित किताब का नाम भी ’डज़ द एलेफेंट डान्स’(Does the Elephant Dance) ही है। भारत और चीन के विश्व में बढ़ते अंतराष्ट्रीय सम्बन्धों पर रॉबिन मेरेडिथ द्वारा लिखित किताब का शीर्षक भी ’द एलेफेंट एंड द ड्रैगन’(The Elephant and The Dragon) है। दोनों देशों के आर्थिक विकास पर नैशनल रिसर्च काउन्सिल फ़ोर नैशनल अकडेमीस (National Research Council for National Academes) में छपी किताब का नाम भी ‘द ड्रैगन एंड द एलेफेंट: अंडरस्टैंडिंग द डिवेलप्मेंट ऑफ़ इन्नोवेटिव कपैसिटी इन चाइना एंड इंडिया’ (The Dragon and The Elephant: Understanding the Development of Innovative Capacity in China and India) है। जिनमें भारत को हाथी के रूप में दर्शाया गया है।


साभार इंटरनेट

दूसरी तरफ़ बहुजन समाज पार्टी का चुनाव निशान में हाथी की सूँड नीचे की तरफ़ में है, जबकि प्रेरणा स्थल में लगे हाथी की सूँड ऊपर की तरफ़ है। जोकि कहीं से भी बी॰एस॰पी॰ का चुनाव निशान नहीं है। प्रेरणा स्थल में लगी मूर्तियाँ तथागत बुद्ध के समय में भारत की सुख-समृद्धि की परिचायक हैं। यधपी ’गोदी मीडिया’ द्वारा इन मूर्तियों की बुराई करना कहीं से भी तर्कसंगत नहीं है अपितु, पिछड़ी एवं अल्पसंख्यकों के प्रति अपने पूर्वाग्रहों को दिखाता है।


जनता का पैसा और विकास
प्रेरणा स्थल का निर्माण, तत्कालीन सरकार में हुए विकास को दिखाता है। महज़ 685 करोड़ में बने ये स्मारक, सरकार को होने वाली नियमित आय का स्त्रोत भी हैं।ये न केवल आमदनी बढ़ा रहे हैं अपितु भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्री की शूटिंग का एक स्थान भी हैं। एंट्री फ़ीस को छोड़ भी दें, तो भी ये स्मारक फ़ायदे का सौदा हैं। उदाहरण के तौर पर, पिछले साल अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक़, नॉएडा में फ़िल्म सिटी के साथ लगते इस स्थल को व्यावसायिक रूप में प्रयोग किया जाएगा। जिसमें फ़िल्म शूटिंग से 2 से 2.5 लाख, वहीं दूसरी तरफ़ शादियों की शूटिंग से 10 से 15 हज़ार की रक़म वसूली जाएगी। इस प्रेरणा स्थल की मैनेजर पारुल सेन के मुताबिक़, स्थल में व्यावसायिक शूटिंग की बढ़ती माँग को मद्देनज़र रखते हुए, यह फ़ैसला लिया गया है और समिति की तरफ़ से शूटिंग के लिए अधिसूचना भी जारी कर दी गयी है। वहीं दूसरी और गोदी मीडिया यह भूल जाता है कि गुजरात में 3000 करोड़ में बनी एक मूर्ति भी जनता के पैसे से बनी है। 4200 करोड़ का कुंभ भी, माननीय प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं में लगे 2021 करोड़ भी और सरकार को मीडिया में चमकाने के लिए विज्ञापनों में दिए 4300 करोड़ भी।

मान्यवर कांशीराम कीइच्छाएवं वसीयत
यूँ तो साहेब कांशीराम की कोई ज़मीन जायदाद नहीं थी। फ़क़ीरों की ज़िंदगी जीने वाले आधुनिक भारत के समाज सुधारक ने कभी कोई बैंक बैलेन्स भी नहीं रखा। 15 मार्च 1934 को रोपड़ जिले के पिर्थिपुर गाँव में जन्मे इस महापुरुष ने अपने पुश्तैनी घर से भी कुछ नहीं लिया और घर छोड़ दिया। अपनी पूरी ज़िंदगी में एक किताब ‘चमचायुग’ एवं कुमारी मायावती पर लिखी एक किताब के प्राक्कथन के अलावा कुछ पीछे नहीं छोड़ा। लेकिन हाँ, समाज को ऊपर उठाने की ललक के चलते सामाजिक आंदोलन विरासत में मिला था। उसे ही वसीयत बनाकर साहेब ने सामाजिक आंदोलन की विरासत में कुमारी मायावती को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। उन्होंने अपनी वसीयत में यह भी ’इच्छा’ ज़ाहिर की थी। उन्होंने कहा था कि ‘मेरे जीते जी और मरने के बाद भी, मेरी प्रतिमा के साथ-साथ मेरी शिष्या एवं एकमात्र उत्तराधिकारी कुमारी मायावती की प्रतिमा लगनी चाहिये’। माननीय कांशीराम की इसी ‘इच्छा’ के चलते कुमारी मायावती ने अपनी प्रतिमा स्थापित की है।


प्रेरणा स्थल में मूर्तियों के साथ लिखा एक आलेख


पूरे विश्व में ‘इच्छा’ पूरी करने का एक चलन रहा है, विशेषकर ’आख़िरी इच्छा’ पूरी करने का। भारत में भी यही प्रचलन में रहा है। पंडित जवाहरलाल नेहरु ने भी 21 जून 1954 को अपनी वसीयत में कोई धार्मिक क्रियाकर्म ना करने एवं अपनी मुट्ठी भर राख को इलाहाबाद में गंगा नदी में बहाने और बाक़ी पूरी राख को आसमान में हवाई ज़हाज से बिखेरने की इच्छा जताई थी। कुमारी मायावती ने भी अपनी प्रतिमा को स्थापित करके, बहुजन तबके के मसीहा, अपने गुरु एवं मार्गदर्शक की ’इच्छा’ को पूरा किया है।

ख़ैर पिछले साल SC/ST एक्ट को कमजोर कर दिए जाने के विरोध में हुए ऐतिहासिक भारत बंद के ठीक एक साल बाद, 2 अप्रैल 2019 को माननीय सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला जो भी आए। लेकिन जनता के लिए किसने काम किया और किसने नहीं; इसका फ़ैसला तो जनता ही तय करेगी, आने वाले आम चुनावों में। प्रेरणा स्थल भी यहीं होगा, हाथी भी यहीं होगा, कुमारी मायावती मूर्तियां भी और नेताओं द्वारा जनता के किए गये कार्यों का लेखा-जोगा भी।

परमीत काजल वर्तमान में जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में अंतराष्ट्रीय राजनीति में पी॰एच॰डी॰ कर रहे हैं।

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