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रिपोर्ट

मोदी और अडानी का गठजोड़, हिटलर और पूंजीपतियों के गठजोड़ से मिलता जुलता है!

हिटलर के पतन के बाद न्यूरेमबर्ग में नाजियों के खिलाफ मुकदमा चला, जिसमें बाल्थर फंक नामक का एक व्यक्ति जो जर्मनी के प्रसिद्ध आर्थिक अखबार ‘बर्लिनर वोरसेन जेतुंग’ का सम्पादक था वह पूंजीपतियों और हिटलर के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी बनकर सामने आया।

उसने कई रहस्यों को उजागर किया जिससे हिटलर और पूंजीपतियों का संबंध उजागर हुआ। फंक ने एक लम्बी लिस्ट बतायी जिसमें कॉर्टन आई.जी. फाखेन, वान स्निजलर, अगस्त दिहन, जैसे उद्योगपति थे जो हिटलर को अपने स्वार्थों के लिए चंदा देते थे, हिटलर ने कोयला खानों के मालिकों से पैसे वसूलने के लिए ‘सर ट्रेजरी’ नाम से एक फण्ड भी बनाया था।

यहाँ भी अडानी ओर मोदी गठजोड़ बहुत मजबूत है चुनाव से ठीक पहले केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने छत्तीसगढ़ के परसा में घने हसदेव अरण्य के जंगल में 2100 एकड़ पर ओपन कास्ट कोल माइनिंग को पर्यावरणीय मंजूरी दे दी, जबकि इस बैठक में छत्तीसगढ़ के वन विभाग के अतिरिक्त सचिव ने आपत्ति की थी। साल 2009 में पर्यावरण मंत्रालय ने हसदेव अरण्य को खनन के लिए वर्जित क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किया था. भारत के वन सर्वेक्षण की 2014 की रिपोर्ट में सिफारिश की थी कि हसदेव अरण्य को खनन से मुक्त होना चाहिए’ लेकिन जब सवाल चुनावी चंदे का हो तो जंगलों की आदिवासियों की परवाह कौन करता है।

परसा हसदेव अरण्य के 30 कोयला ब्लॉकों में से एक है, जिस पर राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लि. (आरवीयूएनएल) का स्वामित्व में है और यह कोल ब्लॉक उसे ही आवंटित हुआ था, लेकिन एमडीओ यानी खदान के विकास और ऑपरेशन का अधिकार अडानी को दिए गए, इस तरह से रमन सरकार और वसुंधरा सरकार ने मिलकर अडानी को खान का स्वामित्व गैरकानूनी रूप से मालिक बना दिया।

इस फैसले से भारत में वन संरक्षण के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं

परसा कोल ब्लॉक के लिए 842 हेक्टेयर वन क्षेत्र के लगभग एक लाख पेड़ कटेंगे। यह सेंट्रल इंडिया के सबसे बड़े फॉरेस्ट इलाके में से एक हैं ये जंगल में रहने वाले आदिवासी समुदाय का घर है. इनमें गोंड भी शामिल हैं जो काफी हद तक जंगल से उत्पन्न उत्पादों और खेती पर निर्भर हैं.

इस क्षेत्र में न केवल जंगली हाथी और भालू रहते हैं बल्कि और कई तरह के वन्यजीव भी रहते हैं। पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता बताते हैं कि जहां परसा कोल ब्लाक है, हाथियों का विचरण क्षेत्र है।

माइनिंग का असर सिर्फ उन आदिवासियों पर ही नहीं पड़ा जिन्होंने अपनी जमीनें खोईं बल्कि इसका उस क्षेत्र के पूरे जैव पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ा है. धमाके की आवाज और विध्वंस ने जंगली जानवरों को परेशान किया है और अब वे गावों की तरफ आ रहे हैं।

यह क्षेत्र जैव-विविधतापूर्ण से भरा है. यह घने साल के जंगलों, दुर्लभ पौधों, पूरे साल बहने वाली जल की धाराओं और वन्यजीव की कई प्रजातियों के साथ पारिस्थितिक रूप से नाजुक है. लेकिन अब सब खत्म होने की कगार पर है।

यह है पूंजीपति मित्रों के साथ मोदी जी का गठजोड़ जिसमें आदिवासी और किसान बिल्कुल हाशिए पर चले गए हैं और जंगल तो बेचारे कुछ बोल भी नहीं सकते………….

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