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रिपोर्ट

क्या आपको पता है कि सरकार 26 सरकारी कंपनिया बेचने जा रही है और बेरोजगारी की तो आप पूछिए मत!

सरकार 26 सरकारी कंपनिया बेचने जा रही है. जल्द ही इनकी नीलामी की जाएगी. हाल ही में वित्त मंत्री ने 23 कंपनियों के निजीकरण की घोषणा की थी. नवभारत टाइम्स अखबार ने खबर छापी है जिसमें कहा गया है कि सरकार ने आरटीआई के जवाब में 26 कंपनियों के नाम दिए हैं जिनमें एयर इंडिया और बीपीसीएल के भी नाम हैं.

कभी आपने सोचा है कि जिन मनमोहन सिंह ने भारत की अर्थव्यवस्था में उदारवाद का दरवाजा खोला, उन्होंने खुद अपने दस साल के दौरान सरकारी संपत्तियों को क्यों नहीं बेचा? निजीकरण की तरफ वे भी बढ़े, लेकिन उतना ही, जितने से ज्यादा फर्क नहीं पड़ा. इसके उलट, मनमोहन सरकार ने शिक्षा, भोजन और रोजगार के मसले पर सरकारी मदद की व्यवस्था की.
आज भी मनमोहन सिंह समेत तमाम अर्थशास्त्री क्यों कह रहे हैं कि गरीबों तक पैसा और अनाज पहुंचाया जाए? क्योंकि भारत की अधिकांश जनता के पास तंगी है और इसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है.

इन कंपनियों के निजीकरण से सबसे पहले तो बड़ी संख्या में नौकरियां जाएंगी. जो प्राइवेट ग्रुप इन कंपनियों की बोली लगाएंगे, वे भी नौ​करियां तो देंगे लेकिन दस लोगों का काम पांच लोगों से कराएंगे और वे सारी सुरक्षाएं खत्म हो जाएंगी जो सरकारी सेवाओं में मिलती हैं.
एक तरफ सरकार धड़ल्ले से निजीकरण कर रही है, दूसरी तरफ अब सरकारी सेवाओं में भी सुरक्षा खत्म की जा रही है. पेंशन, बीमा, मेडिकल जैसी सुविधाएं सरकार खत्म करने पर काम कर रही है.

भारत अमेरिका या ब्रिटेन नहीं है. भारत जैसे देश में इसके फायदे से ज्यादा नुकसान होगा. पहला नुकसान है कि गरीबों के लिए सरकारी सेवाओं में दिया गया आरक्षण बेमानी हो जाएगा. दूसरे, युवाओं को नौकरी के लिए सरकार पर नहीं, बल्कि निजी कंपनियों पर निर्भर रहना होगा, जिनकी जनता के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है.

भारत में रेग्युलेटरी कानून बेहद कमजोर हैं, उन पर कोई चर्चा भी नहीं है. ब्रिटेन और अमेरिका में फेसबुक पर सवाल उठे तो जुकरबर्ग को संसद में पेश कर दिया गया. भारत में पूंजीपति इतने मजबूत हैं कि सरकार उनकी जेब में है. कोई पूंजीपति प्रधानमंत्री की पीठ पर हाथ रखने की हिम्मत कर सकता है, लेकिन सरकार किसी पूंजीपति को कभी तलब नहीं कर सकती.

पूंजीवादी अर्थव्यवस्था भारत में वैसे ही काम नहीं कर सकती, जैसे कि अमेरिका में करती है. भारत की आधी जनसंख्या गरीब है और इसे सरकारी मदद के बिना आगे नहीं बढ़ाया जा सकता. शिक्षा, परिवहन, मेडिकल, खनन, उड्डयन आदि हर क्षेत्र के निजीकरण की कीमत भारत की गरीब जनता चुकाएगी.

बेरोजगारी की रिपोर्ट बताती हैं कि पिछले करीब छह सालों में 17 से 18 करोड़ लोगों का रोजगार छिन गया है.

लॉकडाउन के बाद पहले दो हफ्ते में 12 करोड़ नौकरियां छिनी थीं. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग ऑफ इकोनॉमी (सीएमआइई) के सर्वे के हवाले से योगेंद्र यादव ने लिखा था कि “इस बात को हजम करने के लिए बड़ा जतन करना पड़ेगा कि बीते दो हफ्ते में करीब 12 करोड़ भारतीयों ने रोजगार गंवाया है. मान लीजिए कि इनमें से 8 करोड़ लोग ऐसे हैं कि उन्हीं की कमाई पर उनका परिवार निर्भर है तो देश के 25 करोड़ परिवारों में से एक तिहाई के पास अभी जीविका का संकट आ खड़ा हुआ है.”
CMIE ने ही अगस्त में फिर रिपोर्ट दी कि अप्रैल से जुलाई के बीच 1.89 करोड़ लोगों की नौकरी चली गई. रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई महीने में 50 लाख नौकरियां चली गईं. पिछले साल के औसत के मुकाबले इस साल अगस्त तक 1 करोड़ 90 लाख सैलरीड लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है.

लोकसभा चुनाव के बाद एक रिपोर्ट आई थी कि पिछले पांच साल में सिर्फ 7 प्रमुख सेक्टर में 3.64 करोड़ नौकरियां जा चुकी हैं.
अब कुल जोड़ लीजिए. 12 करोड़ + 2 करोड़ + 3.64 करोड़ = 17.64 करोड़
यानी जो पार्टी हर साल दो करोड़ रोजगार देकर देश को विश्वगुरु बनाने का वादा करके सत्ता में आई थी, वह मोटे तौर पर 17-18 करोड़ नौकरी छीन चुकी है. ये आंकड़े मीडिया सर्वे पर आधारित हैं. अगर सरकार में बैठे लोग सही आंकड़ा जारी कर दें तो शर्म से खुद ही मर जाएं.

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