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पांच सालों में मोदी की मीडिया मैनेजमेंट और मीडिया का मोदी के आगे डांस!

इन पाँच सालो मे मीडिया का इस्तेमाल जिस तरह से ‘एजेंडा सेटिंग्स’ के लिए किया गया वह अभूतपूर्व है, इस थ्योरी को अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक मैक्सवेल मैकॉम्ब और डोनाल्ड शॉ ने पेश किया था.

1922 में पहली बार वाल्टर लिप्पमेन ने एक कॉन्सेप्ट पेश किया कि लोग किसी भी मामले में सीधे तौर पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं रख पाते वे स्यूडो (छ्द्म) वातावरण में रहते हैं। इसलिए ऐसे में मीडिया उनके लिए काफी मायने रखता है क्योंकि यह उनके विचारों को प्रभावित करता है, हालांकि इस तरह से बनाए गए एजेंडे का प्रभाव तत्काल दिखाई नहीं देता, इसका प्रभाव दूरगामी भी होता है।

यही दूरगामी प्रभाव आज चुनाव के वक़्त हमे देखने को मिल रहा है। मोदीजी अच्छी तरह से जानते है कि इन 5 सालो की उपलब्धियां इस चुनाव की विषयवस्तु कभी बनाई ही नहीं गयी इसलिए वह आज खुलकर आज हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण पर आ गए हैं, उनकी चुनावी रैलियों में इस मुद्दे के अलावा और कोई बात है ही नहीं।

भारतीय मीडिया पिछले 5 सालों में हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण, पाकिस्तान और विपक्ष के नेताओं की बदनामी करने का एजेंडा सेट कर चुका है। टीवी चैनलों में खबरों की पोजिशन और लंबाई उसकी प्राथमिकता को, अखबारों की हेडलाइंस के आकार, खबरों का आकार और उसके प्लेसमेंट को सत्ता में बैठे लोग डिसाइड कर रहे हैं।

पत्रकार सेवंती नैनन कहते हैं कि मीडिया में लोगो के दिमाग में मुद्दा भर देने की अनोखी क्षमता होती हैं।

एक ओर कमाल की बात समझिए ……. हम जानते हैं कि मीडिया का अर्थ सवाल खड़े करने से लगाया जाता है लेकिन यह एजेंडा तब हो जाता है जब आप सवालो के जरिए किसी एजेंडे को खड़े करते हैं,…

सवाल के जरिए एजेंडा खड़ा करने का बेहतरीन उदाहरण आपके सामने मोदीजी के पिछले 4 सालों में लिये गए इंटरव्यू है।

उन इंटरव्यू में आप मोदी के जवाब मत सुनिए उन इंटरव्यू में आप यह ध्यान दीजिए कि सवाल क्या पूछे गए और किस तरह से पूछे गए?….

दो दिन पूर्व एबीपी न्यूज़ चैनल में जो इंटरव्यू प्रसारित किया गया उसमे क्या सवाल किए गए? उसके सवाल थे- गाली को गहना बनाने पर, प्रधानमंत्री की नवरात्र पूजा और व्रत पर, पपीता खाने और न खाने पर, उनकी असीम शक्ति।

यह इंटरव्यू विशुद्ध एजेंडा सेटिंग्स का उदाहरण है। इस इंटरव्यू का एक ओर उदाहरण देखिए खुद प्रधानमंत्री विपक्ष के नेताओं को ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ का सदस्य बता रहे हैं,

अच्छा चलिए एक प्रयोग करते हैं। आप मन मे यह शब्द दोहराइए ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ आपकी किसकी छवि देखते हैं? 100 में से 100 लोग कन्हैया कुमार की छवि देखेंगे, ओर सबसे मजे की बात यह है कि इस चुनाव में कन्हैया के बेगूसराय से लड़ने को टीवी चेंनल्स पर खूब प्रचारित किया जा रहा है।

यह संयोग बिल्कुल नहीं है कि प्रधानमंत्री टुकड़े टुकड़े गैंग की शब्दावली बोलतें है और कन्हैया कुमार को लगातार चर्चा में बनाए रखा जाता है। शायद राहुल गांधी के बाद वह ऐसे दूसरे नेता हैं जिसे इस बार मीडिया कवरेज मिल रहा है इतना तो अखिलेश मायावती को मीडिया नहीं पूछ रहा जितना इस बार कन्हैया को लाइमलाइट में रखा गया है।

यह होता मीडिया का एजेंडा सेटिंग्स। आपके अनकांशस में कन्हैया का प्रोजेक्शन कर दिया गया है। उसे लगातार दिखाया जा रहा है और पीएम मोदी वही हिट कर रहे हैं……..बहुत ऊंचे खेल हैं……..

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