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मोदी-साध्वी के लिए सांप्रदायिकता आरोप नहीं, इनाम है

राहुल कोटियाल

‘दोषी सिद्ध न होने तक कोई भी व्यक्ति निर्दोष समझा जाता है.’ – यही भारतीय न्याय व्यवस्था का नियम है. तो फिर साध्वी प्रज्ञा के चुनाव लड़ने पर इतना हंगामा क्यों मचा है? कोर्ट ने उन्हें अब तक दोषी साबित नहीं किया है, तो क्या उन्हें भी फ़िलहाल निर्दोष नहीं समझा जाना चाहिए???

इस संदर्भ में अभी जावेद अख़्तर ने एक इंटर्व्यू में बड़ी दिलचस्प बात कही. उनका कहना था कि भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा को टिकट इसलिए नहीं दिया कि वो उन्हें निर्दोष मानते हैं. बल्कि इसीलिए दिया है क्योंकि वो यक़ीन करते हैं कि जो आरोप साध्वी पर हैं, वह सही हैं. और साध्वी का समर्थन करने वाले तमाम लोग भी इसीलिए उनके समर्थक हैं क्योंकि उन्हें भी विश्वास है कि साध्वी पर लगे आरोप बिलकुल सही हैं. ये आरोप ही साध्वी की पहचान हैं, उसकी योग्यता, उसकी यूएसपी हैं.

अपनी बात को एक उदाहरण के साथ समझाते हुए जावेद अख़्तर ने आगे कहा, ‘कुछ साल पहले मुझे मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने एक कार्यक्रम में बुलाया था. वहाँ पहुँचा तो मुझसे पहले एक मौलाना साहब मंच पर बोलने आए. ओसामा बिन लादेन के बारे में वह मौलाना मंच से बोलने लगे कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि 9/11 में ओसामा बिन लादेन का हाथ हो. वह बोले कि ओसामा पर यह आरोप पूरी तरह से झूठा है और यह अमरीका ने झूठ फैलाया है. ये उस दौर की बात है जब ओसामा बिन लादेन मारा नहीं गया था.’

जावेद अख़्तर आगे कहते हैं, ‘मौलाना साहब के बाद जब मेरा नंबर आया तो मैंने कहा, चलिए मौलाना साहब मान लेते हैं कि आप सही कह रहे हैं. बल्कि ये भी मान लेते हैं कि 9/11 में तो क्या ओसामा बिन लादेन किसी भी आतंकी गतिविधि में शामिल नहीं रहा है. उसने कहीं भी कोई हत्या – कोई बम धमाके नहीं किए हैं. लेकिन फिर आप मुझे बस इतना बता दीजिए कि ये जो आप जैसे तमाम लोगों के घर पर ओसामा की तस्वीरें लगी हैं, ये क्यों लगी हैं? ओसामा की उपलब्धि क्या है, उसकी पहचान क्या है? उसने ऐसा क्या किया है जो आप लोग उसकी तस्वीरें लगाते हो?’

ठीक ऐसी ही पहचान और ऐसी ही उपलब्धि साध्वी प्रज्ञा की भी है. धमाकों के आरोप के अलावा साध्वी प्रज्ञा ने ऐसा क्या किया है जो उन्हें ‘लोकप्रिय’ बनाता हो? ख़ास तौर से उस वर्ग के बीच में जो ‘हिंदू और हिंदुत्व’ का झंडा बुलंद करना चाहते हैं?

उन्हें टिकट मिलने का एकमात्र कारण यही है कि उनकी पहचान के साथ यह आरोप चिपके हुए हैं. उनके समर्थक भी उन्हें निर्दोष नहीं मानते. निर्दोष मानेंगे तो साध्वी के समर्थन का आधार ही क्या बचेगा. उनके समर्थक वही लोग हैं जिन्हें विश्वास है कि आरोप सही हैं और इन आरोपों पर वह समर्थक गर्व भी करते हैं. उन्हें विश्वास है कि साध्वी ने जो किया वह धर्म की राह पर चलते हुए किया और बिलकुल ठीक किया.

इस मामले में साध्वी प्रज्ञा अकेली नहीं हैं. भड़काऊ भाषण देने वाले और सांप्रदायिक ज़हर उगलने वाले तमाम नेताओं की लोकप्रियता का आधार भी उनके अंदर का ज़हर ही है. संगीत सोम हों, वरुण गांधी हों, योगी आदित्यनाथ हों या अकबरुद्दीन ओवैसी हों. इन तमाम लोगों की लोकप्रियता का आधार इनका सांप्रदायिक ज़हर ही है. कोर्ट में आरोपों से बच निकलना भले ही क़ानूनी तौर पर इन्हें निर्दोष साबित कर देता है लेकिन इनके समर्थक भी जानते हैं कि इन पर लगे आरोप बिलकुल सही थे. बल्कि इन आरोपों के कारण ही वो इन्हें समर्थन देते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ही उदाहरण ले लीजिए. भाजपा समर्थक तर्क करने को भले ही यह कहते हैं कि ‘कोर्ट ने भी नरेंद्र मोदी को 2002 मामले में दोषी नहीं पाया है’ लेकिन इस तर्क के साथ ही अधिकांश भाजपा समर्थक ये कहते भी मिलते हैं कि ‘2002 में मोदी ने जो किया वो बिलकुल सही किया’ या ये कि ‘इन मुल्लों को मोदी ही सबक़ सिखा सकता है जैसा उसने गुजरात में 2002 में सिखाया था.’ समर्थक अगर नरेंद्र मोदी को सच में निर्दोष मानते तो ऐसी बातें क्यों करते? और नरेंद्र मोदी के निर्दोष होने का विश्वास अगर उनके समर्थकों को है, तो फिर 2002 में ऐसा क्या हुआ कि मोदी रातों-रात देश भर में ‘हिंदू हृदय सम्राट’ बन गए?? वो कथित हिंदुओं के दिल में इसीलिए राज करने लगे क्योंकि इन लोगों को विश्वास है कि 2002 में जो हुआ वो नरेंद्र मोदी ही कर सकते थे. और ऐसा करने के बाद कोर्ट से बच निकलना उनका एक और हुनर है.

याद कीजिए, 2002 के दंगों के बाद अटल बिहारी वाजपेयी जब नरेंद्र मोदी को ‘राजधर्म के पालन’ की बात कह रहे थे तो मोदी एक कुटिल मुस्कान मुस्कुरा रहे थे. यह मुस्कान एक संदेश लिए थी जिसे देख कर उनके समर्थक आज भी ख़ुश होते हैं. ये वही मुस्कान है जो ‘सबूतों के अभाव में बरी’ होकर कोर्ट से निकलते हुए सफ़ेदपोशों के चेहरों पर होती है. जबकि दुनिया जान रही होती है कि उनकी हक़ीक़त क्या है.

साम्प्रदायिक हिंसा के ये आरोप इन नेताओं को सूट करते हैं, इनकी पॉलिटिक्स को सूट करते हैं. निर्दोष होने का ठप्पा तो सिर्फ़ क़ानूनी तकनीकी है. हक़ीक़त यही है कि ऐसे नेताओं को शक्ति और समर्थन दोनों, इन आरोपों से ही मिलता है.

नरेंद्र मोदी, साध्वी प्रज्ञा, योगी आदित्यनाथ, अकबरुद्दीन ओवैसी और संगीत सोम जैसे तमाम नेता ज़हर से भरे हुए हैं. ये ज़हर ही इनकी पहचान है, यही इनकी योग्यता और यही इनकी यूएसपी भी. और दूसरे धर्म से नफ़रत या द्वेष का जो थोड़ा-थोड़ा ज़हर कई देशवासियों के भीतर है न, वही इन नेताओं का खाद-पानी है.

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