लोकवाणी

मुख़्तलिफ़ आवाज़, निगाह और विचार

रिपोर्ट समाज

बीबीसी की जातिवादी व्यवस्था को उखाड़कर रहेगें, मगर महिलाओं पर बिलो दी बेल्ट हमले सरासर गलत

ज्योति जाटव

कई दिनों से बीबीसी हिंदी में महिला पत्रकार को निकाले जाने के खिलाफ सोशल मीडिया पर एक अभियान चल रहा है. सबसे पहले तो मैं इस अभियान का समर्थन करती हूं, क्योंकि बहुजन समाज को जब तक मीडिया में मौका नहीं मिलेगा, तब तक बहुजनों के साथ होने वाले भेदभावों और अत्याचारों की सही और असली आवाज बाहर नहीं आ सकती. ओमप्रकाश वाल्मीकी का लेखन इसलिए बहुत असरदार और बेहतरीन था क्योंकि उन्होंने सब कुछ खुद झेला था.

इस कैंपेन में सबसे मजबूती से अगर किसी ने दलितों का पक्ष रखा है तो वह हैं, अनिल चमड़िया और जितेंद्र कुमार. अनिल चमड़िया ने बीबीसी से सवाल किया है कि बीबीसी के भारत कार्यालय में लगभग 90 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व क्यों नहीं है? बीबीसी में कुछ विशेष जाति समूहों से संबंधित लोगों को क्यों पसंद किया जाता है? क्या बीबीसी के मैनेजमेंट में बैठे लोग क्या सिर्फ एक निश्चित प्रकार की सोच, ढंग, स्वभाव, लिखने और पढ़ने वालों को पसंद करते हैं? क्या यह एक तरह का जातिवाद नहीं है? जिन्हें केवल इसलिए खारिज कर दिया गया है क्योंकि उन्हें ’अच्छी भाषा’ और पत्रकारिता की कोई समझ नहीं है? आपकी जो भी योग्यता हैं, वह पैकेजिंग के अलावा और कुछ नहीं है. और भारत में, पात्रता की पैकेजिंग की कसौटी जाति है.

वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र कुमार ने मीडियाविजिल पर लिखा, “जब 2006 में हमने (अनिल चमड़िया और योगेन्द्र यादव के साथ-साथ इस लेखक ने) मीडिया के जातिगत चरित्र पर सर्वे किया था तो पता चला था कि दिल्ली के सभी बड़े मीडिया संस्थानों के ऊपर के दस प्रमुख ओहदों पर 88 फीसदी सवर्ण बैठे हुए हैं (13 वर्षों के जिस रूप में सवर्णों की गोलबंदी मजबूत हुई है उस आधार पर मेरा विश्वास है कि यह अब कम से कम 92 से 95 फीसदी से अधिक हो गया होगा, शायद सौ फीसदी भी)।”

जितेंद्र कुमार का लिखा इसलिए वजनदार है क्योंकि वह उल-जलूल बातें करने से बच रहे हैं, ताकि बहुजनों को कोई नुकसान न हो, बल्कि उन्हें मजबूती मिले. वह आगे लिखते हैं, “जिन तीस से अधिक मीडिया संस्थानों का अध्ययन हमने किया था उनमें बीबीसी हिन्दी भी शामिल था। बीबीसी हिन्दी सेवा की स्थापना 1940 में हुई थी, लेकिन अस्सी साल के इतिहास में एक भी गैर-सवर्ण संपादक यहां नहीं हुआ है। संपादक होने की बात तो छोड़िए, जब वहां पिछड़े, दलित और आदिवासी समाज से लोग रखे ही नहीं जाते हैं तो संपादक बनने की बात सोचना भी सरासर बेईमानी है।”

अब आते हैं इस मामले के घटिया पक्ष पर. वह है बीबीसी में काम कर रही महिलाओं को फेसबुक पर बदनाम करने की जालसाजियां. आईआईएमसी बकचोदी पेज ने एक बार महिला दलित पत्रकार मीना कोटवाल के सलेक्शन पर सवाल उठाया था और एक बड़ी ही भद्दी पोस्ट लिखी थी. मीना ने कई बेहतरीन स्टोरिज की हैं, अगर आप उन्हें पढ़ेगें तो खुद व खुद उनकी काबिलीयत का पता लग जाएगा. मीना को उनके काम के लिए प्रतिष्ठित आईआईएमसी अवार्ड भी मिला है.

मीना के अलावा एक महिला पत्रकार हैं, सर्वप्रिया सांगवान. उन्हें लगातार टारगेट किया जा रहा है. उनके खिलाफ लगातार फेसबुक पर माहौल बनाया जा रहा है. सर्वप्रिया हरियाणा के रोहतक के एक आम परिवार से आती हैं. उन्होंने 6 साल एनडीटी में काम किया है और पिछले दो साल से बीबीसी से जुड़ी हुई हैं. उन्हें सवर्ण बताया जा रहा है, लेकिन वह जाट हैं जो कि सवर्ण नहीं शुद्र होते हैं. इसके प्रमाण के लिए कांचा इलेया की यह स्टोरी पढ़ सकते हैं. याद रहे जाटों की भी मीडिया में बहुत कम संख्या है. उनको लगातार कम योग्य घोषित किया जा रहा है, जबकि उनकी तीन स्टोरिज को रेड इंक अवार्ड सराहना पत्र मिले हैं। इसमें योगदान उनका और उनके माता-पिता का ही है, लेकिन लोग जबरदस्ती किसी का नाम भी जोड़ रहे हैं. ऐसा करने वाले लोग इस आंदोलन को कमजोर ही कर रहे हैं. सर्वप्रिया पर बिलो दी बेल्ट बहुत ज्यादा हमले हो रहे हैं. उनके साथ रवीश कुमार का नाम जोड़कर हमले करना सस्ती लोकप्रियता का साधन सा लगता है. यह मीडिया में हमारे बुरे हालातों के खिलाफ लड़ने का आंदोलन है, किसी पर बिलो दी बेल्ट हमले कर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का कोई मौका नहीं.

इसी तरह का हमला बीबीसी की संपादक रूपा झा पर भी हो रहा है. एक जगह तो उनके खिलाफ यौन हिंसात्मक कमेंट भी देखने को मिले हैं. समझ नहीं आ रहा महिलाओं को बदनाम कर, उनके खिलाफ यौन हिंसात्मक कमेंट करके तथाकथित क्रांतिकारी कौन सा न्याय चाह रहे हैं.

हम सभी बहुजनों को अपने हक और अधिकार की लड़ाई लड़नी है. बिल्कुल लड़नी है, लेकिन अगर इसमें महिलाओं को बिना वजह टारगेट किया जाएगा तो इस लड़ाई का असल लक्ष्य भटक जाएगा. हमें याद रखना चाहिए कि इन सवर्ण महिलाओं की लड़ाई भी बाबा साहब ने ही लड़ी थी और इन्हें वो सब अधिकार दिलवाए थे जो मनुवादी सवर्ण पुरूषों ने छीन रखे थे. वह अगर आज होते तो जरूर आप लोगों को महिलाओं पर बिलो दी बेल्ट हमले करने पर धमकाते और अपने आपको आप लोगों से अलग कर लेते.

इसलिए मैं आपसे गुजारिश करती हूं कि इस आंदोलन को शांति से व सभ्य तरीके से जारी रखा जाए. अगर महिलाओं पर इसी तरह बिलो दी बेल्ट हमले जारी रहे तो लोग धीरे-धीरे इससे अपने आपको अलग कर लेगें और हम फिर से अलग-थलग पड़ जाएगें. यकिन मानिए साथियों, बीबीसी की जातिवादी व्यवस्था को उखाड़कर ही दम लेगें, मगर महिलाओं पर बिलो दी बेल्ट हमले सरासर गलत है. उम्मीद है कि आप समझ गए होगें.

आखिर में सभी को जय भीम

LEAVE A RESPONSE

Your email address will not be published. Required fields are marked *