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ब्रिज हादसे में 6 की मौत, ब्रिज गिरने या रेल पलटने से हुई मौतों को देखकर हमें गुस्सा क्यों नहीं आता!

गुरुवार रात को मुंबई में छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (सीएसटी) रेलवे स्टेशन पर फुटओवर ब्रिज गिर जाने से 6 लोगों की मौत हो गई और 30 के करीब लोग घायल हुए हैं. पिछले 2 सालों से लगातार रेल व फुटओवर ब्रिज संबंधित कई हादसे हुए, लेकिन इस पर न सरकार ने ध्यान दिया और न ही लोगों ने. इन्हीं लापरवाहियों और हमारी बीमार मानसिकताओं को दर्शाता अफ़ज़ल का यह लेख पढ़िए…

मुम्बई में ब्रिज गिरा. 6 मरे, तीस घायल. सरकार मुआवज़ा दे देगी. चलो अब दूसरी ख़बरों पे ध्यान दें. हां, मोदी जी क्या खाते हैं, कित्ते घंटे काम करते हैं, राहुल कहां छुट्टी मनाने जाते हैं, प्रियंका-रॉबर्ट वाड्रा कहां हैं, चीन के सामान का विरोध करना है, पच्चीस रुपये वाली पिचकारी जलानी है… ?

ये ज़रूरी ख़बरें हैं भाई, और क्या. बेहद ज़रूरी ख़बरें हैं. क्या मतलब इससे कि कहीं पुल गिर गया, ट्रेन दुर्घटना हो गई, बिना इलाज कोई मर गया.

अरे भाई, ये सब तो ज़माने से होता आया है. राजीव, इंदिरा के ज़माने के केस निकालें क्या…हैं, बोलो ? हां, नेहरू की जगह अगर सरदार पटेल प्रधानमंत्री होते, तब बात कुछ और होती, नहीं ?

कुछ लोग इन हादसों पर दुखी भी होते हैं, अरे हो जाते हैं…क्या करोगे. ख़ैर दुखी हुए, थोड़ी देर समोसे जैसा मुंह बनाया फ़िर लग गए अपने काम में.

बहुत ज़्यादा दुखी हो गए, तो मोमबत्ती-वत्ती जला के रोड पे निकल देंगे, और क्या…इससे ज़्यादा क्या कर सकते हैं भाई.

दुखी होते हैं, होना भी ज़रूरी है. पर दिक्कत ये है कि केवल दुखी ही होते हैं. गुस्सा और शर्म पता नहीं किस तिजोरी में बंद कर के ताला मार देते हैं. हां, अगर कहीं कोई बम फूट जाए…कोई दलित-मुस्लिम किसी गाय के साथ खड़ा भी दिख जाए, तब तो कसम से ग़दर फ़िल्म के सनी देओल के माफ़िक़ अंदर से देशभक्ति फट पड़ती है. “हथियार लाओ, तीन दिन में सेना बनाओ, घुस के मारो”…

अरे भाई साहब, ऐसा लगता है कि बस अब ये कुछ करके ही मानेंगे. ऐसा लगता है जैसे ये जो गुस्सा और देशभक्ति है लोगो की वो एक ‘टर्म और कंडीशन’ पर ही बाहर आती है. बाकी समय सन्नाटे में चले जाते हैं लोग.

क्यूं भाई…इसमें नहीं मरे लोग, बट्टा नहीं लगा इससे देश की साख को, सवाल नहीं पूछने चाहिए सरकार से ? और ये कोई हादसा नहीं रहता है, इस भूल में ना रहें. इत्ते हादसे पीएम, सीएम के दफ्तरों में तो नहीं होते. अधिकारियों की गाड़ियों के तो ब्रेक फ़ेल नहीं होते. ये सारी दिक्कतें आम-ग़रीब आदमी के सामने ही क्यूं आती है? मुश्किल से साल-डेढ़ साल पहले मुम्बई में ही एलफिंस्टन ब्रिज गिरा था. क्या हुआ, कोई जांच हुई…कुछ पता चला?

अमृतसर रेल हादसा, वाराणसी में पुल का गिरना…चलो ख़ैर जाने दो. क्या करोगे. ये तो होता रहता है. हां, चीन की पिचकारी जलानी है, मसूद अज़हर को आतंकी घोषित करवाना है, और कोई ज़रूरी काम है क्या…

अच्छा ठीक, महीने भर बाद वोट डालना है. चुनाव है तो मुमकिन है वोट डालना भाई.

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