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इस्लामोफोबिया के कारण कमरा किराए पर न मिलने से हताश एक मुसलमान का अहम खत….

लेखक: इदरीश मोहम्मद Idrish Mohammed

एक आदमी की कीमत उसकी तात्कालिक पहचान और नजदीकी संभावना तक सीमित कर दी गयी है, एक वोट तक। आदमी एक आंकड़ा बन कर रह गया है, एक वस्तु मात्र। कभी आदमी को उसके दिमाग से नही आंका गया। एक ऐसी चीज़ जो स्टारडस्ट से बनी थी। हर क्षेत्र मे, अध्ययन में, गलियों में, राजनीति में, मरने में और जीने में….- रोहित वेमुला

किसी एक शहर से दूसरे शहर रहने जाना बड़ा दिल दुखाने वाला काम होता है खासकर तब जब आप किसी ऐसे शहर को छोड़ें जिसे आप बहुत पसंद करते हैं और एक ऐसे शहर में रहने जा रहे हो जहाँ आपने कभी खुद से वहाँ न लौटने का वादा किया हो।

किसी दूसरे शहर मे बसना महज़ उस शहर में अपना शरीर और सामान ले जाना नहीं होता, हमें मानसिक तौर पर भी खुद को शिफ्ट करना पड़ता है और यह मेरे लिए सबसे मुश्किल काम था। पर फिर भी ये ज़ख्म तब तक उतना गहरा नही था जब तक मुझे जयपुर में मकान मालिकों का सामना नही करना पड़ा था। दिल्ली में मैं पांच साल होस्टल में ही रहा इसलिए ये मकान मालिकों से बात करना या घर खोजने की मशक्कत से मैं उतना वाकिफ नहीं था।

मैंने लगभग 5 साल कानून की पढ़ाई करते हुए दिल्ली मे गुज़ारे। दिल्ली खूबसूरत शहर था, यहाँ सब कुछ था। इस शहर ने मुझे वो सबकुछ सिखाया जो भी मैं आज जनता हूँ पर वो वक़्त आ चुका था जब मुझे जयपुर रहने जाना था, जी हां जयपुर, वही शहर जिसे दिल्ली बसने से पहले मैं बिल्कुल पसंद नही करता था। पर मैं परिस्थितियों के अनुकूल चलता गया और मैंने एक पेशेवर शोधकर्ता के रूप मे अपने कैरियर की शुरुआत की।

पर अब मेरा औपचारिक छात्र जीवन खत्म हो चुका था और मैं जयपुर में एक घर तलाश कर रहा था। मैं आपको उस कारण से रूबरू करवा देता हूँ जिसके चलते मैंने जयपुर न लौटने का वादा खुद से किया था। साल 2012 की बात है में कुछ वक्त के लिए जयपुर में था और कोई भी मुझे किरायेदार के तौर पर स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था, उनके लिए कारण साफ था, मैं एक मुसलमान हूँ और उनके लिए यही मेरी तात्कालिक पहचान थी।

साल 2012 में ही जब एक मकान मालकिन ने मुझे उनके पेइंग गेस्ट के तौर पर PG में रहने को इज़ाज़त दी तब उन्हें ये नहीं पता था कि मैं मुस्लिम हूँ। जब उन्हें इस बात का पता चला उन्होंने अगले ही दिन मेरा पुलिस वेरिफिकेशन करवाया। उन्होंने साफ तौर पर मुझसे कह दिया की मैं उन्हें सूरत से मासूम लगा और मुझे देखकर उन्हें ये नहीं लगा था कि मैं मुस्लिम हूँ (इस बात के बारे में मैं आज तक सोचता हूँ कि तारीफ की तरह लूँ या बेज्जती की तरह)। दो महीने उनके होस्टल में रहने के बाद मैं किसी ओर जगह जाकर रहने लगा जो मेरे किसी साथी ने बताई थी और उसने संदर्भ दिया था, इस जगह भी मकान मालकिन ने ज्यादा पूछताछ नहीं की और मुझे रहने के लिए कमरा दे दिया।

ये दौर गुज़र गया और 2018 में मैं फिर उसी परिस्तिथि में खड़ा था। इस दफा में अपना नाम मकान मालकिन को बताने का इछुक नहीं था लेकिन मैं उन्हें किसी अंधेरे में नहीं रखना चाहता था। मेरे नाम के साथ एक समस्या ये भी है कि मेरा पहला नाम राजस्थान के लोगों के लिए कुछ अस्पष्ट है क्योंकि इससे मेरे धर्म का पता नहीं चलता इसलिए वो मुझसे मेरा पूरा नाम पूछते है जिससे उन्हें मेरी तात्कालिक पहचान पता चलती है। इसके बाद दूसरी ओर से ज़ाहिर सा जवाब मिलता है, यह आवास मुसलमानो के लिए नहीं है।

कुछ ऐसी बाते हैं जो मेरे इस अनुभव को बाकी कहानियां जो आप पढ़ते है उनसे अलग बनाती हैं। इसका कारण ये है कि मैंने इस बात की तह तक जाने की कोशिश की, कि एक मुस्लिम के लिए अपने पसंद के इलाके में घर मिलना मुश्किल क्यों है। जब मकान मालिक मुझसे ना कहते हैं तो मैं उनके इस फैसले के पीछे का कारण पूछता हूँ। पहले वो यही कहते हैं कि हमें मांस मछली खाने वाले किरायेदार नहीं चाहिए पर ये निश्चित ही एक बहाना होता था। उनकी इस बात को गलत साबित करने के लिए मैंने उनसे कहा कि मैं शाकाहारी ही हूँ और खाना बनाना नहीं जानता, मुझे बस रहने के लिए घर चाहिए और मैं खाना बाहर ही खाया करूंगा।

कभी-कभी मकानमालिक खुद को सवालों में फंसा हुआ पाते और अगर उन्हें कोई चारा नज़र नही आता. हाँ कहने के सिवाय तो वह अगला तीर किराया बढ़ा चढ़ा कर बताने का लगाते, जो कि आम किराये से काफी ज्यादा होता था। फ़िज़ूल के ज्यादा किराये के कारण किरायेदार को मना करना ही पड़ता।

बहुत बार तो यह समझना मुश्किल होता था कि मकान मालिक किरायेदार ढूंढ रहे है या दामाद। ऐसे ही एक मकान मालिक को मैंने फ़ोन किया जो कि कायस्थ थे, मुझे जानने के बाद वो कहने लगे कि वो एक जैन परिवार ढूंढ रहे है। पहली दफा जब मैंने उन्हें कहा कि मैं सरकारी संगठन में काम करता हूँ तब वह खुश हुए पर मेरा नाम सुनकर उनकी सारी खुशी चली गयी।

एक मकानमालिक ने मुझे काफी साफ तौर पर मुसलमानों को घर किराये नहीं देने का कारण बताया, हालांकि मैं उन कारणों से सहमत नही हूँ। उन्होंने कहा कि उन्होंने मुसलमानो को गंदे इलाको में रहते देखा है, जैसे कि रामगंज (जयपुर की मुस्लिम बस्ती) और वे गंदी भाषा का इस्तेमाल करते है, लड़ाई झगड़े और दंगे करना उनके खून में होता है। जब ये अंकल मुझसे मिले वे थोड़े चकित लगे और उन्होंने मुझसे कहा कि तुम देखने मे मुस्लिम नहीं लगते। मैं बहुत दुखी हुआ और मेरी मुस्लिम दिखने की सारी मेहनत बेकार हो गयी।

अगर तस्वीर बड़ी करके देखे तो एक कारण इस्लामोफोबिया है। लोगों का सोचना है कि मुस्लिम किरायेदार इसलिए मसला खड़ा कर सकते हैं क्योंकि उनके किसी आतंकी संगठन से जुड़े होने की संभावना और हिंसा में लिप्त होने की संभावना अधिक है। मुझे याद है 2013 कि एक घटना जब हैदराबाद शहर में बम विस्फोट हुआ था, मैंने फेसबुक पर ये खबर देखी और अपनी मकान मालकिन से ये खबर देते हुए टीवी ऑन करने को कहा। कुछ ही देर बाद बाकी के कुछ किरायेदार और मकान मालकिन के परिवार के लोग भी साथ में बैठ गए। अचानक उन्होंने मुझसे पूछा कि मुझे ये खबर इतनी जल्दी कैसे मिल गयी। वे यह कहना चाह रहे थे कि कही मेरा इस बम धमाके से कोई संबंध तोह नही! ये देखना बहुत निराशाजनक था कि मेरे बारे मे सब कुछ जानते हुए भी वो ऐसा सोच रहे थे।

अगली कहानी और भी दिलचस्प है। घर ढूंढने के दौरान ही मैं एक वकील से मिला और हम अच्छे दोस्त बन गए। हमने साथ रहने के इरादे से एक साथ घर ढूंढना शुरू किया। इस बार मैंने घर दिलाने वाली एक एजेंसी को फोन किया जिसने हम दोनों का ब्यौरा लिया। मेरा दोस्त जो कि जाट है और पेशे से वकील है और मैं मुस्लिम जो कि अभ्यासरत वकील नहीं पर सरकारी मुलाज़िम हूँ। अब मकानमालिकों को एक जाट, एक वकील, एक मुसलमान अपने घर मे नहीं चाहिए क्योंकि ये तीनो एक बड़ा ही घातक मेल बनते हैं।

यहां जयपुर मैं सभी को एक ऐसा किरायेदार चाहिए जो पढ़ा लिखा हो, सभ्य हो, ठीक दिखता हो, सुबह निकले और शाम को लौट आये, वगैरह वगैरह। मैं अगर इनमे से कुछ शर्तें पूरी कर भी दूं , मगर जैसे ही मेरा नाम उन्हें सुनाई पड़ता है सारी अनूभूति ही बदल जाती है।

मैं एक मकान मालकिन से मिला जिन्होंने NGO सेक्टर में कार्यरत होने का दावा किया और शिक्षा के क्षेत्र में अनुभव होने का भी। वह घर किराये देने को पूरी तरह तैयार थी। 10 मिनट की कुछ बातचीत के बाद उन्होंने हमारा नाम पूछा, ये ”चौधरी” और ”मोहम्मद” था। सारा उदारवाद का चोगा जिससे उन्होंने चेहरा ढका हुआ था वह गिर गया। उनका चेहरा साफ कह रहा था कोई मुस्लिम किरायेदार नहीं।

सारे मकान मालिक एक जैसे बहाने नहीं बनाते, वो दावा करते हैं कि उन्हें मुस्लिम किरायेदार से कोई परेशानी नहीं है पर उनके पड़ोस के लोगों को मोहल्ले में कोई मुस्लिम किरायेदार नहीं चाहिए। इस तरह वे सारे जिम्मा पड़ोसियों पर डाल देते हैं। वे कहते हैं कि आखिरकार उन्हें इसी मोहल्ले में रहना है, किरायेदार तो आते जाते रहते हैं। एक मकानमालिक ने तो मुझसे ये तक पूछ डाला कि मेरे साथ रहने वाला कोई कहीं बुरखा या कुर्ता पायजामा तो नहींं पहनता ना!! इसका मतलब यही था कि इस आवास में रहने वाला कोई मुसलमान की तरह नहींं दिखना चाहिए। मोहल्ले में किसी को पता नहींं चलना चाहिए कि यहां कोई मुसलमान रह रहा है, मैं यह शहर के एक बहुत ही पॉश इलाके की बात कर रहा हूँ।

लोग मुझे कहते हैंं कि यह मकान मालिकों की निजी इच्छा का सवाल है कि वे जिसे चाहे घर देंं। पर मैं इसे साम्प्रदायिकता, नस्लभेद और मुसलमानों पर किया जाने वाला अत्याचार कहूँगा, क्योंकि निजी ही राजनैतिक है।

.पूरे देश भर मैं मुसलमानो को गंदी बस्तियों में रहने को लेकर दोष दिया जाता है, कहा जाता है कि वे और संस्कृतियों से घुलते मिलते नहींं हैंं, उन्हें अलग रहना पसंद है। लेकिन जब वे उन गंदी बस्तियों से बाहर आना चाहते हैंं तो आप उनका स्वागत नहींं करते हैंं बल्कि आप ये सुनिश्चित करते हैंं कि वे उनकी बस्तियों और उनकी तात्कालिक पहचान तक ही सिमट कर रह जाएंं।

एक और बात जो मुझे दुखी करती है वो ये है कि जब भी मैं मकान खोजते हुए किसी नए व्यक्ति से मिलता हूँ और अपनी धार्मिक पहचान बताता हूँ मुझे वे ये सलाह देते है की मैं मुस्लिम बस्ती में ही घर ढूंढ लूँ। क्या ये कोई नया बहाना है इस्लामोफोबिया के अभ्यास का?

क्यों मुझे मुस्लिम इलाकों में ही घर खोजना चाहिए? क्या मैं कहीं भी आज़ादी से रहने के लिए एक अच्छा नागरिक नहीं हूँ? क्या मुझे एक दोयम दर्जे के नागरिक होने तक सीमित नहीं किया जा रहा?

आखिरी में मैं ये बताना चाहूंगा कि हमारे समाज को हर चीज़ जैसे कि जाति, वर्ग, धर्म, लिंग, काम, रंग आदि के प्रति पक्षपात से भरे हुए, एक तरफ झुके हुए चलाया जा रहा है। हमारे समाज के लोग आने पूर्वजोंं से मिले हुए पूर्वाग्रहों से भरे होते हैंं। मैं उम्मीद करता हूँ ये खत आने वाली पीढ़ी के लिए इस बात का सबूत बने की किस तरह उनके पूर्वजोंं ने इस्लामोफोबिया को प्रैक्टिस किया। इसी के साथ मेरे घर ढूंढने की और समाज को समझने की कोशिश जारी है।

  • इदरीश मोहम्मद जयपुर में एक कानूनी शोधकर्ता हैंं

2 COMMENTS

  1. मजहब-ए-इस्लाम की दहशत भी लोगों के दिलों में कायम रहे और इस्लामोफोबिया भी न रहे, ये दोनों विरोधी बातेंं हैंं।ऐसी परिस्थियों के लिये मुसलमान स्वयं जिम्मेदार हैं

  2. Are bhai esa sirf muslimo ke sath hi nahi hota sc st ke sath ye log 5000 salo se kar rahe he. Upar se unhe hindu bhi kahte he

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