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नफ़रत के पुतले

आप दलितों के प्रति इतनी नफ़रत कहाँ संभाल कर रखते हैं जो आपके लेखक वगैराह हो जाने के बावजूद बरक़रार रहती है और आपकी सारी स्मार्टनेस उसे छुपा नहीं पाती? आप उसे छुपाना भी कहां चाहते हैं?

फिलहाल मैं यह बात ‘समयांतर’ के जनवरी 2019 अंक में छपे एक लेख साहित्य अकादेमी या द्विज साहित्य अकादेमी? पर पंकज पाराशर की प्रतिक्रिया और उस पर लाहलोट होने वालों के संदर्भ में कह रहा हूँ। पाराशर की फेसबुक पोस्ट को पढ़कर लगता है कि डॉ. आंबेडकर ने किसी कमसिन लड़की को अगवा करके या बहला-फुसला करके शादी कर ली होगी। पाराशर कहते हैं कि तो क्या अपने से बारह वर्ष छोटी महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मण परिवार से तआल्लुक रखने वाली शारदा कबीर से बाबासाहब भीमराव अंबेदकर के विवाह करने के कारण आप उन्हें आधा ब्राह्मण घोषित करेंगे? शारदा कबीर (सविता आंबेडकर) की जब आम्बेडकर से शादी हुई तो उनकी उम्र 39 साल थी। 39 साल की महिला को पाराशर अपना निर्णय लेने वाली व्यस्क स्त्री समझते हैं या नहीं? या पाराशर भी चितपावन ब्राह्मण महिला की शादी 'शूद्' से हो जाने को लेकर व्यथित हैं? वे इस वाक्य का भी इस्तेमाल करते हैं, "दूसरी शादी करनी ही थी तो किसी दलित महिला का उद्धार क्यों नहीं किया?” अगर वह यह वाक्य दलितों की तरफ़ से कर रहे हैं तो मैं यह जानने का इच्छुक हूँ कि यह उद्धार शब्द उन्होंने कहाँ से लिया। क्योंकि यह कोई दलित कहे या कोई ब्राह्मण, उतनी ही वाहियात बात है। विवाह को किसी स्त्री का उद्धार कहना दिमाग़ी दिवालियापन है।

लेकिन यह देखना महत्वपूर्ण है कि पाराशर अचानक आंबेडकर पर यह टिप्पणी क्यों कर रहे हैं। वे ‘साहित्य अकादेमी या द्विज साहित्य अकादेमी?’ लेख से आहत हैं और लेख के मूल मुद्दे पर परदापोशी के लिए नासिरा शर्मा को शर्मा देखे जाने की व्याख्या करते हैं। “नासिरा शर्मा को यदि प्रो. शर्मा से विवाह करने के कारण आपने आधा ब्राह्मण घोषित किया है, तो क्या अपने से बारह वर्ष छोटी महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मण परिवार से तआल्लुक रखने वाली शारदा कबीर से बाबासाहब भीमराव अंबेदकर के विवाह करने के कारण आप उन्हें आधा ब्राह्मण घोषित करेंगे?” दिलचस्प यही है कि ‘समयांतर’ भारतीय समाज पर जिस भयानक ब्राह्मणवादी जकड़न का निर्लज्ज असर साहित्य जगत पर होने का सवाल उठाते हैं, पाराशर उसे साबित करने से चूकना नहीं चाहते। वे सीधे आंबेडकर पर पहुंचते हैं और अश्लील, यौन कुंठित व मर्दवादी बेशर्मी का प्रदर्शन करते हुए मर्दवाद पर चिंता जताने लगते हैं। हैरानी नहीं होती कि बर्बर ब्राह्मणवादी लेखक-लेखिकाएं लाइक और वाह-वाह करते हुए वहां मंडराने लगते हैं। भारतीय ब्राह्मणवादी स्त्रीवादी लेखिकाएं भी।

पाराशर की पोस्ट पर वरिष्ठ कवि असद ज़ैदी कमेंट करते हैं- 
“अपने से बारह वर्ष छोटी” … “शादी करनी ही थी तो किसी दलित महिला का उद्धार क्यों नहीं किया?” जैसे अवांछनीय इशारों से आपकी मूल आपत्ति का वज़न कम होता है। यह किस तरह का स्त्री समर्थन हुआ, जहाँ उसकी मर्ज़ी या अभिकर्तृत्व (एजेंसी) पर ध्यान ही नहीं दिया जा रहा? वैसे भी फ़ेहरिस्त जिस विषमता को सामने लाती है वह कम प्रासंगिक नहीं है।

पाराशर जवाब देते हैं-
“Asad Zaidi भाई जान, जिन बातों को आप ‘अवांछनीय’ कहते हुए महज़ इशारे तक महदूद कर रहे हैं, वे बातें अब तवारीख़ का हिस्सा हैं. रही बात फ़ेहरिस्त की, तो मैंने अपनी टिप्पणी में एकदम साफ़गोई से कहा है, ‘तथ्य के हिसाब से तो कोई ग़लती नहीं है, लेकिन इस कथित अन्वेषण के मर्दवादी रवैये से मेरी असहमति है.’ ‘समयांतर’ की ख़ासियत है कि ‘असहमति का साहस और सहमति के विवेक’ का विकेन्द्रीकरण पत्रिका पाठकों तक भी करती है!”

अफ़सोस कि पाराशर असद जी के कमेंट को समझना भी नहीं चाहते कि किस तरह वे एक स्वीपिंग कमेंट के जरिये यह भ्रम देते हैं कि आंबेडकर ने किसी नाबालिग से शादी की होगी। असल में पाराशर आंबेडकर को न खींचते और इस तरह की टिप्पणियां न करते तो क्या करते? लेख के साथ नत्थी साहित्य अकादमी पुरस्कारों (हिंदी) की सूची में द्बिजों का संपूर्ण आरक्षण सवालों के घेरे में आए और उस पर बहस संभव न हो तो एक ब्राह्मण मन क्या करे? यही करेगा और छुपा नहीं पाएगा। ‘तथ्य के हिसाब से तो कोई ग़लती नहीं है’ कहकर कुछ और करने लगेगा। क्या इतना कहना काफी है। यह तथ्य संभव क्यों है? इसलिए कि प्रगतिशीलता और लेखन का चोला भी इस बेशर्मी को बनाए रखने में ही योगदान देने के काम आता है, सवाल उठाने पर और ज्यादा नफ़रत का जहर उगलता है और भरपूर समर्थन पाता है।

पोस्ट लंबी हो जाने के खतरे के बावजूद इस संदर्भ में लिखी गई अपनी आज की ही पोस्ट को भी यहां दोहरा रहा हूँ क्योंकि मुझे लगता है कि सवर्णों के कब्जे वाली साहित्य की दुनिया के कंट्रोल्ड मंचों के मुक़ाबले फेसबुक ज़्यादा लोकतांत्रिक जगह है। कोई चुप्पी साधे या अनदेखी करने का नाटक करे, जवाब सही जगह पहुंचता है। सो आज की पुरानी पोस्ट भी-

“साहित्य अकादमी के सन् 1955 से लेकर 2017 तक के हिंदी में सम्मान प्राप्त करने वालों की वर्षवार सूची दी जा रही है। दूरबीन लेकर ढूंढिये, सूची में एक भी पिछड़े, शूद्र, अतिशूद्र, अल्पसंख्यक (नारी या पुरुष) का नाम है? साहित्य अकादमी के कर्ताधर्ता, विद्वान और भारत सरकार के लोग क्या बताने की कृपा करेंगे कि आखिर ऐसा क्यों है!…. “
(समयांतर के जनवरी 2019 अंक में छपे ‘साहित्य अकादेमी या द्विज साहित्य अकादेमी?’ लेख से)
इस लेख के साथ ‘साहित्य अकादेमी सम्मान (हिंदी)’ की सूची भी नत्थी है जिसके साथ पुरस्कृतों की जाति भी नत्थी कर दी गई है।
सवाल यह है कि यह एक निरंतर संयोग है या संयोगी नियम। सवाल यह है कि हमारे लेखकगण इस स्थिति से कभी विचलित क्यों नहीं हुए। क्यों नहीं किसी द्विज ने शर्मसार होकर पुरस्कार को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि मैं इस शर्मनाक सूची को और शर्मनाक बनाने में योगदान नहीं दे सकता? या सारे चुप्पा पुरस्कृत और अपुरस्कृत लेखक-लेखिकाएं उस बेशर्म पत्रकार प्रभाष जोशी की तरह यह मानते हैं कि सभी क्षेत्रों में श्रेष्ठ प्रतिभाएं ब्राह्मण वंश से ही आती हैं? घिनौने प्रभाष जोशी की इस घृणोक्ति का हवाला इस लेख में नाम लिए बिना किया गया है।
सवाल तो बहुत सारे हैं पर साहित्य के सितारे और उनके शिष्यगण कभी बोले नहीं तो अब क्यों बोलने लगे। हाँ, यह दिलचस्प है कि कोई सवाल उठाए तो बौद्धिक जुगाली के लिए मूल मुद्दे को भटका देने का नुस्खा आजमाया जाता है। इस लेख में तीन वाक्य ये भी हैं- “आश्चर्य की बात है कि इस सूची में कोई मुसलमान लेखक भी नहीं है- राही मासूम रजा, शानी, बदी उज्जमा, अब्दुल बिस्मिल्ला, असगर वजाहत, आबिद सुरती…कोई नहीं। सूची में जिन चार महिला लेखकों के नाम हैं, उनमें एक भी पिछड़े, दलित (शूद्र, अति शूद्र) परिवारों की नहीं हैं। जो एक हैं नासिरा शर्मा उनके साथ भी शर्मा (ब्राह्मण) लगा है।” हमारे द्विज दोस्त इस पूरे लेख में नासिरा शर्मा के साथ उनके ब्राह्मण लगे होने के जिक्र के पीछे मर्दवादी मानसिकता की व्याख्या पर विमर्श लेकर उतरे हैं। यहां तक कि डॉ. आंबोडकर और उनकी पत्नी को भी ऐसे विवादास्पद वाक्यों के साथ यहां खींच लिया गया है जो मर्दवादी, ब्राह्मणवादी और यौन कुंठित बुद्धि का परिचय दे रहे हैं। 
सबसे पहले तो यह कि नासिरा जो विचारवान महिला हैं, उन्होंने ‘ख़ुद’ विवाह के बाद अपने नाम के साथ शर्मा (ब्राह्मण) जोड़ लिया है। अगर उनके नाम के साथ शर्मा विवाह से पहले ही जुड़ा हुआ था तो कोई मेरी ग़लती सुधार सकता है। लेखिका के इस स्वघोषित ‘तथ्य’ को एक ऐसा भयानक मसला रखते हुए क्यों अनदेखा किया जाना चाहिए? यह चीज़ क्यों नहीं ध्यान खींचने वाली है कि पिछड़ी, दलित और अल्पसंख्यक महिलाओं के टोटे वाली सूची में जिस एक मुस्लिम महिला का नाम है, वह ब्राह्मण परिवार से आती है? क्या ताकत और अघोषित जोड़तोड़ (जो परिवारों की जाति के प्रभाव के आधार पर स्वत:स्फूर्त भी होते हैं) तक में परिवार की जाति का रुतबा असरदार नहीं होता है?
जो द्विज लेखक-लेखिकाएं साहित्य अकादमी (अंतत: द्विजों के असर वाली साहित्य अकादमी) के निर्लज्ज नियम पर उठे सवाल पर बात नहीं करना चाहते हैं और इसे छुपा देना चाहते हैं, उन पर लानत।
और स्त्री की कोई जाति नहीं होती, यह ठीक है। लेकिन, द्विज स्त्रियों की जाति होती है, गैर द्विज जाति के स्त्री-पुरुष-बच्चों के साथ अन्याय का सुख लेने के लिए, प्रिविलेज लेने के लिए और अन्याय कर लेने के लिए। 
बाकी, विमर्श परदेदारी के काम भी आते हैं और द्विज स्त्री-पुरुष इसमें माहिर हैं।

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