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राजनीति रिपोर्ट

मोदी का कृत्रिम महानायकत्व, अंतराष्ट्रीय राजनीति और निजीकरण

हेमंत कुमार झा

ऐसा नहीं है कि ब्लादिमीर पुतिन के साथ रूस की जनता का व्यापक समर्थन है या शी जिनपिंग चीन की मेहनत कश जनता के ह्रदय सम्राट हैं। लेकिन, पुतिन दो दशकों से रूस के एकछत्र सम्राट बने हुए हैं और शी ने लंबे अरसे तक सत्ता में बने रहने की संवैधानिक पात्रता प्राप्त कर ली है।

निकट भविष्य में पुतिन या शी की सत्ता को चुनौती मिले, इसकी भी कोई संभावना नजर नहीं आती। रूस या चीन की मीडिया की नजरों से देखें तो पुतिन और शी अपने देश के सर्वाधिक लोकप्रिय राजनेता हैं। न सिर्फ लोकप्रिय, बल्कि मीडिया उन्हें ऐसे प्रस्तुत करती है जैसे वे जनता के हृदयहार और देश के तारणहार हों।

चीन में तो एक पार्टी का शासन है और वहां राजनीतिक प्रतिरोध की कोई संभावना ही उभरने नहीं दी जाती, जबकि रूस में प्रतिरोध की आवाजों को बेरहमी से कुचला जाता है। रूस में चुनाव भी होते हैं। अभी पिछले वर्ष 2018 में रूस में हुए चुनाव में पुतिन को 75 प्रतिशत वोट मिले और वे अगले कार्यकाल के लिये फिर से निर्वाचित घोषित किये गए। लेकिन, चुनाव परिणाम घोषित होने के पहले भी देश-दुनिया में सबको पता था कि पुतिन ही जीतेंगे… बल्कि भारी बहुमत से जीतेंगे। 1999 से वे तमाम चुनाव प्रबल बहुमत से जीतते आ रहे हैं। कैसे…यह सब जानते हैं लेकिन बोलता कोई नहीं।

शी जिनपिंग को तो चुनाव का सामना ही नहीं है। कौन नहीं जानता कि चीन का निर्धन तबका, जो देश की जनसंख्या में बहुतायत में है, त्राहि-त्राहि कर रहा है। आर्थिक लाभ ऊपर के लोगों की जेब में पहुंच रहा है और निर्धन वर्ग हाशिये पर है।

श्रमिकों, कर्मचारियों के साथ कंपनियों की अमानवीय मनमानी की जो खबरें यदा-कदा चीन से छन कर बाहर आती हैं वे रूह कंपाने वाली हैं। चीन ने कारपोरेटवाद का जो चेहरा दिखाया है उसके लिये एक ही शब्द ज़ेहन में आता है…’वीभत्स’।

लेकिन, चीन के अखबार और टीवी चैनल शी जिनपिंग की जयजयकार से भरे हैं। और तो और…उन्हें ऐसे प्रस्तुत किया जा रहा है मानो वे चीन की जनता के उद्धार के लिये अवतरित हुए हैं और जनता उन्हें पूजती है।

ऐसा ही कुछ रूस में भी है। कारपोरेट राज का जो मंजर रूस में है उसमें आम लोगों के शोषण और उनकी हताशा का कोई संज्ञान तक लेने वाला नहीं। बोल्शेविक क्रांति की धरती पर आर्थिक अन्याय को संस्थागत रूप दे दिया गया है।

और…पुतिन रूसी राष्ट्रवाद के अवतारी नायक की तरह वहां की मीडिया में दिखाए जाते हैं जिन्होंने रूस को पतन के दलदल से बाहर निकाल कर फिर से एक महाशक्ति का दर्जा दिलाया।

यह पूरी तरह गलत भी नहीं है। रूस के नए उत्थान में पुतिन की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
लेकिन, किस कीमत पर…?

रूस का आम आदमी विकास के लाभों से वंचित है। श्रमिक अधिकार सीमित किये गए हैं और उच्च एवं निम्न श्रेणी के लोगों की आमदनी का अंतर बढ़ता जा रहा है। संपदा सीमित हाथों में सिमटती जा रही है। दिखाया जाता है कि जनता के बीच पुतिन की छवि महानायक की है और आम लोग सत्ता में उनके विकल्प के बारे में सोचने को भी तैयार नहीं।

यह दौर कृत्रिम महानायकत्व का है। ऐसा छद्म महानायकत्व, जिसे शक्तिशाली वर्ग के हितों के अनुसार किसी राजनेता को ओढ़ाया जाता है। जब चीन में चुनाव होते ही नहीं और रूस में चुनाव के नाम पर नौटंकी होती है तो यह कौन बता सकता है कि वहां के आम लोग शी जिनपिंग या पुतिन के बारे में असल में क्या सोचते हैं।

वह दौर बीत गया जब मीडिया को नियंत्रित किया जाता था। अब तो मीडिया अनुगामी की भूमिका में है। सत्ता-संरचना के एक प्रभावी कंपोनेंट के रूप में वह अपनी तयशुदा भूमिका निभाता है, जनता को दिग्भ्रमित करता है और मिथकों का एक कृत्रिम संसार रचता है।

आखिर वे कौन सी शक्तियां हैं जो शी जिनपिंग और ब्लादिमीर पुतिन को सत्ता शीर्ष पर निरंतरता देती हैं? उनके लगातार सत्ता में बने रहने से किनके हित सधते हैं? क्या यह भी कोई रहस्य है?

चीन का कारपोरेट वर्ग और रूस का अभिजात वर्ग शी और पुतिन के पीछे खड़े हैं। जबसे शी जिनपिंग सत्ता में आए है, कारपोरेट के हितों में उन्होंने खुल कर कदम बढ़ाए हैं। चीन की अंतरराष्ट्रीय महत्वाकांक्षाएँ भी इस दौरान बढ़ी हैं और इसे चीन की अस्मिता से जोड़ कर जनता के बीच यह संदेश देने की कोशिश की गई कि शी के दौर में दुनिया मे चीन का मान बढ़ा है।

यह अलग बात है कि इस दौरान चीन आर्थिक मोर्चे पर संकटों से घिरता गया है और उसकी विकास दर में ह्रास देखा गया।

पुतिन और शी जिनपिंग का सत्ता में बने रहना उनके देशों के बड़े कारपोरेट समूहों के हित मे है। इसके लिये ये समूह हर हथकंडा अपनाते हैं।

पुतिन की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति हथियार लॉबी को भाती है। सीरिया संकट में रूस की भूमिका इस संदर्भ में उल्लेखनीय है।

भारत में भी…नरेंद्र मोदी को बनाए रखने में किनके हित हैं?

क्या यह भी कोई रहस्य रह गया है?

देश का अभिजात तबका ‘मोदी मोदी’ की रट यूं ही नहीं लगाता। बड़े कारपोरेट घराने यूं ही मोदी के पीछे खड़े नहीं हैं। सबके हित जुड़े हुए हैं।

निजीकरण…वाया निगमीकरण के लिये रेलवे के बाबुओं को तैयार रहना होगा, देश को तैयार रहना होगा, बड़े हवाई अड्डों, सार्वजनिक क्षेत्र की लाभकारी कंपनियों की बिकी के लिये सबको तैयार रहना होगा। अंध निजीकरण… अंधाधुंध निजीकरण के लिये देश को तैयार रहना होगा। आखिर…हमारे देश में भी एक ‘महानायक’ उभरा है। ऊपर से देवगण पुष्पवर्षा कर रहे हैं और नीचे ‘मोदी मोदी’ का जयघोष है। दुनिया मे देश का मान बढ़ने का मिथक रचा जा रहा है।

कौन नहीं जानता कि मोदी को फिर से सत्ता में लाने के लिये पैसों की कैसी गंगा बहाई गई? किसने बहाई यह गंगा। किन लोगों ने इसमें डुबकी लगाई?

जिसने भी गंगा बहाई, मिथकों का कृत्रिम संसार रचा… वही धीरे-धीरे रेलवे, बैंक, हवाई अड्डे, यूनिवर्सिटी सहित पब्लिक सेक्टर की तमाम कंपनियां खरीदेंगे। वे और धनी होंगे, और ताकतवर होंगे।

नरेंद्र मोदी का सूरज अस्त होने के बाद वे किसी और बौने में महानायकत्व आरोपित कर देंगे। वे हमें समझाएंगे…यही है तुम्हारा तारणहार। और…हम में से अधिकतर के ज़ाहिल होने में कोई संदेह भी बच गया है क्या?

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