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रिपोर्ट

नरेंद्र मोदी दरअसल एक बेहतरीन सेल्समैन हैं, पूंजीपतियों का एजेंट भी कह सकते हैं!

सुशील मानव

मोदी सरकार ने “सरकारी योजनाएं” अपने चहेते पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए बनाई थी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद को समय समय पर डिफाइन करते रहे हैं। कभी उन्होंने खुद को प्रधानसेवक बताया, कभी चौकीदार कभी फकीर तो कभी 56 इंच वाला मर्द। लेकिन नरेंद्र मोदी खुद को कभी सही से परिभाषित नहीं कर सके। नरेंद्र मोदी दरअसल एक बेहतरीन सेल्समैन हैं, एजेंट भी कह सकते हैं।

एक सेल्समैन या एजेंट कस्टमर का तरह तरह से ब्रेनवाश करता है और फिर उसे कोई सामान बेंचता है। बड़े बड़े मार्केट गुरु सिखाते हैं कि बेंचने की प्रक्रिया में सेल्समैन को पहले खुद को बेंचने का हुनर विकसित करना होता है फिर सामान को। मोदी में ये दोनो खूबी थी। उन्होंने कई चीजें एजेंट के तौर पर बेंची और कई सेल्समैन के तौर पर। पहले हम उनकी नीतियों और योजनाओं पर बात करेंगे। जन कल्याण की योजनाएं होती क्या हैं पहले ये समझिए। जनकल्याण की योजनाएं वो होती हैं जिनका प्रत्यक्ष फायदा जनता को मिले। जैसे मनरेगा है, जैसे अनाज योजना है, एलपीजी गैस, केरोसीन पर सब्सिडी है। लेकिन मोदी की सरकार ने जन कल्याण योजना के नाम पर जो किया वो जनता के कल्याण की नहीं बल्कि संबंधित कंपनी के कल्याण की योजना है।

जैसे उज्ज्वला योजना के तहत मोदी सरकार दावा करती है कि उसने 7 करोड़ गैस कनेक्शन दिया। सवाल ये उठता है कि गैस कनेक्शन देने के बाद सरकार इन्हें इससे संबंधित कोई और सुविधा या सब्सिडी दे रही थी या नहीं। जाहिर है सरकार की स्कीम सिर्फ गैस कनेक्शन देने की थी।

जबकि एक ताजा सर्वे में खुलासा हुआ है कि उज्ज्वला योजना का कोई लाभ नहीं हुआ, क्योंकि जो लोग पहले मिट्टी के चूल्हे पर खाना बनाते थे वो अब भी बना रहे हैं। इसका आशय ये है कि मोदी ने करोड़ लोगों को गैस कनेक्शन देकर 6 करोड लोगों को संबंधित गैस कंपनी का कस्टमर बनाया। बटाई पर खेती करनेवाली यूपी के एक छोटे से गांव की रजमनिया बताती हैं कि उन्हें भी उज्जवला योजना के तहत गैस कनेक्शन मिला है लेकिन उन्होंने कभी इसे भरवाया नहीं। वो कहती हैं हमारी इतनी आमदनी नहीं कि हम ईंधन भराने पर पैसे खर्च कर सकें।

इसी तरह एक योजना थी जन-धन योजना। जन धन योजना के तहत गांव के लोगों के मुफ्त खाते खुलवाकर उन्हें बैंकों के कस्टमर बना दिए। लेकिन खाते खुलवाने से उसमें अपने आप पैसे तो आएंगे नहीं। अलबत्ता इन जन-धन खातों का इस्तेमाल बैंक सरकार और पूंजीपतियों द्वारा नोटबंदी के दौरान काले धन को सफेद धन बनाने में खूब किया गया। राजस्थान के दिहाड़ी मजदूर मीठालाल बताते हैं कि जन धन योजना के तहत मेरा भी खाता खुलवाया गया था। पर उसमें कभी पैसे आने तो दूर जो पैसे हमने जमा किए थे उन्हें भी भतीजी की शादी के समय निकालने में बहुत पापड़ बेलने पड़े थे।

इसी तरह मोदी सरकार की एक घोषित योजना थी डिजिटल इंडिया। डिजिटल इंडिया के पीछे की अघोषित योजना थी जियो योजना। जियो योजना का इस्तेमाल मोदी सरकार ने इंडिया को डिजिटल बनाने और सरकारी कंपनी बीएसएनएल को बर्बारद करने के लिए किया। शुरु को कई महीने मोदी सरकार ने जियो कंपनी के मालिक को टैक्स से भारी छूट दी। जिसका फायदा उठाते हुए जियो ने जियो कस्टमर को 6 से 9 महीने तक मुफ्त डाटा व कॉल सर्विस प्रदान की। इसका असर ये हुआ कि जहां एक ओर करोड़ों लोग धड़ाधड़ जियो के कस्टमर बने वहीं एयरसेल, आईडिया, यूनिनार जैसी कंपनियां बंद हो गईं। बीएसएनएल को तो खैर 4जी स्पेक्ट्रम न देकर बर्बाद ही कर दिया गया। अखबारों के पहले पेज पर प्रधानमंत्री मोदी जियो के प्रचार करते नजर आए।

वहीं नोटबंदी के दौरान कैशलेस इंडिया के नारे के साथ प्रधानमंत्री मोदी पेटीएम के साथ खड़े दिखे। इसके अलावा मोदी सरकार की सिटी गैस डिस्ट्रीब्युशन प्रोजेक्ट का जिम्मा अडानी गैस कंपनी को दिया गया था। इस प्रोजेक्ट के बाद अडानी कंपनी की मार्केट वैल्यू महज 4 दिन में ही तीन हजार करोड़ रुपए बढ़ गई थी। बता दें कि मोदी सरकार ने अडानी गैस को गुजरात, हरियाणा कर्नाटक, तमिलनाड़ु राजस्थान और उड़ीसा समेत कई जगहों पर इस प्रोज्केट का जिम्मा दिया था।

कुल मिलाकर प्रधानंमत्री मोदी ने अपने कार्यकाल में मुनाफे वाली सरकारी कंपनियों को बर्बाद करने और औने पौने दामों में उन्हें निजी हाथों में बेंचने का काम किया। इसके अलावा वो अपने पद के प्रभाव का इस्तेमाल करके सरकारी योजनाओं के जरिए कंपनियों के लिए कस्टमर बनाने का काम करते दिखे।

पेशे से किसान और दिल्ली में चौकीदारी का काम करनेवाले बिहार के राम शिरोमणि यादव कहते हैं- मोदी सरकार ने सामान्य नैतिकता को भी ताक पर रखकर सरकारी योजनाओं को पूंजीपतियों के हित साधने के हथियार के तौर पर क्रियान्वित किया है। किसान फसल बीमा योजना देख लीजिए। इस योजना को किसानों के लिए नहीं बल्कि अंबानी के लिए बनाया गया है। इसीतरह नमामि गंगे परियोजना भी अंबानी को ध्यान में रखकर बनाई गई है। यूपीए सरकार की हर तरह से फायदे वाले राफेल डील को कैंसिल करके महंगे और घाटे वाले राफेल डील करने के पीछे भी अनिल अंबानी के डूबते आर्थिक जहाज को उबारने का उद्देश्य था।

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