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क्या कभी आप लोग ध्यान से सोचते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ऐसी बेवकूफी से भरी हुई बातें क्यों करते हैं!

गिरीश मालवीय

मोदी दो दिन पहले कौशाम्बी की रैली में बोले कि जब ‘नेहरू प्रधानमंत्री थे तो वह एक बार कुंभ मेले में गये थे. तब पंचायत से पार्लियामेंट तक कांग्रेस की सरकार थी. तब अव्यवस्था के कारण कुंभ में भगदड़ मच गई थी, हजारों लोग मारे गए थे’ (सच यह है कि कुम्भ की यह घटना 3 फरवरी 1954 की है जबकि नेहरू 2 फरवरी को कुंभ मेले में स्नान के लिए पहुंचे थे. और शाम को ही वापस लौट गए )

इससे पहले आपको याद होगा ऐसे ही कर्नाटक चुनाव से पहले एक रैली में ऐसा ही वाकया हुआ था उस वक्त भी मोदी बोले थे कि मुझे इतिहास की जानकारी नहीं है और फिर अगले वाक्यों में विश्वास के साथ यह कहते हुए सवालों के अंदाज़ में बात रखी कि उस वक्त जब भगत सिंह जेल में थे तब कोई कांग्रेसी नेता नहीं मिलने गया. ( जबकि सच्चाई इसके विपरीत थी )

आखिर ऐसे झूठे तथ्य रखने से एक प्रधानमंत्री को हासिल क्या होता है? प्रधानमंत्री को क्या बोलना है किस बारे में भाषण देना है उनके भाषणों के पीछे एक पूरी रिसर्च टीम की मेहनत होती है और वह गलत तथ्य बताती होगी यह सम्भव नहीं है।

सच यह है कि इस तरह के झूठ जानबूझकर बोले जाते हैं। इसके 2 परिणाम होते हैं दोनों ही परिणाम बीजेपी के एजेंडा सेटिंग्स में काम आते हैं.

पहला परिणाम यह होता है कि बुध्दिजीवी वर्ग सही तथ्य जनता के सामने रखने लग जाता है वह उसी मे बिजी हो जाता है। नतीजा यह होता है कि जनता के मूल मुद्दे पब्लिक डिस्कशन से बाहर हो जाते हैं। अब बहस इस पर चल रही होती हैं कि नेहरू भगतसिंह से मिले या नहीं या फिर कुंभ में नेहरू किस दिन गए, मुद्दों पर चल रही बहस पटरी से उतर जाती है.

दूसरा परिणाम यह होता है कि यह झूठ इसलिए बोले जाते हैं क्योंकि बहुसंख्यक जनता अफवाहों पर भरोसा करने लगे। उस झुठ पर भरोसा करने लगे जो व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के माध्यम से समाज मे फैलाए जा रहे हैं. जनता सोचती है कि देश के सबसे बड़े पद पर बैठ प्रधानमंत्री ही अगर इसे सच बता रहा है तो पुष्टि करने की जरूरत ही क्या है यह सच ही होगा. अब वह व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की हर बात पर भरोसा करती है.

जिस देश का प्रधानमंत्री खुद फेक न्यूज़ सर्कुलेट करने का सबसे बड़ा माध्यम बन जाए उस देश के लोकतंत्र के क्या हाल होगे खुद ही सोचिए.

दरअसल यह सारे झूठ एक बहुत वृहद योजना के छोटे छोटे हिस्से हैं. इस योजना का संबंध सिर्फ मोदी सरकार की पुनर्वापसी से जोड़कर मत देखिए यह उससे भी बड़ी योजना है और ऐसा भी नहीं हैं कि ऐसा सिर्फ भारत में देखा जा रहा है यह एक तरह का वैश्विक पैटर्न है.

कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया में पैदा हुए क्रिस्टोफर वायली एक डेटा साइंटिस्ट और साइकोलॉजिकल प्रोफाइलिंग के एक्सपर्ट हैं. वायली कैंब्रिज एनालिटिका के रिसर्च हेड बने और पिछले साल फेसबुक डेटा लीक का भी उन्होंने ही खुलासा किया. वायली बताते हैं कि बड़े पैमाने पर अफ्रीका में उनकी कम्पनी ने सरकारों को अस्थिर करने का काम किया है. वायली ने उस सुनवाई में स्वीकार किया है कि “नाईजीरिया में चुनाव के समय कनाडा की कंपनी एग्रेगेट आईक्यू ने लोगों भयभीत करने के लिए हिंसक वीडियो वायरल किए।। कंपनी ने एक सॉफ्टवेयर बनाया, जिसके जरिए 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से पहले रिपब्लिकन वोटर्स की पहचान की गई। मुझे लगता है कि हैकिंग जैसा काम कैम्ब्रिज एनालिटिका अक्सर करती है।”

जब अमेरिका जैसे विकसित मुल्क में यह काम किया जा सकता है तो भारत तो वैसे भी थर्ड वर्ल्ड कन्ट्री है. क्या यही काम भारत मे नहीं हो रहा होगा? सोच समझ कर जवाब दीजिएगा.

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